अपनी केचुल बदलती भाजपा

Posted by तारिक खान

लोकसभा चुनाव में चारो खाने कांग्रेस से चित्त होने के पश्चात भाजपा ने अपनी पुरानी केचुल यानी अडवाणी को उतार फेंका है, अब वह पार्टी के लिए कोच की भूमिका निभाएंगे और लोकसभा में अपनी पुरानी प्रतिद्वंदी सोनिया गाँधी से दो-दो हाथ करने सुषमा स्वराज मैदान में उतर रही हैं । साथ ही अडवाणी के चहेते राजनाथ सिंह भी बड़े बे- आबरू होकर अध्यक्ष की कुर्सी से उतारे जा चुके हैं । इस पद पर संघ ने अपनी राईट च्वाइज़ को सुशोभित किया है जिनका बचपन व जवानी दोनों ही संघ के आँगन में बीता है । दरअसल संघ ने खूब सोच समझ कर टू टायर व्यवस्था इस बार की है । पार्टी संघ संचालक चलाये और सदन में सुषमा स्वराज कांग्रेस से नाराज दलों को अपनी लच्छेदार बातों से उसी प्रकार रिझा कर लायें जैसे कि पार्टी के अवकाश प्राप्त लीडर अटल बिहारी बाजपेई उदारवादी एवं धर्म निरपेक्ष मुखौटा चढ़ा कर अन्य दलों को साथ मिला कर किया करते थे...

हम होगें कामयाब एक दिन

Posted by मुहम्मद शुऐब एडवोकेट

16 नवम्बर 2009 की बात है। मैं अपने कमरे में पहुंचा, देखा सहारा न्यूज पर रात के 9ः38 बजे दिखाया जा रहा था कि 6 शेरों का एक झुंड भैंस के बच्चे पर टूट पड़ा, पास में नदी थी, जो उस नदी में जा गिरा। नदी में मगर, जिसके बारे में मुहावरा है-नदी में रहकर मगर बैर, वही मगर था जो अपना शिकार देख आगे बढ़ा और जबड़े में दबोच लिया। एक तरफ से शेर भैंस के उस बच्चे को पकड़कर खींच रहे थे, दूसरी तरफ जल का राजा मगर अपने शिकार को अपनी तरफ खींच रहा था। आखिर में हार मगर के हाथ लगा और शिकार झुंड के हाथ यानि शेर नहीं शेरों के हाथ ...

संसद में महंगाई पर चर्चा का रहस्य

Posted by सुमन

संसद के अन्दर सांसदों ने महंगाई पर जोर-शोर से चर्चा की उनकी चिंता जनता के प्रति नहीं थी अपितु अपनी सुविधाओं को महंगाई की चर्चा के बहाने बढ़ाना चाहते थे । महंगाई पर चर्चा की और अपनी सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की । मंत्री 'वेतन एवं सुविधाएं ( संशोधन ) विधेयक 2009' पास कर लिया। इस विधेयक के अनुसार मंत्री व उनके निकट सम्बन्धी वर्ष भर में 48 मुफ्त हवाई यात्राएं करने का प्राविधान है । एक यात्रा में कितने लोग शामिल हो सकते हैं उसका कोई उल्लेख नहीं किया गया है । यह विधेयक बिना किसी चर्चा के कुछ ही मिनटों में पारित हो गया. ...

कोपेनहेगन वार्ता का दुःखद अंत

Posted by मीनाक्षी अरोरा

अंततः जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन वार्ता का दुःखद अंत हो चुका है। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन के बेला सेंन्टर में चले 12 दिन की लंबी बातचीत दुनिया के आशाओं पर बेनतीजा ही रही। कोपेनहेगन सम्मेलन में बातचीत के लिए जुटे 192 देशों के नेताओं के तौर-तरीकों से यह कतई नहीं लगा कि वे पृथ्वी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। दुनियाँ के कई बड़े नेताओं ने बेशर्मी के साथ घोषणा की कि ‘यह प्रक्रिया की शुरुआत है, न की अंत’। 192 देशों के नेता किसी सामुहिक नतीजे पर नहीं पहुँच सके, झूठी सदिच्छाओं के गुब्बारे के गुब्बार तो बनाए गए, पर किसी ठोस कदम की बात कहीं नहीं आई। कोपेनहेगन सम्मेलन मात्र एक गर्मागर्म बहस बनकर खत्म हो चुकी है. ...

कुत्ते की जाति - मालिक की जाति होती है ?

Posted by पुष्पेन्द्र कुमार सिंह

भारतीय समाज में कुत्तों की भी जाति होने लगी है। कुत्ते की वही जाति होती है जो उसके मालिक की जाति होती है। अभी हाल में मध्य प्रदेश के मुरैना जनपद में सुमावली थाना क्षेत्र के मुत्ता ठाकुर के कुत्ते को गाँव के दलित चन्दन जाटव व उसकी पत्नी सुनीता जाटव ने अपने घर की रोटी खिला दी थी। जिससे ठाकुर जाति के कुत्ते को दलित की रोटी खाने से उसकी जाति को ठेस पहुंची। जिस पर मुत्ता ठाकुर ने दोनों लोगों पर 15 हजार रुपये का जुर्माना का दंड दे दिया। जिसे अदा न कर पाने के कारण दलित दंपत्ति गाँव छोड़ कर भाग गया। सिटी मजिस्टेट ने हरिजन कल्याण थाना से उक्त मामले की जांच कराई, मामला सत्य पाया गया। पुलिस अभी तक आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पायी है। भारतीय समाज में जाति के नाम पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं। जातिगत अत्याचारों के कारण एक बहुत बड़ी आबादी अपने को प्रताड़ित महसूस करती है जाति व्यवस्था भारतीय समाज को आगे बढ़ने से रोकती है हम सैकड़ों वर्षों के पूर्व जातिगत अहम् को लेकर फंसे हुए हैं। उन्नति के लिए हमको इस सोच से बाहर निकलना होगा।

बुधवार, 14 मार्च 2012

कार्ल मार्क्‍स और ग़ालिब की ख़त-ओ-किताबत


क्‍या ग़ालिब और कार्ल मार्क्‍स एक-दूसरे को जानते थे। अब तक तो सुनने में नहीं आया था। लेकिन सच यह है कि दोनों एक-दूसरे को जानते ही नहीं थे, बल्कि उनके बीच ख़त-ओ-किताबत भी हुई थी। इन बहुमूल्य चिट्ठियों को खोज निकालने का श्रेय आबिदा रिप्ले को जाता है। आबिदा वॉयस ऑफ अमेरिका में कार्यरत हैं। ये चिट्ठियां ई-मेल से भेजी हैं लखनऊ से हमारे साथी उत्‍कर्ष सिन्‍हा ने... सबसे पहले उन्‍हें क्रांति और अदब के इस दुर्लभ संवाद को लोगों तक हिंदी में पहुंचाने के लिए धन्‍यवाद। इन चिट्ठियों की खोज की कहानी आप आबिदा के शब्दों में ही पढ़ लीजिए। उसके बाद चिट्ठियों की बारी।

आज से ठीक पंद्रह वर्ष पहले मैं लंदन स्थित इंडिया ऑफिस के लाइब्रेरी गई थी। किताबों की आलमारियों के बीच मुग़ल काल की एक फटी-पुरानी किताब दिख गई। जिज्ञासावश उसे खोला, तो उसके अंदर से एक पुराना पत्ता नीचे फ़र्श पर जा गिरा। पत्ते को उठाते ही चौंक पड़ी। लिखने की शैली जानी-पहचानी लग रही थी, लेकिन शक़ अब भी था। पत्ते के अंत में ग़ालिब के दस्‍तख़त और मुहर ने मेरे संदेह को यक़ीन में बदल दिया। घर लौटकर खलिक अंजुम की किताबों में चिट्ठियों के बारे में खोजा, लेकिन जो ख़त मेरे हाथ में था, उसका जिक्र कहीं नहीं मिला। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि इस पत्र में जर्मन दार्शनिक कार्ल मार्क्‍स को संबोधित किया गया था। विडंबना यह है कि आज तक किसी इतिहासकार की नज़र इस ख़त पर नहीं गई। पंद्रह साल के बाद आज मेरे हाथ मार्क्‍स का ग़ालिब के नाम लिखा गया पत्र भी लग गया है। उर्दू एवं फारसी भाषा के महान शायर ग़ालिब और महान साम्यवादी विचारक मार्क्‍स... एक-दूसरे से परिचित थे।

- आबिदा रिप्‍ले

कुछ भी मौलिक लिखें, जिसका संदेश स्पष्ट हो - क्रांति

प्रिय ग़ालिब,

दो दिन पहले दोस्त एंजल का ख़त मिला। पत्र के अंत में दो लाइनों का खूबसूरत शेर था। काफी मशक्कत करने पर पता चला कि वह कोई मिर्जा़ ग़ालिब नाम से हिन्दुस्तानी शायर की रचना है। भाई, अद्धुत लिखते हैं! मैंने कभी नहीं सोचा था कि भारत जैसे देश में लोगों के अंदर आज़ादी की क्रांतिकारी भावना इतनी जल्दी आ जाएगी। लॉर्ड की व्यक्तिगत लाइब्रेरी से कल आपकी कुछ अन्य रचनाओं को पढ़ा। कुछ लाइनें दिल को छू गईं।

'हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,

दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा हैं'

कविता के अगले संस्करण में इंकलाबी कार्यकर्ताओं को संबोधित करें। जमींदारों, प्रशासकों और धार्मिक गुरुओं को चेतावनी दें कि गरीबों, मजदूरों का खून पीना बंद कर दें। दुनिया भर के मजदूरों मुताहिद हो जाओ।

हिन्दुस्तानी शेरो-शायरी की शैली से मैं वाकिफ़ नहीं हूं। आप शायर हो, शब्दों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। कुछ भी मौलिक लिखें, जिसका संदेश स्पष्ट हो- क्रांति। इसके अलावा, यह भी सलाह दूंगा कि ग़ज़ल, शेरो-शायरी लिखना छोड़ कर मुक्त कविताओं को आज़माएं। आप ज्यादा लिख पाएंगे और इससे लोगों को अधिक सोचने को मिलेगा।

इस पत्र के साथ कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो का हिन्दुस्तानी संस्करण भेज रहा हूं। पहला संस्करण भेज रहा हूं। दुर्भाग्यवश पहले संस्करण का अनुवाद उपलब्ध नहीं है। अगर यह पसंद आई तो आगे और साहित्य भेजूंगा। वर्तमान समय में भारत अंग्रेजी साम्राज्यवाद के मांद में परिवर्तित कर दिया गया है और केवल शोषितों, मजदूरों के सामूहिक प्रयास से ही जनता को ब्रिटिश अपराधियों के शिकंजे से आज़ाद किया जा सकता है। आपको पश्चिमी आधुनिक दर्शन के साथ-साथ एशियाई विद्वानों के विचारों का अध्ययन भी करना चाहिए। मुग़ल राजाओं और नवाबों पर झूठी शायरी करना छोड़ दें। क्रांति निश्चित है। दुनिया की कोई ताकत इसे रोक नहीं सकती। मैं हिन्दुस्तान को क्रांति के निरंतर पथ पर चलने के लिए शुभकामनाएं देता हूं।

आपका,

कार्ल मार्क्‍स

तुम किस इनकलाब के बारे में बात कर रहे हो

मेरे अनजान दोस्त काल मार्क्‍स,

कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के साथ तुम्हारा ख़त मिला। अब तुम्हारे पत्र का क्या जवाब दूं। दो बातें हैं...पहली बात कि तुम क्या लिखते हो, यह मुझे पता नहीं चल पा रहा है। दूसरी बात यह कि लिखने और बोलने के हिसाब से मैं काफी बूढ़ा हो गया हूं। आज एक दोस्त को लिख रहा था, तो सोचा क्यों न तुम्हें भी लिख दूं।

फ़रहाद (संदर्भ में ग़ालिब की एक शायरी) के बारे में तुम्हारे विचार गलत हैं। फ़रहाद कोई मजदूर नहीं है, जैसा तुम सोच रहे हो बल्कि वह एक प्रेमी है। लेकिन प्यार के बारे में उसके सोच मुझे प्रभावित नहीं कर पाए। फरहाद प्यार में पागल था और हर वक्त अपने प्यार के लिए आत्महत्या की बात सोचता है।

और तुम किस इनकलाब के बारे में बात कर रहे हो। इनकलाब तो दस साल पहले 1857 में ही बीत गया। आज मेरे मुल्क की सड़कों पर अंग्रेज सीना चौड़ा कर घूम रहे हैं। लोग उनकी स्तुति करते हैं... डरते हैं। मुग़लों की शाही रहन-सहन अतीत की बात हो गई है। उस्ताद-शागिर्द परंपरा भी धीरे-धीरे अपना आकर्षण खो रही है। यदि तुम विश्वास नहीं करते, तो कभी दिल्ली आओ। और यह सिर्फ दिल्ली की बात नहीं है। लखनऊ भी अपनी तहजीब खो चुकी है... पता नहीं वो लोग और अनुशासन कहां ग़ुम हो गया। तुम किस क्रांति की भविष्यवाणी कर रहे हो। अपने ख़त में तुमने मुझे शेरो-शायरी और ग़ज़ल की शैली बदलने की सलाह दी है। शायद तुम्हें पता न हो कि शेरो-शायरी या ग़ज़ल लिखे नहीं जाते हैं। ये आपके ज़हन में कभी भी आ जाते हैं। और मेरा मामला थोड़ा अलग है। जब विचारों का प्रवाह होता है, तो वे किसी भी रूप में आ सकते हैं। वो चाहे फिर ग़ज़ल हो या शायरी। मुझे लगता है कि ग़ालिब का अंदाज़ सबसे जुदा है। इसी कारण मुझे नवाबों का संरक्षण मिला। और अब तुम कहते हो कि मैं उन्हीं के खिलाफ कलम चलाऊं। अगर मैंने उनकी शान में कुछ पंक्तियां लिख भी दीं, तो इसमें गलत क्या है।

दर्शन क्या है और जीवन में इसका क्या संबंध है, यह मुझसे बेहतर शायद ही कोई और समझता हो। भाई, तुम किस आधुनिक सोच की बात कर रहे हो। अगर तुम सचमुच दर्शन जानना चाहते हो, तो वेदांत और वहदुत-उल-वजूद पढ़ो। क्रांति की रट लगाना बंद कर दो।

तुम लंदन में रहते हो... मेरा एक काम कर दो। वायसराय को मेरी पेंशन के लिए सिफारिश पत्र डाल दो...।

बहुत थक गया हूं। बस यहीं तक।

तुम्हारा,

ग़ालिब


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मंगलवार, 13 मार्च 2012

भगवा आतंकवाद और भागवत का बचकानापन




गत 28 फरवरी को उच्चतम न्यायालय ने आरएसएस के सरसंघचालक डाॅमोहन भागवत को यह दावा करने के लिए जमकर लताड़ लगाई कि हेमंत करकरे ने उन्हें बताया था कि उनपर (करकरे) समझौता एक्सप्रेस, अजमेर, मालेगांव आदि बम विस्फोटों से संबंधित मामलों में आरएसएस के कार्यकर्ताओं को फंसाने का जबरदस्त दबाव है। संघ के मुखिया के अनुसार, उनके करकरे से सौहार्दपूर्ण संबंध थे और करकरे ने इन मामलों को सुलझाने में उनसे सहयोग चाहा था। इसी सिलसिले मंे हुई बातचीत के दौरान करकरे ने उन्हें बताया था कि संघ को इन आतंकी हमलों में फंसाने के लिए उनपर दबाव डाला जा रहा है। यह हम सब जानते हैं कि उस दौर में करकरे भारी दबाव में काम कर रहे थे।
आतंकी हमलों की जांच का कोई नतीजा सामने नहीं आ रहा था। हर विस्फोट के बाद युवा मुसलमानों को पकड़कर जेल में ठूंस दिया जाता था और घटना के लिए लश्कर या अल्कायदा से जुड़े किसी भी संगठन को जिम्मेदार बता दिया जाता था। करकरे ने महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के प्रमुख का कार्यभार संभालने के बाद आतंकी हमलों की सूक्ष्म व पूर्वाग्रह मुक्त जांच करनी शुरू की और इसके अच्छे नतीजे सामने आए। करकरे के नेतृत्व में आतंकवाद निरोधक दस्ते ने वह मोटरसाईकिल ढूंढ़ निकाली जिसका इस्तेमाल मालेगांव में बम विस्फोट करने के लिए किया गया था। इस मोटरसाईकिल की मालिक थीं प्रज्ञा सिंह ठाकुर, जो पूर्व में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ी रही थीं। इसके बाद जांच प्रक्रिया तेजी से
आगे बढ़ी और जल्द ही उस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो गया जिसे बाद में केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने “भगवा आतंकवाद“ का स्त्रोत बताया। जाँच और पूछताछ के रास्ते पुलिस, स्वामी दयानंद पाण्डे, ले. कर्नल प्रसाद
श्रीकांत पुरोहित, स्वामी असीमानंद, इन्द्रेश कुमार, सुनील जोशी, कालसांगरा आदि तक पहुंची। ये सभी या तो आरएसएस या उसके किसी न किसी अनुशांगिक संगठन से जुड़े हुए थे। इस तथ्य का निहितार्थ स्पष्ट था। इस हिन्दुत्व नेटवर्क का पर्दाफाश होने के बाद मस्जिदों व अन्य उन स्थानों पर जहां मुसलमान बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं, में लगातार हो रहे आतंकी हमले अचानक बंद हो गए। क्या यह तथ्य महत्वपूर्ण नहीं है? यह सचमुच विडंबनापूर्ण था कि जिन हमलों में केवल या अधिकांषतः मुसलमान मारे जाते थे उनके लिए मुसलमानों को ही दोषी बताया जा रहा था।
राजस्थान पुलिस की एटीएस ने इस जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और हिन्दुत्ववादियों के
आतंकी हमलों में शामिल होने के नए-नए सुबूत मिलते चले गए। न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष स्वामी असीमानंद द्वारा दिए गए इकबालिया बयान से इन संगठनों के काम करने का तरीका सामने आया। इन हमलों में शामिल लोगों का यह विशवास था कि वे मुस्लिम आतंकी हमलों का बदला ले रहे हैं और हिन्दू राष्ट्र के
निर्माण का पथ प्रशस्त कर रहे हैं। गुजरात में आयोजित शबरी कुंभ के प्रमुख आयोजनकर्ता व विहिप कार्यकर्ता स्वामी असीमानंद इस नेटवर्क के प्रमुख थे। स्वामी ने मजिस्ट्रेट के समक्ष यह कुबूल किया कि वे व उनका संगठन आतंकी हमलों में shamil था.
षनैः-षनैः संघ परिवार की अन्य कुत्सित हमलों में भागीदारी सामने आने लगी। यह पता चला कि समझौता धमाके के पीछे कमल चैहान का हाथ था। कमला चैहान को उसके पितृ संगठन आरएसएस ने अपना “असंतुष्ट सदस्य“ बताया। यह आरएसएस की पुरानी चाल है। हत्याओं व अन्य आपराधिक कृत्यों में लिप्त पाए गए उसके सदस्यों के बारे में संघ हमेशा से या तो यह कहता रहा है कि वे पूर्व में ही संघ की सदस्यता त्याग चुके हैं या उनके स्वयंसेवक होने के तथ्य को ही सिरे से नकारता रहा है।
एक समय था जब कोई यह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि संघ व उससे जुड़े संगठन आतंकी हमलों में शामिल हो सकते हैं। संघ का दावा था कि वह हिंसा में विशवास नहीं रखता। उसके खोखले दावों का सच अब सबके सामने उजागर हो चुका है।
इसलिए अब संघ की तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के
लिए शासक दल द्वारा उसे जबरन आतंकी हमलों से जोड़ा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि जिन लोगों को इन हमलों का सूत्रधार बताया जा रहा है वे पाक-साफ व्यक्ति हैं। एक ओर आरएसएस आतंकी हमलों में लिप्त पाए गए व्यक्तियों से स्वयं के संबधों को नकार रहा है तो दूसरी ओर वह यह प्रचार भी कर रहा है कि उन पर लगे आरोप सिद्ध होने तक वे निर्दोष हैं। साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि जांच अधिकारियों पर संघ के सदस्यों को फंसाने का दबाव है।
आरएसएस का अपने बचाव का यह तरीका अत्यंत बचकाना व हास्यास्पद है।
संघ प्रमुख ने करकरे के संबंध में बयान, देश की रक्षा करते हुए इस बहादुर अधिकारी के शहीद हो जाने के लंबे समय बाद दिया। करकरे अब इस दुनिया में नहीं हैं और भागवत के दावे की पुष्टि या खंडन किया जाना आसान नहीं है। तथापि सच के नजदीक पहुंचने के कुछ रास्ते अभी भी उपलब्ध हैं। यह स्मरणीय है कि मालेगांव हमले के सिलसिले में प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद लालकृष्ण आडवानी स्वयं प्रधानमंत्री से मिले थे और यह शिकायत की थी कि साध्वी को शारीरिक यंत्रणा दी जा रही है। उन्होंने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की
थी। लगभग उसी समय एक अन्य हिन्दुत्ववादी बाल ठाकरे ने करकरे की असंसदीय शब्दों में निंदा की थी। शिवसेना के मुखपत्र “सामना“ में लिखते हुए ठाकरे ने ेकहा था कि करकरे राष्ट्रद्रोही हैं और “हम उनके महुं पर थकू ते है।ं “ हिन्दुत्व सेना के एक अन्य सिपहसालार नरेन्द्र मोदी ने भी करकरे को देशद्रोही बताया था। ज्ञातव्य है कि ठाकरे और मोदी, “हिन्दू ह्दय सम्राट“ कहे जाते हैं। करकरे की मौत के बाद मोदी ने पलटी खाई और वे उन्हें महान देशभक्त बताने लगे। यहां तक कि उन्होंने गुजरात सरकार की ओर से करकरे की पत्नि को एक करोड़
रूपये की सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा जिसे करकरे की पत्नि ने गरिमापूर्वक ठुकरा दिया। इसी संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने यह दावा किया था कि 26/11 की रात करकरे ने उन्हें फोन पर बताया था कि उनपर दक्षिणपंथियों का जबरदस्त दबाव है। दिग्विजय सिंह ने इस सिलसिले में कुछ अखबारों की कतरनें भी दिखाई थीं और यह भी कहा था कि बीएसएनएल का भोपाल कार्यालय उनकी करकरे से बातचीत का
रिकार्ड इसलिए उपलब्ध नहीं करा पा रहा है क्योंकि एक साल से अधिक पुराने रिकार्डों को नष्ट कर दिया जाता है और करकरे से उनकी बातचीत इस अवधि के पहले हुई थी।

एक अन्य स्त्रोत से भी हमें यह पता चलता है कि करकरे पर दबाव कौन डाल
रहा था। जूलियो रिबेरो देश के सबसे सम्मानित पुलिस अधिकारियों में से एक हैं। उनकीईमानदारी व निष्पक्षता संदेह से परे है। करकरे को श्रद्धांजलि देते हुए अपने लेख (द टाईम्सआॅफ इंडिया, मुंबई 28 नवम्बर 2010) में उन्होंने लिखा कि करकरे, आडवानी और हिन्दुत्व गैंग के अन्य सदस्यों की धमकियों से काफी परेशान थे। वे रिबेरो से मिले थे और उन्होंने अपनी व्यथा से उन्हें अवगत कराया था। रिबेरो ने पुष्टि की कि करकरे को आडवानी-मोदी व उनके संगी-साथियों द्वारा परेशान किया जा रहा था और डराया-धमकाया भी जा रहा था। रिबेरो ने करकरे को यह सलाह दी थी कि वे दबाव की परवाह किए बिना अपना काम निष्पक्षता से करते रहें। “वे मेरे पास इसलिए आए थे क्योंकि वे ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो उनका हाथ थाम सके“, रिबेरो ने मुंबई से टेलीफोन पर समाचार एजेंसी आईएएनएस को कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि करकरे, राजनैतिक दबाव के आगे झुकने वालों में से नहीं थे।
सच सबके सामने है। भागवत के इस बयान के असली उद्धेष्य को भी हम
समझ सकते हैं। संघ परिवार के अनेक सदस्यों के जेलों में होने और कईयों के फरार रहने के कारण भागवत का परेशान होना स्वाभाविक है। भागवत के पूर्ववर्ती के. सुदर्शन ने भी ऐसा ही खेल खेला था। जब बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने की जांच में यह सामने आने लगा कि आरएसएस की इस घटना में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी थी तब सुदर्शन ने यह दावा किया था कि उन्होंने गांधीवादी नेता निर्मला देशपांडे को यह कहते हुए सुना था कि मस्जिद के अंदर एक बम विस्फोट हुआ जिसके कारण मस्जिद ढह गई। सौभाग्यवश, निर्मला दीदी उस समय जीवित
थी और उन्होंने साफ शब्दों में सुदर्शन के दावे का खंडन किया था। आरएसएस मुखिया का पद पिता से पुत्र को नहीं जाता। परंतु ऐसा लगता है कि फिर भी उनमें एक सी जीन्स होती है

-राम पुनियानी

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शनिवार, 10 मार्च 2012

सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ्तारीकी निंदा

नयी दिल्ली, दस मार्च (एजेंसी) इस्राइली राजनयिक की गाड़ी पर बम से किये गए हमले के सिलसिले में एक पत्रकार की गिरफ्तारी की निंदा करते हुए आज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी :भाकपा: ने आरोप लगाया कि इस तरह के गंभीर आरोप में पत्रकार की दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ्तारी आधारहीन है और यह कदम केवल इस्राइल को खुश करने के लिए उठाया गया है। बम हमले के सिलसिले में सैयद मोहम्मद अहमद काजमी की गिरफ्तारी के तौर तरीकों पर सवाल उठाते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ए। बी। बर्द्धन ने कहा, ‘‘बिना उचित जांच के सरकार ने इस गिरफ्तारी को अंजाम दिया है । यह पत्रकार इस्राइल और फलस्तीन मुद्दे को देखता था, इसमें हर्ज क्या है । यह इस्राइल को प्रसन्न करने के लिए सरकार द्वारा किया गया प्रयास है ।’’इस गिरफ्तारी की निंदा करते हुए पार्टी के सचिव अतुल कुमार अजान ने कहा कि काजमी एक सम्मानीय पत्रकार हैं । उन्हें पत्र सूचना कार्यालय की मान्यता प्राप्त है । पत्रकारिता का उनका 25 साल का करियर है। किसी पत्रकार की पृष्ठभूमि की जांच करने के बाद सरकार उसे पत्र सूचना कार्यालय की मान्यता देती है ।

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रविवार, 26 फरवरी 2012

दुनिया के सबसे बड़े पोस्टर डिजाइनर का नाम : मोहन दास करम चंद गांधी


बड़ी दिलचस्प कहानी है दिल्ली में हमारे एक दोस्त हैं नरेश जुनेजा.उनमे कई कमाल की आदतें हैं .एक दो आप भी सुन लें - वे खाने -खिलाने शौक़ीन हैं ...दोस्त बनाने में माहिर हैं....किस शहर में ,किस जगह पर खाने की क्या चीज अच्छी मिलती है उन्हें जुबानी याद रहता है . जाहिर है उनके पास सांझ की शुरुआत की बेहतरीन सामगी रहेगी . बड़े शहर में जीने के लिए जरूरी जरूरियात की सामग्री से लैस यह शख्स अपने आपको बेहद प्यार करता है .
एक दिन, दोपहर को हमें सूचना मिली कि -भाई साब ! आज ...आ जाओ .. रात के खाने पर . और हम पहुच गए .उनका दीवान- ये - आम ,खास लोंगो से अटा पड़ा था .सब विदेशी लोग ,राज दूत ,आफिसर ,...सब विदेशी लिबास में ...एक अकेला मै खादी में .अचानक एक साहब नमूदार हुए और मुझसे बोले -जुनेजा जी ने कहा है -आप उनके बेड रूम में चले जायं, वहाँ कुछ लोग आपका इन्तजार कर रहे हैं .मै बेड रूम में चला गया .वहाँ सारे देसी लोग .अधिकतर बंबई के फिल्मो से जुड़े लोग .सारे फिल्म बितारक .एक संतोषा नन्द ( फिल्मो के गीत लेखक ) कहती कांग्रेसी ,संघी फिल्म बितरकों से घिरे पड़े हैं .हमें देखते ही उछल पड़े -लो अब बात करो , आ गया है समाज्बादी .... यार! ये सब गांधी को गरिया रहे हैं ... मै अकेला पड़ गया था .मैंने नजर दौड़ाई दो एक परचित दिखाई पड़े -गिप्पी (असल नाम सिद्धार्थ द्विवेदी -पुत्र आचार्य हजारी प्रसाद द्विबेदी.) डॉ कसाना .हमने कहा भाई ! हमें भी तो आप लोगो के लेबिल पर पहुचने दो ..और गिप्पी के साथ मै उस तरफ किनारे चला गया जहां "ऊपर उठने की सामग्री सजाई गयी थी .लाब्तक हम वापस आते ,बहस का मुद्दा पोस्टर डिजाइनिंग की तरफ जाचुका था .किसी ने पूछा इंडिया का सबसे अच्छा पोस्टर डिजाइनर कौन है .कई नाम उभरे ..हमने बीच में ही कूदने कि जहमत ले ली -----
देश का छोड़ो मै दुनिया के सबसे बड़े पोस्टर डिजाइनर का नाम बताता हूँ ,उसका नाम है मोहन दास करम चंद गांधी ...एक सन्नाटा पसर गया .कईयों को लगा कि ये गया काम से ..इसका लेबिल कुछ ज्यादा ही हाई हो गया है .इस परिस्थिति में कई बार यह होता है कि ; चलो इसे मौक़ा दे दो बोल- बाल कर जाय /वही मौक़ा मुझे भी मिला .और मै शुरू हो गया हमारा कांग्रेसी मित्र " मेरे देश कि धरती सोना उगले ,रँग लाल है लाल बहादुर से , का लेखक कसमसाया ,जिस गोलार्ध पर टिका था ,उसे बदला , गिलास उठाया , ललकारा -अब आओ ...और मै शुरू हो गया भाई !
गाँधी के पोस्टर का नाम है चरखा .बड़ी मेहनत से गाँधी ने उसकी डिजाइन की थी .गो चरखा पहले भी था ,लेकिन गांघी ने उसे नया रूप दिया ,उसे आजादी के औजार में तब्दील किया ,उस जमाने में जो भी चरखा चलाता दिख जाता उसे कांग्रेसी मान लिया जाता .अभी आज तलक इतना कारगर पोस्टर कहीं से भी नहीं आपाया .सुनो संघियो ! (हमें माफ करना भाई ,ऊंची उड़ान पर भाषा में थोड़ी रवानी आ ही जाती है , न पतिया रहे हों तो अटल जी के किसी नजदीकी से दरियाफ्त कर लीजिए ) तुमने उनकी ह्त्या करके बड़ा पाप किया है . बहार हॉल बात पोस्टर की हो रही थी ....गिप्पी मई फ्रैंड ! एक और ... इसी बीच एक आवाज आई - साहिब ! इसे दुबारा सुना सकते है क्या ?मै ज़रा देर से आया ....... जी हमें राजेश खन्ना कहते हैं ..../ राजेश खन्ना ? आनंद ...बावर्ची....कटी पतंग ,..एक लंबी रील घूम गयी .राजेश खन्ना के साथ राजीव शुक्ला थे ,राजीव शुक्ला ने धीरे से मेरे बारे में उन्हें बताया .(राजीव के बड़े भाई, दिलीप शुक्ला हमारे दोस्त रहे हैं ) इस तरह राजेश खन्ना से पहली मुलाक़ात हुई और आज तक वह दोस्ती ब् दस्तूर कायम है .राजेश खन्ना हमारे काका भाई हैं ,और मै उनका साहिब
बेटे कबीर ! दोस्ती में पहले दिल जरूर आता है ,लेकिन उसकी बलन्दी दिमाग से ही परवान चढती है.इब्ने इंशा का एक सवाल है -तुम अंगूठा टेक , बे पढ़ा अकबर बन्ना चाहोगे या पढ़-लिख कर नौ रत्न ? सोच कर जवाब देना कोइ जल्दी नहीं है.
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बुधवार, 25 जनवरी 2012

SC ने गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों पर तीन महीने में रिपोर्ट मांगी


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नरेंद्र मोदी
नई दिल्ली।। गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार को एक और झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साल 2002 से 2006 के बीच प्रदेश में कथित फर्जी मुठभेड़ों में हुई तमाम मौतों की जांच के आदेश दे दिए हैं। कोर्ट ने बुधवार को अपने एक पूर्व जज की अध्यक्षता वाले निगरानी प्राधिकरण से ऐसे तमाम मामलों की पड़ताल करके तीन महीने के अंदर रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है।

गुजरात सरकार ने पिछले साल अप्रैल में शीर्ष अदालत के पूर्व जज एम.एस.शाह को अवधि में कथित फर्जी मुठभेड़ों में हत्याओं की जांच पर नजर रखने को कहा था।

जज आफताब आलम और जज सी.के. प्रसाद ने कहा, 'एक निगरानी प्राधिकरण बनाया गया और इस अदालत के एक पूर्व जज उसके अध्यक्ष हैं, इस तथ्य को संज्ञान में लेते हुए हम चाहेंगे कि अध्यक्ष दोनों रिट याचिकाओं में अंकित कथित फर्जी मुठभेड़ के सभी मामलों को देखें।'

पीठ ने वर्ष 2002 से 2006 के बीच गुजरात में हुई कथित फर्जी मुठभेड़ों से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा, 'हम चाहते हैं कि जांच पूरी तरह हो ताकि प्रत्येक मामले में सचाई सामने आए।'

इन याचिकाओं में एक तरह से संकेत दिया गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को कथित रूप से आतंकवादियों के तौर पर निशाना बनाया गया।

पीठ ने कहा कि निगरानी प्राधिकरण के अध्यक्ष के पास एक स्वतंत्र टीम गठित करने की आजादी होगी जिसमें गुजरात विशेष कार्य बल या बाहर से अधिकारी हो सकते हैं।

अदालत ने कहा कि निगरानी इकाई के अध्यक्ष मुठभेड़ में मौत के किसी भी मामले में पुलिस के पूर्ववर्ती रेकॉर्ड या मानवाधिकार संस्थाओं के रेकॉर्ड मंगा सकते हैं जिनका जिक्र रिट याचिकाओं में किया गया है। हालांकि पीठ ने स्पष्ट किया कि निगरानी इकाई उन मामलों को नहीं देखेगी जिनकी जांच
अन्य एजेंसियां शीर्ष अदालत के आदेशों पर कर रही हैं।

पीठ ने यह भी कहा कि निगरानी प्राधिकरण के अध्यक्ष चाहें तो मामले में याचिकाकर्ताओं के या मुठभेड़ में मारे गए लोगों के परिजनों का पक्ष सुन सकते हैं। जजों ने कहा कि इस मुद्दे पर याचिकाएं काफी सालों से लंबित हैं लेकिन आज तक कोई अहम फैसला नहीं सुनाया गया है और एसटीएफ की नियुक्ति और निगरानी प्राधिकरण की स्थापना जैसे घटनाक्रम मामले के लंबित रहने के दौरान हुए।

शीर्ष अदालत वरिष्ठ पत्रकार बी जी वगीर्ज और गीतकार जावेद अख्तर की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। वर्गीज ने गुजरात में पुलिस द्वारा इस अवधि में कथित फर्जी मुठभेड़ों में 21 लोगों की मौत के मामले में जांच की मांग की थी।

जावेद अख्तर ने प्रदेश में कथित फर्जी मुठभेड़ों में विशेष जांच दल द्वारा पड़ताल कराने की मांग की थी। अख्तर ने दावा किया कि निर्दोष लोगों, खासतौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों को आतंकवादियों के तौर पर निशाना बनाया जा रहा है।

उन्होंने अपनी याचिका में अक्टूबर 2002 में कथित अपराधी समीर खान की हत्या के मामले में अखबारों की खबरों तथा एक पत्रिका के स्टिंग ऑपरेशन का हवाला दिया। खान पुलिस हिरासत में था और 21-22 अक्टूबर, 2002 की दरमियानी रात को उसे मार दिया गया। उसने कथित तौर पर एक पुलिसकर्मी की रिवॉल्वर छीन ली थी।
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/11628427.cms

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बुधवार, 11 जनवरी 2012

दीनदयाल उपाध्याय की ह्त्या में जौनपुर के जनसंघ के सांसद अभियुक्त थे

"भाजपा एक आत्ममुग्ध पार्टी है और
इसकी प्रवृतियां सदैव से आत्मघाती भी रही हैं. यह इतने स्वाबलंबी हैं कि
अपने शीर्ष नेताओं की ह्त्या करने या उन्हें हाशिये पर लगाने का काम स्वयं
ही करलेते हैं. "स्वयंसेवक" शब्द की ही यह विडम्बना है. जनसंघ के समय से ही
यही परम्परा है. दीनदयाल उपाध्याय की ह्त्या में जौनपुर के जनसंघ के सांसद
अभियुक्त थे. प्रखर हिंदूवादी नेता बलराज मधोक या मौली चन्द्र शर्मा को
कैसे हासीये पर लगाया गया सभी जानते हैं. गोविन्दाचार्य कहाँ गए ? ब्रह्म
दत्त द्विवेदी की ह्त्या किसने करवाई थी और कौन मुलजिम था ? सीमा रिजवी और
कुसुम राय की प्रतिद्वाद्विता के अटल और कल्याण सिंह मुहरे थे."देश में अगर
रहना है तो वन्देमातरम कहना है" का नारा देकर सत्ता में पहुँची भाजपा ने
उत्तर प्रदेश में अपने शिक्षा मंत्री रवींद्र शुक्ला को इसलिए निकाल दिया
था क्योंकि उसने स्कूलों में अनिवार्यतः वन्देमातरम गाने की राजाज्ञा जारी
कर दी थी. देश का पहला गो- मांस निर्यात का लाईसेंसे अटल सरकार ने जारी
किया. अमरनाथ यात्रा पर टेक्स अटल सरकार में लगा. जब देश -प्रदेश में
दूसरों की सरकार थी तो चिल्लाते थे "राम लाला हम आयेंगे मंदिर वहीं
बनाएंगे" पर सत्ता में आते ही अयोध्या के राम लाला टाट में थे और यह ठाठ
में थे. अभी लोग घूस खा कर कंगारू की तरह फुदकते इनके राष्ट्रीय अध्यक्ष
बंगारू को भूले भी नहीं थे कि भ्रष्टाचार के शलाका पुरुष बाबू राम कुशवाहा
का आयात करलिया. तुर्रा यह कि रावण के यहाँ का विभीषण ले आये. लंका में
विश्वासघात की विभीषिका करने वाले व्यक्ति को विभीषण कहा गया तो क्या राम
राज्य के सपने का लौलीपोप चुसाती भाजपा के मतदाता / कार्यकर्ता से
विश्वासघात कर पार्टी को चुनाव के पहले चरित्र की विभीषिका में धकेलने वाले
को विभीषण नहीं विनय कटियार / सूर्य प्रताप शाही / राजनाथ सिंह या नितिन
गडकरी कहा जाए ? वैसे ही दूध में फिटकिरी की तरह ही हैं भाजपा में गडकरी."

----- राजीव चतुर्वेदी


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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

फोर्ड फाउंडेशन का सीआइए गठजोड़ और भारत के जनांदोलनों में घुसपैठ

'वर्ल्ड सोशल फोरम की राजनीति और अर्थशास्त्र, भूमंडलीकरण के खिलाफ संघर्ष के लिए सबक' नाम से www.globalresearch.ca पर उपलब्ध लम्बे पर्चे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अनुदित कर यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है. सामाजिक- राजनीतिक और सांस्कृतिक आंदोलनों से जुड़े लोगों के लिए यह एक जरुरी मसविदा है जो बताने के लिए काफी है कि स्वयंसेवी संगठनों ( NGOs) के जरिये किये जा रहे सामाजिक बदलावों के संघर्षों का असल राजनीतिक अर्थशास्त्र क्या है, फोर्ड फाउन्डेशन जैसे दानदाताओं के पीछे असल साम्राज्यवादी मंशा क्या है. यह पर्चा 2003 मुंबई में आयोजित वर्ल्ड सोशल फोरम के समय प्रकाश में आया था...

नुवाद - राजेश चन्द्र

फोर्ड फाउनडेशन-विदेशी फंडिंग के परिप्रेक्ष्य में एक अध्ययन

"कभी न कभी कोई फोर्ड फाउनडेशन द्वारा भारत में किए जा रहे कार्यों का ब्योरा ज़रूर अमरीकी जनता के सामने रखेगा। देश में फोर्ड फाउनडेशन का कुछ लाख डॉलर में आने वाला कुल खर्च इस कहानी का दसवां हिस्सा भी शायद ही बयान कर सके"- चेस्टर बाउलन (भारत में पूर्व अमरीकी राजदूत)।

फोर्ड फाउनडेशन द्वारा विश्व सामाजिक मंच को दिए जा रहे अकूत धन के प्रवाह ने इस संस्थान की पृष्ठभूमि और इसकी वैश्विक गतिविधियों को जगजाहिर कर दिया है। यह न सिर्फ़ इसके बल्कि इस जैसी दूसरी संस्थाओं के अध्ययन की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। फोर्ड फाउनडेशन (एफएफ) की स्थापना 1936 में फोर्ड के विशाल साम्राज्य के हित में टैक्स बचाने की जुगत के तौर पर हुई थी, लेकिन इसकी गतिविधियाँ स्थानीय तौर पर मिशिगन के स्टेट को समर्पित थीं। 1950 में जब अमरीकी सरकार ने इसका ध्यान "कम्युनिस्ट धमकियों" से मुठभेड़ पर केंद्रित किया, फोर्ड फाउनडेशन एक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय फाउनडेशन में तब्दील हो गया।

फोर्ड फाउनडेशन और अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए का गठजोड़
सच तो यह है कि अमरीका की केन्द्रीय गुप्तचर संस्था (सीआइए) लम्बे समय से अनेकानेक लोकोपकारी फाउनडेशनों (खासकर फोर्ड फाउनडेशन) के माध्यम से कार्य करती आ रही थी। जेम्स पेत्रास के शब्दों में फोर्ड और सीआईए का अंतर्सम्बंध "अमरीका के साम्राज्यवादी सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को मजबूती देने और वामपंथी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों की जड़ें खोदने के लिये एक सोची-समझी और सजग संयुक्त पहलकदमी थी। " फ्रांसिस स्टोनर इस दौर पर अपने एक अध्ययन में कहते हैं - इस समय फोर्ड फाउनडेशन ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक दुष्प्रचार के क्षेत्र में सरकार का ही एक विस्तार हो। फाउनडेशन के पास इसका पूरा ब्योरा है कि उसने यूरोप में मार्शल प्लान और सीआईए अधिकारियों के विशिष्ट अभियानों में कितनी प्रतिबद्धता और अंतरंगता के साथ कार्य किया है। "


रिचर्ड बिशेल ,जो 1952 -54 के दरम्यान फाउनडेशन के प्रमुख रहे, तत्कालीन सीआईए प्रमुख एलन ड्यूल्स के साथ खुले तौर पर मिलते-जुलते रहे थे। उन्होंने फोर्ड फाउनडेशन को सीआईए की विशेष मदद के लिये प्रेरित किया। ड्यूल्स के बाद जॉन मैकक्लॉय फोर्ड के प्रमुख बने। इससे पहले का उनका कैरिअर वार (War) के सहायक सचिव, विश्व बैंक के अध्यक्ष, अधिकृत जर्मनी के उच्चायुक्त, रौकफेलर के चेज मैनहट्टन बैंक के अध्यक्ष और सात बड़ी तेल कंपनियों के वाल स्ट्रीट अटोर्नी के तौर पर काफी विख्यात रहा था। मैकक्लॉय ने सीआईए और फोर्ड की साझेदारी को तीखा किया - फाउनडेशन के अंतर्गत एक प्रशासनिक इकाई गठित की जो खास तौर से सीआईए के साथ तालमेल बिठा सके और उन्होंने निजी तौर पर भी एक परामर्शदात्री समिति का नेतृत्व किया ताकि फोर्ड फाउनडेशन फंड के लिए एक आवरण और वाहक के तौर पर अपनी भूमिका का निर्वहन कर सके। 1966 में मैक जॉर्ज बंडी , जो उस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति के राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में विशेष सहायक थे, फोर्ड फाउनडेशन के प्रमुख बने।


यह फाउनडेशन और सीआईए के बीच एक व्यस्त और सघन साझेदारी थी। "सीआईए के बहुसंख्य "दस्तों" ने फोर्ड फाउनडेशन से भारी अनुदान प्राप्त किया। बड़ी संख्या में सीआईए प्रायोजित तथाकथित " स्वतन्त्र " सांस्कृतिक संगठनों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने सीआईए /फोर्ड फाउनडेशन से अनुदान प्राप्त किया। फोर्ड फाउनडेशन द्वारा दिए गए सबसे बड़े दानों में एक वह था जो सीआईए प्रायोजित सांस्कृतिक आज़ादी (स्वायत्तता ) कांग्रेस को 1960 में दिया गया था - सात मिलियन यानि सत्तर लाख डॉलर। सीआईए से जुड़कर काम करने वाले बहुतेरे लोगों को फोर्ड फाउनडेशन में पक्की नौकरी मिलती रही और यह घनिष्ठ साझेदारी परवान चढ़ती रही।"


बिशेल के अनुसार फोर्ड फाउनडेशन का मकसद "केवल इतना भर नहीं था कि वह वामपंथी बुद्धिजीवियों को वैचारिक समर में हरा दे, बल्कि यह भी था कि प्रलोभन देकर उन्हें उनकी जगह से उखाड़ दे ।" 1950 के सांस्कृतिक स्वायत्तता कांग्रेस (सीसीएफ) को सीआईए ने फोर्ड फाउनडेशन की कीप से फण्ड दिया। सीसीएफ की सबसे प्रसिद्ध गतिविधियों में से एक थी वैचारिक पत्रिका "एनकाउन्टर "। बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी जैसे बिकने को तैयार बैठे थे। सीआईए और फाउनडेशन ने विशिष्ट कलात्मक परम्पराओं, जो अमूर्त अभिव्यक्तियों पर आधारित थीं, को प्रोत्साहित करना शुरू किया - ताकि वह उस कला को जो सामाजिक सरोकारों को वाणी देती है, को कड़ी चुनौती दे सके।

अमरीकी फाउनडेशनों में सीआईए की अत्यन्त व्यापक घुसपैठ थी। अमरीकी सीनेट द्वारा 1976 में गठित एक कमिटी ने यह रहस्योद्घाटन किया कि 1973-76 के दरम्यान दस हज़ार डॉलर से अधिक के 700 अनुदान जो 164 फाउनडेशनों के माध्यम से बांटे गए थे, उनमे से 108 आंशिक तौर पर अथवा शत प्रतिशत सीआईए पोषित थे। पेत्रास के अनुसार, "फोर्ड फाउनडेशन के शीर्ष पदाधिकारियों और अमरीकी सरकार के बीच का सम्बन्ध सुस्पष्ट है और यह जारी है। हाल के दिनों के कुछ फंडेड प्रोजेक्ट का एक अध्ययन भी साफ बताता है कि फोर्ड फाउनडेशन ने किसी भी ऐसे बड़े प्रोजेक्ट को फण्ड नहीं किया है जो अमरीकी नीतियों की खिलाफत करता हो।"

फोर्ड फाउनडेशन कबूल करता है (अपने नयी दिल्ली ऑफिस की वेबसाइट पर) कि सन् 2000 की शुरुआत में इसने 7.5 विलियन डॉलर ग्रांट के रूप में दिया है और 1999 में इस क्षेत्र में कुल मिलाकर 13 विलियन डॉलर दान में दिया है। वह यह भी दावा करता है कि "सरकारों अथवा अन्य श्रोतों से फण्ड प्राप्त नहीं करता," पर वास्तव में, जैसा कि हमने देखा है, यह एक उल्टी बात है।

फोर्ड फाउनडेशन और भारत


फोर्ड फाउनडेशन की नई दिल्ली ऑफिस के वेब पेज के अनुसार -"भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर फाउनडेशन ने 1952 में भारत में एक ऑफिस की स्थापना की।" वास्तव में चेस्टर बाउल्स जो 1951 में भारत में अमरीका के राजदूत थे, ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी। अमरीकी विदेश नीति की स्थापना में लगे बाउल्स को गहरा धक्का तब लगा जब 'चीन हाथ से निकल गया' (राष्ट्रीय स्तर पर वहां 1949 में कम्युनिस्ट सत्ता में आ गए थे)। इसी तरह वे इस बात से भी दुखी थे कि तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए हथियारबंद आन्दोलन को कुचलने में भरतीय सेना नाकाम रही थी (1946-51) " जब तक कि कम्युनिस्टों ने स्वयं ही हिंसा का रास्ता बदल नहीं लिया। " भारतीय किसानों की अपेक्षा थी कि अंग्रेजी राज की समाप्ति के बाद उनकी इस दीर्घकालीन मांग को पूरा किया जाएगा कि जमीन जोतने वाले को मिलनी चाहिए। और यह दबाव तेलंगाना आन्दोलन की समाप्ति के बाद भी आज भारत में हर कहीं महसूस किया जा सकता है।


पॉल हॉफमैन को जो फोर्ड फाउनडेशन के तत्कालीन अध्यक्ष थे, बाउल्स ने लिखा-"स्थितियां चीन में बदल रही हैं पर यहाँ भारतीय परिस्थितियां स्थिर हैं.....अगर आने वाले चार-पाँच वर्षों में वैषम्य बढ़ता है, या फ़िर अगर चीनी भारतीय सीमाओं को धमकाए बगैर अपना उदारवादी और तर्कसंगत रवैया बनाये रखते हैं .... भारत में कम्युनिस्म का बड़ा भारी विकास हो सकता है। नेहरू की मृत्यु अथवा उनके रिटायरमेंट के पश्चात् यदि एक अराजक स्थिति बनती है तो सम्भव है यहाँ एक ताक़तवर कम्युनिस्ट देश का जन्म हो।" हॉफमैन ने अपने विचार व्यक्त करते हुए एक मज़बूत भारतीय राज्य की जरूरत पर बल दिया -"एक मज़बूत केन्द्र सरकार का गठन होगा, उग्र कम्युनिस्टों को नियंत्रित किया जाएगा....प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को जनता तथा दूसरे स्वतंत्र (बीमार) देशों से तालमेल, सहानुभूति और मदद की अत्यन्त आवश्यकता है। "


नई दिल्ली ऑफिस फौरन स्थापित किया गया, और फोर्ड फाउनडेशन ने कहा- "यह अमरीका से बाहर फाउनडेशन का पहला कार्यक्रम है और नई दिल्ली ऑफिस इसकी क्षेत्रीय कार्रवाइयों का काफ़ी बड़ा हिस्सा पूरा करेगा। इसका प्रभाव क्षेत्र नेपाल और श्रीलंका तक व्याप्त है।

"फोर्ड फाउनडेशन की गतिविधियों का क्षेत्र तय कर दिया गया ( अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट द्वारा) है "- जॉर्ज रोजेन लिखते हैं ,- " हमारा अनुभव है कि एक विदेशी (अमरीकी) सरकारी एजेंसी का ...................में काम करना अत्यन्त संवेदनशील मसला है .......दक्षिण एशिया बड़ी तेजी से फाउनडेशन की गतिविधियों के लिए एक संभावित क्षेत्र के रूप में सामने आया है.........भारत और पाकिस्तान दोनों ही चीन की ज़द में हैं और कम्युनिज्म द्वारा निशाने पर लिए हुए प्रतीत होते हैं। इसलिए वे अमरीकी नीतियों के सन्दर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण बन गए हैं..... ।"

फोर्ड फाउनडेशन ने भारतीय नीतियों पर आधिपत्य जमा लिया है। रोजेन कहते हैं कि "1950 से लेकर 1960 के बीच विदेशी विशेषज्ञों ने भारतीयों के मुकाबले उच्च अधिकार हासिल कर लिए हैं ", और फोर्ड फाउनडेशन तथा (फोर्ड फाउनडेशन/सीआइए फंडेड) एमआईटी सेंटर फॉर इंटरनेशनल स्टडीज "योजना आयोग के आधिकारिक सलाहकार" की तरह कार्य कर रहे हैं। बाउल्स लिखते हैं कि " डगलस एन्समिन्जर के नेतृत्व में, भारत में फोर्ड के कर्मचारी योजना आयोग के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं जो पंचवर्षीय योजनाओं का संचालन करता है। जहाँ भी दरार दिखती है, वे उसे भरते हैं, चाहे वह खेती का, स्वास्थ्य शिक्षा का अथवा प्रशासनिक मामला हो। वे ग्रामीण स्तर के कार्यकर्ता प्रशिक्षण विद्यालयों में साथ जाते हैंसंचालन करते हैं और वित्तीय मदद देते हैं।"

http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/29-economic/1774-2011-08-11-08-12-39

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सोमवार, 2 जनवरी 2012

वॉल स्ट्रीट पर नियंत्रण करो अभियान के 68 प्रदर्शनकारियों की गिरफ़्तारी

वॉल स्ट्रीट पर नियंत्रण करो अभियान के 68 प्रदर्शनकारियों की गिरफ़्तारी
वॉल स्ट्रीट पर नियंत्रण करो अभियान के 68 प्रदर्शनकारियों को कल न्यूयॉर्क में गिरफ़्तार कर लिया गया।
प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार न्यूयॉर्क पुलिस ने बताया कि वॉल स्ट्रीट पर नियंत्रण करो अभियान के अंतर्गत विरोध प्रदर्शन करने वाले 68 प्रदर्शनकारियों को ज़कोटी पार्क से गिरफ़्तार किया गया। ये लोग पुलिस की ओर से खड़ी की गई रुकावटों को पार करके पार्क तक पहुंच गए थे। रिपोर्ट के अनुसार इन लोगों ने पुलिस के हाथों गिरफ़्तार होने से पूर्व लाइटिंग की और पुलिस की ओर से खड़ी की गयी रुकावटों पर खड़े होकर जश्न मनाया। वॉल स्ट्रीट पर नियंत्रण करो अभियान के सदस्यों ने कल पहली जनवरी 2012 की सुबह से ही न्यूयॉर्क के ज़ेकोटी पार्क में पहुंच कर यह घोषणा की थी कि यह जनांदोलन अपने निर्धारित उद्देश्य की प्राप्ति तक जारी रहेगा। आंदोलनकारी अमरीका के विभिन्न राज्यों से ज़ेकोटी पार्क पहुंचे थे। ज्ञात रहे कि यह पार्क गत वर्ष सितंबर के महीने से अमरीका में आर्थिक असमानता के विरुद्ध नियंत्रण करो अभियान का केन्द्र बना हुआ है।
अमरीका के आइवा राज्य में भी वॉल स्ट्रीट पर नियंत्रण करो अभियान के प्रदर्शनकारियों ने अगले राष्ट्रपति चुनाव के प्रत्याशियों के भाषण स्थल पर पहुंच कर इस देश में आर्थिक असमानता से अपने विरोध की घोषणा की। अमरीकी पुलिस ने इन लोगों को जो अपने हाथों में प्लेकार्ड लेकर आर्थिक नीतियों के विरुद्ध नारे लगा रहे थे, गिरफ़्तार कर लिया। अमरीका में ईसवी नव वर्ष ऐसे समय आरंभ हुआ जब इस देश के मीडिया में क्रिस्मस के उत्सवों के आयोजन के बाद पहला समाचार करों, राजमार्गों की चुंगियों और अन्य सामाजिक सेवाओं में वृद्धि पर आधारित था। अमरीका में वॉल स्ट्रीट पर नियंत्रण करो अभियान के कार्यकर्ताओं का कहना है कि बड़ी वित्तीय कंपनियां, बैंक और न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज अमरीकी जनता के जीवन के हर मामले पर छा चुके हैं जिसे अब और सहन नहीं किया जा सकता। विश्वस्त रिपोर्ट के अनुसार अमरीका में हर तीन बच्चों में से एक बच्चा निर्धन है और इसका कारण दूसरे देशों में युद्ध भड़काने और निर्दोष लोगों के जनसंहार के लिए सैन्य बजट में निरंकुश वृद्धि है। (MAQ/N)http://hindi.irib.ir/index.php/component/content/article/26786.html
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रविवार, 25 दिसम्बर 2011

रामनाथ सिंह अदम गोंडवी के साथ हिंदी संस्थान लखनऊ में



हिंदी संस्थान में श्री रामनाथ सिंह अदम गोंडवी के साथ कवि कैलाश निगम, श्री गजेन्द्र सिंह पूर्व विधायक, जवाहर कपूर, वाई.एस लोहित एडवोकेट












रामनाथ सिंह अदम गोंडवी को सम्मान पत्र देते हुए नवीन सेठ, पूर्व विधायक गजेन्द्र सिंह, जवाहर कपूर, वाई एस लोहित







डॉ रामगोपाल वर्मा, बृजमोहन वर्मा , रणधीर सिंह सुमन सम्मान पत्र देते हुए रामनाथ सिंह अदम गोंडवी को








गजेन्द्र सिंह पूर्व विधायक व नवीन सेठ अंग वस्त्रं भेट करते हुए।






















नवीन सेठ श्री रामनाथ सिंह अदम गोंडवी के सम्मान में दो शब्द कहते हुए
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सोमवार, 21 नवम्बर 2011

तिलिस्म-ए-होशरुबा, उर्फ़ पूंजी की अनकही कहानी

[यह लेख हाल में प्रभात खबर के दीपावली विशेषांक में छप चूका है और मेरी हालिया किताब डिजायर नेम्ड डेवेलपमेंट के कुछ अंशों पर आधारित है.]

एक ज़माना था जब इंसान जिंदा रहने के लिए पैदावार किया करता था. बहुत पुरानी बात नहीं है – यही कोई सौ डेढ़ सौ बरस पहले का किस्सा है. आज जब हम जिंदा रहने के लिए नहीं बल्कि ‘जीडीपी’ या ‘सेंसेक्स’ जैसे कुछ अदृश्य देवताओं का पेट भरने के लिए पैदावार करते हैं, तब यह बात हमारी याद्दाश्त से तकरीबन गायब हो चुकी मालूम होती है की ये देवता दरअसल बहुत नए हैं. ‘जीडीपी’ की उम्र बमुश्किल अस्सी साल होगी, और ‘सेंसेक्स’ तो हमारे यहाँ १९७९ में ही वजूद में आया है. याद रखने काबिल बात है की इन दोनों का लोगों के वास्तविक जीवन से कोई रिश्ता नहीं है और यह बिलकुल मुमकिन है कि लोगों के जीवन-स्तर में लगातार गिरावट के साथ साथ आंकड़ों में हमें दोनों में अच्छी खासी बढोतरी दिखाई दे. मसलन, यह संभव है कि आप जंग के वक़्त लगातार जीडीपी में इज़ाफा देखें जब वास्तव में लोगों कि ज़िंदगियाँ बद से बदतर होती जा रही हों.

मगर बात सिर्फ इतनी ही होती तो भी गनीमत होती. किस्सा आगे यह भी है कि आज ‘अर्थव्यवस्थाएं’ सिर्फ उपभोग का सामान ही पैदा नहीं करतीं बल्कि लगातार, हर रोज, हर लम्हा, ‘उपभोक्ता’ भी पैदा करती हैं. उपभोक्ता वह नहीं है जो अर्थव्यवस्थाओं द्वारा पैदा की जाने वाली वस्तुओं का भोग करता है. उपभोक्ता वह नहीं जो अपने ज़रूरत के लिए भोग करता है; न ही वह अपनी जिंदगी को थोड़ा बेहतर बनाने कि फ़िक्र में लगा होता है. बल्कि वह वो शै है जिसके जीवन का ध्येय ही भोग करना है. ‘उपभोक्ता’ दरअसल एक खास किस्म का जीव है जो हाल ही में, गालिबन बीसवीं सदी के मध्य के आसपास, वजूद में आया है और जिसका काम ही है अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए भोग करना. अगर वह ज़रा सी देर के लिए भी भोग करना बंद कर दे तो अर्थव्यवस्थाओं के सामने संकट खड़ा हो सकता है.

मगर उपभोक्ता बनना कोई सीधा और कुदरती मामला नहीं है. हम लोग सब कुदरती तौर पर उपभोक्ता नहीं होते. इस बनाने के पीछे खासी मशक्कत छिपी होति है. आजकल के समाजों में एक पूरा तामझाम, पूरा का पूरा तंत्र है जो लगातार व्यक्ति को उपभोक्ता बनाने में लगा रहता है. फंतासी कि इस दुनिया में व्यक्ति अनजाने ही झोंक दिया जाता है. इस मायालोक में ले जाने वाला एक यान है जिसका नाम है ‘क़र्ज़’ या क्रेडिट, जो पलक झपकते ही आपको उस मुहाने पर ले जा खड़ा कर सकता है जहां अजीबो-गरीब प्राणीयों से उसका साबिका होता है. यह है आज के ज़माने का तिलिस्म-ए-होशरुबा – आधुनिक समाजों का पूंजीवादी उपभोग का यूटोपिया.

दास्तानए-अमीर हम्ज़ा के किस्सों में ‘होशरुबा’ (यानि होश उड़ा देने वाला) नाम के एक तिलिस्मी मुल्क का ज़िक्र आता है जिसका वर्णन एक ऐसे मायालोक के रूप में किया गया है जहां अनगिनत छलावे घात लगाए रहते हैं और जहां चकाचौंध कर देने वाले नजारों के बीच ताक़तवर जादूगरनियाँ और पैशाचिक दानव हर तरफ अपना जाल बिछाए रहते हैं.

हमारे आज के इस यूटोपिया में ऐसा ही कुछ माहौल देखने को मिल सकता है. जगामाते हुए रंगारंग इश्तेहारों कि रौशनी में लीला करते ये प्राणी, यकायक आपको उस मुहाने से उठा कर दूर देश में ले जाने चले आते हैं जहाँ आपका क्रेडिटरुपी यान आपको उतार उतार कर गया है.

आज, इक्कीसवीं सदी में जिसे हम ‘विकास’ कहते हैं, वह दरअसल उस उपभोक्ता के निर्माण कि कहानी है जिसका होना अर्थव्यवस्था के जिंदा रहने भर के लिए ज़रूरी है. और अगर अर्थव्यवस्था को दस फीसद की सालाना रफ़्तार से बढ़ना है तो फिर तो कहने ही क्या. फिर अंदाजा लगाइए कि किस रफ़्तार से और किस पैमाने पर उपभोक्ता पैदा करना पड़ सकता है. अगर आप को यह बात सुन कर हैरत हो रही है तो बस एक बार बीसवीं सदी के इतिहास पर नज़र डालिए. १९२९-३० के ‘ग्रेट डिप्रेशन’ से लेकर – बल्कि उससे भी पहले से – मांग (डिमांड) के गिरने का डर, जिसे अर्थशास्त्री ‘मंदी’ कहते हैं, पूँजीवाद को लगातार सालता रहता है. लिहाजा हर माल बेचने वाला आपको तमाम तरीकों से लुभाने के अलावा, आप के लिए क़र्ज़ का भी इंतज़ाम कर देता है. बीसवीं सदी के आखिर और इक्कीसवीं के शुरुआती दौर के ‘लेट कैपिटलइज्म’ में यह डर खासी शिद्दत से महसूस किया जाता है. लिहाजा एक ऐसी हालत बना दी जाती है कि आप सोचना समझना बंद कर के सब उस दस फीसद बढ़त कि खोज में निकल पड़ें, जिसके बिना, बताया जाता है, मानव समाज कि अब कोई गति नहीं है.

पिछली सदी के आखिरी दशक में सोवियत संघ समेत समाजवादी दुनिया के पतन के बाद तो इस संकटग्रस्त पूँजीवाद के लिए जैसे ‘बिल्ली के भाग से छींका फूटा’. अचानक उसके हाथ एक जन्नत लग गयी. समाजवाद और साम्यवाद के हताश योद्धा भी उसके सामने नतमस्तक हो गए और दुनिया भर में पूँजीवाद के निर्माण के काम में जुट गए. और इस नयी ताकात से लैस होकर सरमाये के एक नए विजयाभियान की शुरुआत हो गयी.

हमारे मुल्क में भी सरमाये का तांडवनृत्य शुरू हो गया. बीस लंबे साल यह नाच बेरोकटोक चलता रहा. पार्टियों और राज्य सरकारों में होड़ लग गयी. अंधाधुध जंगलात कटने लगे; चरों तरफ अवैध खनन के लिए रास्ते खोल दिए गए; मजदूरों की तनख्वाहों और यूनियन अधिकारों पर एकतरफा हमला शुरू हो गया और हर राजनीतिक नेता हाथ में माला लिए पूँजी की महिमा के बखान में और उसका नाम जपने में लग गया.

अब नयी रफ़्तार से दस फीसद की खोज में सारा देश निकल पड़ा. ज़ाहिर है की इस नए यूटोपिया की राह में जो भी आता है वह देशद्रोही ही हो सकता है. एक नया मध्यवर्ग उभर कर सामने आया जिसके मुंह खून का स्वाद लग चुका था. ऐसे में एक नयी नैतिकता का जन्म होता है जिसके तहत ‘अर्थव्यवस्था’ के खम्बे ‘मज़बूत’ करना और अपनी जेबें भरना ‘अस्ल में दोनों एक हैं’. नया मंत्र यही था. आप जितना पैसा बनायेंगे, देश उतना ही समृद्ध होगा. तो फिर अपनी जेबें भरना तो ज़रूरी हो ही जाता है, यह भी ज़रूरी हो जाता है कि उन तमाम लोगों को, जो जंगलों में या बेशकीमती खनिज पदार्थों की ज़मीन पर रहते हैं, सिरे से बेदखल कर के उस सामूहिक सम्पदा को अपने हाथों में कर लिया जाये.

ऐसा करने के दो फायदे है. सामूहिक संपत्ति तो अपने हाथ आ ही जाती है, साथ ही बेदखल आबादी भी शहरी श्रम बाजारों में खपने के लिए आज़ाद हो जाती है. यहीं से शुरू होता है एक और किस्सा. ज़मीन अधिग्रहण के साथ साथ जिसे मार्क्स ने ‘आदिम संचयन’ कहा था.

पिछले सालों में हमारे यहाँ यह प्रक्रिया काफी ज़ोरों से चली है. ज़बरन बेदखली और लूट. देखने में ऐसा लगता है जैसे अब दुनिया भर में सरमाये का परचम कुछ इस तरह लहर रहा है की उसके इस विजयाभियान के आगे कुछ भी टिक नहीं सकता.

मज़े की बात यह है की यही वह दौर है जब पूँजी अपने सबसे संकटग्रस्त रूप में दिखाई पड़ती है. मगर यह संकट मार्क्स या उनके अनुयायियों द्वारा बताये गए संकट से बिलकुल अलग है. ऐसा नहीं है कि इस संकट के चलते पूँजीवाद बस अब चरमरा के गिरने को है. लेकिन, एक मायने में यह संकट इससे भी ज्यादा घातक है. और यहीं छिपी है उसकी एक अनकही दास्तान. यह एक ऐसी सच्चाई जिसे पूँजी और उसके सिद्धान्तकारों के सिवा कोई नहीं जानता.

दरअसल बात यह है कि सचाई ऊपर से चाहे जैसे भी दिखाई दे, हकीकत यह है कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों में पूँजीवाद अपनी जड़ें जमाने में पूरी तरह नाकाम रहा है. मार्क्सवादी हमेशा मानते रहे कि दुनिया भर में पूँजीवाद की पूरी तरह जीत अवश्यंभावी है – तभी जाकर समाजवाद की बुनियाद खड़ी हो सकती है मगर अगर खुद मार्क्सवादियों के बीच हुई बहसों पर नज़र डालें तो पाएंगे की उनमें शुरू से आखिर तक एक अलग ही चिंता दिखाई देती है. मिसाल के तौर पर, १९६०-७० के आसपास विश्व-स्तर पर चली बहस में जो असली चिंता थी वह यही थी की दुनिया के अधिकांश हिस्सों में पूँजीवाद का विकास रुद्ध क्यों है? लातिन अमेरिका के बुद्धिजीवियों ने जिसे ‘डिपेंडेंट डेवेलोपमेंट’ या आश्रित विकास कहा और जिसे आंद्रे गुंदर फ्रांक ने यह कह कर सूत्रबद्ध किया कि ‘अंडरडेवेलोपमेंट’ महज़ विकास का अभाव नहीं है बल्कि पश्चिमी देशों में हो रहे विकास का सीधा नतीजा है, वह इसी बात की तरफ इशारा करता है. उस पूरी बहस में मुद्दा यही था कि जैसा उम्मीद की जाती थी उसके विपरीत दुनिया के अधिकांश हिस्सों में पूंजीवादी विकास हुआ ही नहीं. इसकी व्याख्या करने के लिए कई नए पद ईजाद हुए, मसलन, ‘रिटार्डेड डेवेलोपमेंट’, ‘अर्रेस्टेड डेवेलोपमेंट’, आदि. यह विचार भी रखा गया कि साम्राज्यवाद के आविर्भाव के साथ पूँजीवाद के चरित्र में कुछ ऐसे बदलाव आ गए हैं कि अब वह प्राक-पूंजीवादी संरचनाओं समझौता कर के ही चलता है. लिहाज़ा पुरानी आर्थिक संरचनाओं को वह खत्म नहीं कर पाता.

बहरहाल, १९९० का दशक आते-आते हम देखते हैं कि यह मान्यता धरी कि धरी रह गयी और नव-उदारवादी पूँजीवाद अब नए जोश के साथ कृषि समेत तमाम प्राक-पूंजीवादी संरचनाओं को बिलकुल पुराने अंदाज़ में उखाड़ फ़ेंक रहा है. दरअसल मसला पूँजीवाद के चरित्र में बदलाव का नहीं था. यह बात आज और ज्यादा साफ़ तौर पर समझी जा सकती है कि १९९० के बाद से जो नए तेवर हमें देखने को मिले उनके पीछे एक तरफ समाजवाद के पतन के बाद का बदला हुआ ताक़त का संतुलन था तो दूसरी तरफ नयी सूचना/ तकनीकी क्रांति थी. दोनों ने मिल कर उसे जसी नयी उम्र बख्श दी. मगर क़र्ज़ के बूते पर जी रही व्यवस्था के लिए ज्यादा दिन चलने वाली स्थिति नहीं थी. अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देशों कि मौजूदा हालत भी कुछ इस तरफ इशारा करती है मगर यहाँ हमारा सरोकार अलग है.

जो चीज़ आज एकदम साफ़ साफ़ दिखाई देने लगी है वह यह कि दुनिया के पैमाने पर पूँजीवाद की नाकामी के पीछे एक और ही कहानी है. यह कहानी है ‘उपभोक्ता’ और ‘पूंजीवादी इंसान’ बनाने में उसकी नाकामयाबी की कहानी. यहाँ इस बात की विस्तार से चर्चा की गुंजाईश नहीं है मगर कुल मिलाकर यह कहा जा सकता हैं कि पूँजीवाद कि सफलता इस बात पर मुनहसर है कि लोग अपने आप को मूलतः आर्थिक प्राणी के रूप में देखने लगें. ज़रूरी है कि वे हर वक्त अपने नफ़ा-नुकसान के हिसाब रखें और एक पूँजीवादी मानसिकता तैयार हो. पूंजीवाद एक ऐसा आत्म-केंद्रित इंसान गढ़ना चाहता है जो अपने नफे-नुकसान को सबसे पहले, तमाम इंसानी रिश्तों के ऊपर तरजीह दे. व्यक्तिगत बुर्जुआ संपत्ति इसकी बुनियाद है.

दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के ज़्यादातर जगहों में अधिकांश लोग अब भी उन मूल्यों को नकार कर ही जीते हैं, क्योंकि बुनियादी तौर पर जिंदगी अकेले नहीं जी जा सकती है और आपसदारी उसकी सबसे पहली शर्त है.

इस बात को एक मिसाल देकर बेहतर समझा जा सकता है. एक ज़माने में समझा जाता था कि तीसरी दुनिया के शहरों में फैला ‘अनौपचारिक क्षेत्र’, प्राक-पूंजीवादी जीवन शैलियों का ही अवशेष है जिसे देर सबेर औपचारिक पूंजीवादी क्षेत्र में समा जाना है. ऐसा इस लिए भी कि इस क्षेत्र में पैदावार न तो मुनाफा देता है और न ही उस में काम कर रहे मजदूरों को पर्याप्त वेतन.

हाल के सालों में हुए अध्ययनों से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि घटने के बजाय यह क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है. एक तरफ इसका बढ़ना खुद पूँजी के उस संकट का नतीजा है जिसके फलस्वरूप उसे पुराने अंदाज़ के भीमकाय कारखानों कि जगह ‘आउटसोर्सिंग’ और ‘सब कोंट्राक्टिंग’ आदि का सहारा लेना पड़ता है. मगर दूसरी तरफ इसके इजाफे के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि यहाँ उत्पादन का तर्क अक्सर सिर्फ मुनाफाखोरी नहीं होता बल्कि ज़रूरतों कि पूर्ती के लिए इस क्षेत्र में पैदावार का आयोजन होता है. अंदाजा लगाया गया है कि भारत, मिस्र, इंडोनीशिया, पेरू आदि देशों में इस क्षेत्र में इतनी दौलत पैदा होती है जितनी इन देशों के शेयर बाजारों में उपलब्ध नहीं है. मगर जो बात २००८ के बाद कि आर्थिक मंदी के बाद खुल कर सामने आयी वह यह कि भारत जैसे देश आम तौर पर उसके असर से बच निकले. इसके एक बहुत बड़ी वजह यह थी कि ये स्थानीय ‘अर्थव्यवस्थाएं’ ग्लोबल अर्थव्यवस्था या तंत्र के तर्क से बहुत हद तक आजाद हैं. ये आज भी अपने अलग ही अंदाज़ में चलती हैं. इनकी एक और खास बात इस तजुरबे से सामने आती है: इन कारोबारों में उत्पादन फक़त मुनाफे के लिए नहीं होता और संकट के दूत में भी इन्हें मजदूरों को बरोजगार करने के ज़रूरत नहीं पेश आती. इनके बरअक्स जो औद्योगिक कारखाने ग्लोबल पूंजीवादी बाज़ार के साथ जुड़ गए हैं उनका हश्र काफी बुरा हुआ और वहाँ आर्थिंक मंदी के कारण बेरोज़गारी बेतहाशा बढ़ी.

इस तजुरबे से एक तो यह पता चलता है कि आज भी दुनिया के बहुत बड़े हिस्से ऐसे हैं जहाँ लोग पूंजीवादी बाजार के बहार जीते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि व्यक्तिगत कारोबार के आधार पर पैदावार अपने आप में पूँजीवाद नहीं होता. एक मायने में पिछले समय में हिंदुस्तान भर में पूँजी के लिए सरकारी ज़मीन हड़पने को लेकर जो ज़बरदस्त आन्दोलन चले हैं, वह भी यही दिखाते हैं कि पूँजी कि सत्ता अभी सब जगह कायम नहीं हुई है और उसके खिलाफ संघर्ष जारी हैं.

kafila.org/

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बृहस्पतिवार, 3 नवम्बर 2011

किसी की धरती, किसी की खेती, किसी की मेहनत, फ़सल किसी की



अभी समय है सुधार कर लो ये आनाकानी नहीं चलेगी
सही की नक़ली मुहल लगाकर ग़लत कहानी नहीं चलेगी
घमण्डी वक़्तों के बादशाहों बदलते मौसम की नब्ज़ देखो
महज़ तुम्हारे इशारों पे अब हवा सुहानी नहीं चलेगी
किसी की धरती, किसी की खेती, किसी की मेहनत, फ़सल किसी की
जो बाबा आदम से चल रही थी, वो बेईमानी नहीं चलेगी
समय की जलती शिला के ऊपर उभर रही है नई इबारत
सितम की छाँहों में सिर झुकाकर कभी जवानी नहीं चलेगी
चमन के काँटों की बदतमीज़ी का हाल ये है कि कुछ न पूछो
हमारी मानो तुम्हारे ढँग से ये बाग़बानी नहीं चलेगी
‘उदय’ हुआ है नया सवेरा मिला सको तो नज़र मिलाओ
वो चोर-खिड़की से घुसने वाली प्रथा पुरानी नहीं चलेगी
- उदय प्रताप सिंह
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सीरिया भी क्या लीबिया बनेगा?




इन दिनों सीरिया सुर्खियों में है। क्या यहां का जन-आंदोलन भी �बदलाव के वसंत� से उपजी पश्चिम एशिया देशों की बाकी क्रांतियों की राह पर है? कम-अज-कम अंतरराष्ट्रीय टीवी मीडिया में तो इसी बात का शोर है। जिसे दुनिया ने �अरब बसंत� कहा, उसकी शुरुआत इस साल जनवरी में ट्यूनीशिया से हुई थी। जनक्रांति की इस लहर ने पहले मिस्र में होस्नी मुबारक को सिंहासन से उतार फेंका और उसके बाद कद्दाफी की गद्दी और जान दोनों गई। बीबीसी, सीएनएन और अल-जजीरा जैसे चैनलों के मुताबिक यहां राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ भारी प्रदर्शन जारी हैं। बशर के विरोधी उन पर गैर-लोकतांत्रिक सरकार चलाने का आरोप लगा रहे हैं।
हिंसा की ज्यादातर वारदातें लेबनान और तुर्की से लगते सीरिया के सिर्फ तीन शहरों में हुई हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नौ महीने से जारी संघर्ष में अब तक 3000 लोग मारे जा चुके हैं और 1700 घायल हुए हैं।
अंतरराष्ट्रीय खबरें आपको ये नहीं बतातीं कि तख्तापलट पर आमादा लोग आखिर हैं कौन? इस महीने सीरिया के दौरे पर जाने वाले भारतीय पत्रकारों और शिक्षाविदों के लिए भी यह जानना कठिन था। विरोध का सबसे अहम केंद्र होम्स नाम के शहर को बताया जा रहा है। राष्ट्रपति की सलाहकार बोथेनिया शाबान के मुताबिक वो खुद भी ये नहीं समझ पा रही हैं कि वहां हो क्या रहा है। लेकिन शहर के गवर्नर गाशौन अल-आल की मानें तो विद्रोह में शामिल लोग या तो प्रतिबंधित मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन के सदस्य हैं या फिर तुर्की और लेबनान की सीमा पर सक्रिय अपराधी और तस्कर हैं। गाशौन की राय में झुग्गियों और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले निचले तबके के लोग भी विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा हैं।
गवर्नर के मुताबिक, होम्स में सुन्नी मुसलमानों की बड़ी तादाद है और इन्हें विदेशी ताकतों से धन मिल रहा है। वो कौन-सी ताकतें हैं, ये उन्होंने नहीं बताया मगर उनका इशारा अमेरिका की तरफ जाता है।
होम्स में हमने रिहाइशी इलाके के बीचोंबीच तबाह हुए सेना के ट्रक को देखा। उसी रोज वो गोलीबारी का निशाना बना था। खबरों के मुताबिक, 19 सैनिक हमले में बुरी तरह घायल हुए। हम लोगों को एक नजदीक के अस्पताल का हाल दिखाने के लिए ले जाया गया। यहां हमने बाकी घायलों के साथ गोलियों से जख्मी एक छोटे बच्चे को भी देखा। उसकी मां ने बताया कि गोली तब लगी जब वो गली में घूम रहा था। एक दूसरे कमरे में इलाज करवा रहे सेना के अफसर का कहना था कि वो आम नागरिकों को बचाने की कोशिश में घायल हुआ था।
डॉक्टरों के मुताबिक, उनके अस्पताल में हर रोज ऐसे दस से पंद्रह मामले आते हैं। होम्स के गवर्नर ने ही हमें यह भी बताया कि यहां अब तक सौ से ज्यादा सैनिक जान गंवा चुके हैं। रात के वक्त इस शहर में सन्नाटा पसर जाता है। हम जब यहां से रुखसत हुए, उस वक्त भी अंधेरा था और दहशत को आप हवा में घुला हुआ महसूस कर सकते थे। हमें सेना की मौजूदगी न के बराबर नजर आई। गवर्नर ने सफाई दी कि ऐसा जानबूझकर किया जा रहा है।
सीरिया की सरकार अमेरिका को लीबिया जैसी किसी कार्रवाई के लिए बहाना नहीं देना चाहती। लिहाजा, विद्रोहियों से निबटने में संयम बरता जा रहा है। जैसे ही हम शहर से बाहर निकले, भारी भीड़ ने हमें घेर लिया। ये लोग अल्लाह, सीरिया, असद!! चिल्ला रहे थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि हम भारतीय हैं, नारों का सुर बदला और हमें अल्लाह, सीरिया, हिंद!! सुनाई देने लगा। सीरिया में भारत की लोकप्रियता इन दिनों बुलंदियों पर है। सुरक्षा परिषद् में सीरिया के खिलाफ प्रस्ताव की वोटिंग के दौरान भारत के गैर-हाजिर रहने को यहां समर्थन के तौर पर देखा जा रहा है।
दमिश्क, एलिपो और लातकिया के मेडिटरेनियन रिजॉर्ट में सड़कों पर लोगों ने थैंक्यू इंडिया! कहकर हमारा अभिवादन किया। दुकानदार जिद करके हमें तोहफे देने पर आमादा थे।
तो आखिर सीरिया के हालात की असलियत क्या है? ये साफ है कि होम्स और दो सीमावर्ती शहरों में हालात तनावपूर्ण हैं। यहां कई महीनों से लगातार हिंसा जारी है। लेकिन हिंसा की आग अब तक सीरिया के दूसरे शहरों में नहीं फैली है। दमिश्क और एलिपो सीरिया के दो सबसे बड़े शहर हैं और इनकी साझा आबादी सीरिया की कुल जनसंख्या की 50 फीसदी से भी ज्यादा है। यहां की गलियों में हमें राष्ट्रपति असद के लिए समर्थन साफ तौर पर नजर आया। ऐसे लोग भी उन्हें खुदमुख्तार सीरिया की पहचान के तौर पर देखते हैं, जिन्हें लगता है कि चुनाव और आर्थिक सुधारों के वायदे पर वो खरे नहीं उतरे हैं।
मध्य-पूर्व के देशों में एक के बाद एक तानाशाही सरकारों के पतन और चरमपंथियों की हिंसा के जख्मों ने सीरियाई नागरिकों को एक करने में भूमिका अदा की है। यहां के ज्यादातर लोग अमेरिका और नाटो की मदद से तख्तापलट का ख्वाब देख रहे इस्लामी कट्टरवादियों को अलग-थलग करने के लिए प्रतिबद्घ हैं। लातकिया की गलियों में शेशे (एक प्रकार का हुक्का) के कश उड़ाती नौजवान लड़कियों का भी यही कहना था कि उन्हें अमेरिकी दखल किसी सूरत में मंजूर नहीं।
अगर ऐसा है तो ऐसा ही सही। लेकिन वो शायद ये नहीं जानतीं कि एकध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अब भी अंकल सैम का सिक्का चलता है। दस साल पहले अमेरिका और सहयोगी देशों ने सद्दाम का खेल खत्म किया और अब कद्दाफी को किसी मुजरिम जैसा अंजाम बख्शा गया है। मुझे आशंका है कि दुनिया को पहला अक्षर देने वाली इस ऐतिहासिक सरजमीं का हश्र भी वही न हो जो लीबिया, यमन और मिस्र का हुआ।
इराक और लीबिया में जो इबारत खून से लिखी गई वो यहां भी लिखी जाएगी। ये सच है कि कद्दाफी क्रूर तानाशाह था। उसने अपना और अपने कुनबे का खजाना भरा। लेकिन उसने देश के काले सोने की दौलत को लीबिया के आधुनिकीकरण में लगाया था। वहां के उभरते मध्यवर्ग की मदद के लिए हाथ हमेशा आगे बढ़ाया। हर कोई जानता है उसने किस तरह युवा जोड़ों को घर और उच्च शिक्षा के लिए ब्याजमुक्त गण दिए।
सद्दाम हुसैन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उसके राज में इराकियों ने अमीरी का जो दौर देखा, उसके बारे में बाकी दुनिया ने सुना भी नहीं था। उसके राज में डीजल और पेट्रोल सिर्फ इराकियों के लिए नहीं बल्कि पड़ोसी सीरिया और जॉर्डन के लिए भी मुफ्त था। सरकारी दुकानों में हर हैसियत के इराकी को जरूरत का सामान बिना कीमत वसूले दिया जाता था। सद्दाम का शासन हमेशा पंथनिरपेक्ष भी रहा, हालांकि असहमति को कुचलने में उसका रिकॉर्ड भी दागदार रहा। उत्तरी इराक के गांवों में सद्दाम ने हजारों कुर्द नागरिकों को मरवाया। कुवैत पर हमले के बाद शिया समुदाय के विद्रोह को उसके सैनिकों ने बेरहमी से रौंदा। राजनीति में न पड़ने की शर्त पर उसने अपने लोगों का ख्याल रखा।
पश्चिमी देशों ने उस पर अमेरिका के खिलाफ अल-कायदा से सांठगांठ का आरोप लगाया। उसे ताकत के जोर पर अपदस्थ करने के लिए घातक हथियारों की मौजूदगी को भी वजह बताया गया। बाद में अमेरिका और ब्रिटेन का ये दावा खोखला निकला। उस वक्त के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश दम भरते रहे कि सद्दाम को हटाकर उन्होंने इराक को लोकतंत्र का तोहफा दिया है। दस साल बाद भी इराक हिंसा की जद में है। तेल के इतने भंडार होने के बावजूद अब घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए इराक के यहां कुवैत से तेल आयात होता है।
अगर ट्यूनीशिया, मिस्र, यमन, लीबिया की तरह अमेरिका राष्ट्रपति असद को अपदस्थ करने में कामयाब हो भी जाता है तो भी मध्य-पूर्व में उसकी मुश्किलें हल होने वाली नहीं हैं। लीबिया में सत्तारूढ़ काउंसिल ने शरिया कानून लागू करने का ऐलान कर दिया है। ट्यूनीशिया में कट्टरवादी इनहदा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। मिस्र की सियासी हवा भी मुस्लिम ब्रदरहुड की ओर बहती लगती है।
सत्ता परिवर्तन के बाद जिस तरह इन देशों के नए नेता कट्टरवाद की ओर मुड़ रहे हैं, उसी की प्रतिक्रिया में मध्य-पूर्व देशों में तकरीबन 80 मानवाधिकार और धर्मनिरपेक्ष संगठन आवाज उठाने को मजबूर हुए हैं।
अगर सीरिया भी चरमपंथ को चुनता है तो मुझे व्यक्तिगत तौर पर निराशा होगी। सड़कों के किनारे बने रेस्तराओं में शेशे यानी हुक्के के कश उड़ाती, आधुनिक सीरियाई महिलाएं दमिश्क या लातकिया की गलियों को ज्यादा खूबसूरत बनाती हैं। सीरिया सही मायनों में एक बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां की दस फीसदी आबादी ईसाई है। दमिश्क और ऐतिहासिक शहर एलिपो के कुछ हिस्सों में आपको आर्मीनियाई, यहां तक कि यहूदी आबादी भी मिल जाएगी।

सतीश जैकब


संपर्क सूत्र : 8860139000
(लेखक पी-7 चैनल के एडीटर-इन-चीफ हैं)
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सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

'चारों ओर था मौत का मंजर, फिर भी महफूज थे हम इंडियन

पूरे लीबिया में फैले असंतोष और धमाकों के बीच कहीं कोई लूटपाट या अभद्रता नहीं हुई, आम लोगों के भरोसे पूरी तरह महफूज थे भारतीय। लीबिया से हाल ही में लौटी डॉ. अंजना तिवारी ने बताएं वहां के हालात।

भोपाल। फरवरी 2011 में इजिप्ट में फैली बदलाव की आग से लीबिया में भी विद्रोह लपटें भड़क गईं। शुरु में जब मैंने अशांति की बातें सुनी तो इन्हें कोरी अफवाह समझा क्योंकि अब तक लीबिया में रहते-रहते मुझे 3 साल से अधिक हो चुके थे और मैंने वहां के लोगों को बेहद सुकून में रहते देखा था। फरवरी के आखिर तक मैंने बेंगाजी की सड़कों पर हजारों लोगों को हाथों में हथियार लिए विरोध के नारे बुलंद करते हुए देखा तो खुद को यह यकीन दिलाना पड़ा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। मार्च की शुरुआत तक तो भूमध्य सागर के किनारे बसा यह खूबसूरत देश पूरी तरह सुलग उठा। बदलाव की चिंगारी को दबाने के कर्नल गद्दाफी के प्रयासों ने इसे और ज्यादा भड़का दिया था और जब मैं वापस भारत लौट रही थी। मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा था इस बेहद खूबसूरत देश ऐसा कहर क्यों बरपा है। इस देश में जहां न खाने की दिक्कत है न रहने की कोई समस्या। जहां के लोग शायद दुनिया के सबसे भोले लोगों में से एक हैं। जहां आप रात में भी हजारों दीनार लेकर अकेले घर आ सकते हैं। जहां के लोग अपने मेहमान को बड़ा ऊंचा दर्जा देते हैं, आखिर उस देश में ऐसा क्यों हो रहा है?


आप के लिए जान पर खेल जाएंगे हम ...


फरवरी के अंतिम सप्ताह में हमने लीबिया छोड़ने की तैयारी शुरु की। स्थानीय परिचित लोगों ने हमे रोकने का हरसंभव प्रयास किया। वो बार-बार यही कहते रहे कि आप लोगों को कोई खतरा नहीं होगा। हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन अपनी जान पर खेलकर भी आपकी हिफाजत करेंगे। वो बार-बार कहते कि आपकी सरकार वापस बुला रही है तो चले जाइये लेकिन हम चाहते हैं कि आप लोग यहीं रहे। 28 फरवरी की शाम को जब हम लीबिया छोड़ रहे थे तो वहां के लोगों की आंखे नम थी। मेरे साथी स्थानीय प्रोफेसरों और शिक्षकों ने लीबिया में जो हुआ उसके लिए माफी मांगी और यह विश्वास जताया कि जल्द ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन बेहद बेमन से अपने दोनों बच्चों के साथ उसी शाम मैं जितना हो सकता था सामान लेकर जहाज पर चढ़ी। जहाज पर हम सभी के पास अपनी कमाई थी, कीमती चीजों थीं लेकिन लूटमार तो दूर, किसी ने पूछा भी नहीं कि आप क्या ले जा रहे हैं। भारत सरकार ने वापसी के लिए अच्छा इंतजाम किया था। हम एक मार्च की सुबह बेंगाजी से इजिप्ट के एलेक्जेंड्रिया के लिए चले। ढाई दिन बाद एलेक्जेंड्रिया पहुंचे। चार मार्च को एयरइंडिया की फ्लाइट की हमें दिल्ली ले आई। मैं वापस हिंदुस्तान पहुंच चुकी थी। मैं उस खूबसूरत देश को जलता छोड़ आई थी जहां मेरे ढेर सारे छात्र भविष्य में चमकने की तैयारी कर रहे थे। लौटते वक्त मुझे उनकी चिंता थी। वहां के भोले-भाले लोगों की चिंता थी। जो शायद दुनियादारी के लिए जरूरी उतना कपट नहीं जानते। आज जब हिंदुस्तान में मैं लीबिया पर पश्चिमी सेनाओं के हमले के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही ख्याल आता है कि वहां के लोग मानवाधिकारों के नाम पर किए जा रहे इन हमलों की अंतर्कथा को उसी शिद्दत से समझ पा रहे होंगे। बस यही दुआ है कि यह खूबसूरत देश बर्बाद न हो। लोगों में वही जिंदादिली बरकरार रहे।


धमाके होते रहे पर कभी नहीं लगा डर...


मैं बेंगाजी के पॉश इलाके में पांचवी मंजिल पर किराए के मकान में रहती थी। मैंने और मेरे दोनों बच्चों ने बेंगाजी की सड़कों पर गुजरते गद्दाफी की सेनाओं के टैंकों को अपनी बालकनी से देखा। हम पूरे दिन विरोध प्रदर्शन देखते रहे। हमने देखा कि गद्दाफी के सैनिक विद्रोहियों को प्यार से मनाने का प्रयास कर रहे थे। शुरू में उन्होंने समझाने की कोशिशें की लेकिन बाद में वो हिंसक हो गए। हमने गोलियों की गूंज सुनी। फिर धमाकों की आवाजें सुनी लेकिन कभी डर नहीं लगा। क्योंकि मेरी मकान मालकिन हमेशा यह विश्वास दिलाती थी कि वो अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमें कुछ नहीं होने देंगी। संघर्ष के दिनों में स्थानीय लोग हमेशा मदद को तैयार थे। जब हवाई हमले हो रहे थे तब मुझसे बार-बार कहा जा रहा था कि मैं बच्चों के साथ नीचे वाले फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊं। यह उनका भरोसा ही था कि गोलियों और धमाके के बीच भी मैं हम खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे।


सिर्फ बदलाव के लिए विद्रोह...

लीबिया में रहते हुए मैंने कभी भी गद्दाफी के विरोध में कुछ नहीं सुना। इसके दो बड़े कारण हैं एक तो यह कि गद्दाफी बेहद शक्तिशाली हैं और उन्होंने कभी अपने खिलाफ किसी आवाज को उठने ही नहीं दिया और दूसरी यह कि वहां के लोगों की कोई भी ऐसी आवश्यकता नहीं है जिसे सरकार पूरा न करती हो। घर, खाना, पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही सरकार देश की आय का एक निश्चित हिस्सा लोगों में बांटती हैं। यहां के लोगों को किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन जब विद्रोह हुआ तो उसके समर्थन में आवाजें उठने लगीं। लीबिया के लोगों ने कभी भी लोकतांत्रिक आजादी को महसूस नहीं किया था। वो खुलकर बोल नहीं सकते थे। गद्दाफी जो फैसला लेते वो सबको स्वीकार करना होता। मैंने बेंगाजी की दीवारों पर बदलाव के नारे लिखे देखे। विद्रोह और उसका समर्थन कर रहे लोगों ने विद्रोह की सिर्फ एक ही बड़ी वजह बताई और वो यह थी कि लोग अब बदलाव चाहते थे। वो सरकारी फैसलों में खुद को शामिल करना चाहते थे। वो गद्दाफी के फैसलों को मानने के बजाए अपनी बात भी रखना चाहते थे। वो अपने हुक्मरानों को चुनने का अधिकार चाहते थे। बदलाव की चाहत ही वहां के लोगों के विद्रोह की बड़ी वजह थी। जो लोग पहले खामोश थे उन्होंने भी विद्रोह की आवाज में सुर मिला लिया था। मेरी मकान मालिक की बेटी जिसे मैंने कभी भी गद्दाफी के खिलाफ बोलते नहीं सुना था वो भी अब विद्रोहियों के समर्थन में बातें कर रही थी।


मॉडर्न मुस्लिम राष्ट्र है लीबिया...


लगभग तीन बरस पहले जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए लीबिया जा रही थी तो मेरे मन में यही डर था कि यह एक रूढ़िवादी मुस्लिम देश होगा, जहां महिलाओं को घरों में कैद रखा जाता होगा। लेकिन जब में वहां पहुंची तो स्थिति को बिल्कुल ही अलग पाया। लीबिया में महिलाएं पुरुषों से समान आजाद हैं। बैंकों, अस्पतालों, क़ॉलेजों में काम करने वाले कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा हैं। शायद ही कोई काम ऐसा होगा जिसमें महिलाएं सेवाएं न देती हों। बस इतना सा फर्क है कि वो जहां भी होती हैं पर्दे का ख्याल रखती हैं। वो बुर्के में बंद नहीं रहती, सिर पर स्कार्फ बांधती हैं। किसी भी अन्य मुस्लिम राष्ट्र की तरह यहां भी महिलाएं पुरुषों से दूरी बनाए रखती हैं। लेकिन वो घर में कैद नहीं रहती। वो देश को चलाने में बराबरी से योगदान देती हैं।


कबीलों में बंटा हैं लीबिया...


लीबिया का समाज कई कबीलों में बंटा है जिसमें सबसे ताकतवर कबीला गद्दाफी का है। 1969 में लीबिया के शासन पर कब्जे के बाद से ही गद्दाफी ने तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अपने कबीलें के लोगों की भर्ती की। गद्दाफी का कबीला ताकतवर होता गया। गद्दाफी के कबीले की बढ़ती ताकत बाकी कबीलों में असंतोष पैदा करने लगी लेकिन गद्दाफी ने देश को इस तरह से शासित किया कि किसी ने भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि गद्दाफी ने देश की सेना को भी कमजोर ही रखा और सुरक्षा की कमान अपने कबीले के लोगों के हाथ में दी। विद्रोह का मुख्य कारण अन्य कबीलों के लोगों में व्याप्त असंतोष ही है।


बेहद खूबसूरत देश है लीबिया...


आमतौर पर लीबिया को रेगिस्तान समझा जाता है। लीबिया का एक बड़ा इलाका रेगिस्तान ही है लेकिन ज्यादातर आबादी शहरों में रहती है। बेंगाजी और त्रिपोली में ही लगभग आधी आबादी रहती है। यहां का मौसम बेहद खुशनुमा है। सर्दियां जनवरी के दूसरे पखवाड़े में शुरु होती हैं और फरवरी का अंत आते-आते चली जाती हैं। गर्मी कभी भी इतनी नहीं पड़ती की पंखा चलाना पड़े। साल के 12 महिने रातों में हल्की सर्दी पड़ती है और आप बिना चादर ओढ़े नहीं सो सकते। लीबिया के शहरों को नए तरीके से बसाया गया है। सबकुछ बेहद व्यवस्थित है। लीबिया में आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अफ्रीका में हैं।


बिलकुल नहीं होते हैं अपराध...

लीबिया के लोगों में एक चीज है जो समान रूप से पाई जाती हैं और वो हैं उनका भोलापन। आप कहीं भी जाइये आपको बेहद सच्चे, सीधे और सरल लोग मिलेंगे। वो कोई दिखावा नहीं करते हैं। पड़ोसी भी पड़ोसियों की बुराई नहीं करते। अपराध की दर वहां जीरो फीसदी से भी कम है। दो सालों में मैंने लूटमार की कोई वारदात नहीं सुनी। मैं अमेरिका, ब्रिटेन, मिस्त्र, जार्डन और दुनिया के अन्य कई मुल्कों में गई हूं लेकिन लीबिया जैसे सरल और भोले लोग मैंने कहीं नहीं देखे।


भारतीयों का करते हैं बेहद सम्मान...

लीबिया में भारत के लोगों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। वहां अन्य मुल्कों के भी लोग हैं लेकिन जितना सम्मान भारत के डॉक्टरों और प्रोफेसरों को मिलता हैं उतना शायद कहीं के लोगों को भी नहीं मिलता। जैसे ही आप वहां के लोगों को बताते हैं कि आप भारत से हैं उनका व्यवहार बेहद सम्माननीय हो जाता है। वो मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इंग्लिश कम ही लोग बोलते हैं लेकिन जो आपको समझते हैं वो हर संभव तरीके से आपकी मदद करते हैं।

(डा। अंजना तिवारी, सर गैरयूनिस यूनिवर्सिटी बेंगाजी (लीबिया) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
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शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

'गद्दाफी' के बारे में ये बातें जानते ही भौंचक्के रह जाएंगे आप

दुनिया भर में क्रूरता का पर्याय और ज़ालिम तानाशाह बताए गए लीबिया के पूर्व शासक जनरल गद्दाफी आज इस दुनिया में नहीं हैं।गद्दाफी भले ही अपने शासन काल में बर्बर रहे हों लेकिन इस बात को भी नहीं झुटलाया जा सकता कि इस शासक ने अपनी प्रजा के लिए जो और जितना किया उतना शायद ही दुनिया में कोई किसी के लिए करता हो।

गद्दाफी से जुड़ी ऐसी ही कई बातें हैं जिन्हें जानते ही आप की आंखें भी खुल जाएंगी साथ ही इस 'कथित' तानाशाह को लेकर बनी आपकी सोच भी पूरी तरह परिवर्तित हो जाएगी। तो आईए जानते हैं गद्दाफी और लीबिया के बारे में कुछ ऐसी बातें जिन्हें आज तक दुनिया में बहुत ही कम लोग जानते हैं...।

1)लीबिया में जनता को बिजली का बिल माफ़ रहता था,यहां लोगों को बाकी मुल्कों की तरह बिजली का बिल जमा नहीं करना पड़ता था(इसका भुगतान सरकार करती थी)।

2)लीबिया सरकार(गद्दाफी शासन)आपने नागरिकों को दिए गए ऋण(लोन)पर ब्याज नहीं वसूलता था। मानें आपको इंटरेस्ट फ्री लोन बड़ी आसानी से मिलता था और चुकाना केवल मूलधन पड़ता था।

3)लीबिया में 'घर' मानव अधिकार की श्रेणी में थे।लीबिया के प्रत्येक व्यक्ति को उसका खुद का घर देना सरकारी जिम्मेदारी थी। आपको बाते दें कि गद्दाफी ने कसम खाई थी कि जब तक लीबिया के प्रत्येक नागरिक को उसका खुद का घर नहीं मिलता वह अपने माता पिता के लिए भी घर नहीं बनवाएगा यही कारण था कि गद्दाफी की मां और पत्नी अज भी टेंट में ही रहती हैं।

4)लीबिया में शादी करने वाले प्रत्येक जोड़े को गद्दाफी कि तरफ से 50 हज़ार डॉलर की राशी दी जाती थी।(दुनिया में शायद ही कोई सरकार या शासक ऐसा करता हो)।

5)लीबिया में समस्त नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ पूरी तरह से फ्री थीं। जी हां लीबियाई नागरिकों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं पर आने वाला सारा खर्चा गद्दाफी सरकार खुद वहां करती थी।

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शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

हर छह में से एक अमरीकी ग़रीबी से त्रस्त



बेरोज़गार

अमरीका में बेरोज़गारी की दर लगातार नौ फीसदी से ऊपर बनी हुई है.

दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश अमरीका में जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अमरीका में गरीबी में रह रहे लोगों की संख्या चार करोड़ 62 लाख के रिकार्ड स्तर तक पहुंच चुकी है.

आंकड़ों के मुताबिक हर छह में से एक अमरीकी ग़रीबी से त्रस्त है.

अमरीका के जनगणना ब्यूरो की ओर से इक्ट्ठा किए गए 1959 से अब के आंकड़ों में यह संख्या सबसे ज़्यादा है.

आंकड़ों कहते हैं कि 2009 में ग़रीबी का स्तर जहां 14.3 फीसदी था वहीं 2011 में यह 15.1 फीसदी हो गया है.

बेरोज़गारी की दर

"बैंक ऑफ़ अमरीका ने कहा है कि वो तीस हज़ार नौकरियों की कटौती करने जा रहा है. अगले कुछ सालों में नौकरी में होनेवाली ये कमी, ख़र्च में कटौती की योजना का हिस्सा है."

अमरीकी परिभाषा के मुताबिक 22,314 डॉलर सालाना से कम की आय वाले चार लोगों के परिवार और 11,139 डॉलर सालाना से कम की आय वाले एकल व्यक्ति को ग़रीब की श्रेणी में रखा जाता है.

ग़रीबी के स्तर में ये बढ़ोत्तरी जहां 1993 से अब तक की सबसे बढ़ी बढ़ोत्तरी है वहीं पिछले लगातार चार साल से गरीवों की संख्या में बढ़ोत्तरी जारी है.

जनगणना ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2010 में ही एक अमरीकी घर की औसत सालाना आय 2.3 फीसदी की दर से गिरते हुए 49,445 तक पहुंच गई थी.

अमरीका की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को दिखाते ये आंकड़े उस समय आए हैं जब अमरीका में बेरोज़गारी की दर लगातार नौ फीसदी से ऊपर बनी हुई है.

इससे पहले मंगलवार को बैंक ऑफ़ अमरीका ने कहा कि वो तीस हज़ार नौकरियों की कटौती करने जा रहा है.

अगले कुछ सालों में नौकरी में होनेवाली ये कमी ख़र्च कटौती योजना का हिस्सा है. ये कमी बैंक के कुल कामगारों के तादाद का 10 प्रतिशत है.

नौकरी में कटौती की बैंक की घोषणा उसी दिन आई है जिस दिन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने देश में रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए 447 अरब अमरीकी डॉलर की योजना कांग्रेस को भेजी.

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संपादक की कलम से

देश के बदलते सामाजिक परिवेश में जहाँ समाज का तक़रीबन हर वर्गव्यवसायीकरण एवं स्वार्थ हित के आवरण में लिपट चुका है , मीडिया भीइस से बच नहीं पाया किसी जमाने में देश हित लोकहित के लिएसमर्पित समाज का यह प्रमुख अंग जिसे चौथे खम्भे की उपमा दी जाती है, अब उस स्तिथि में जा पहुंचा है, कि यह सब हित उसे तब याद आते हैं जबउसके हितों पर कोई आंच राही होती है ऐसे में प्रिंट मीडिया से लेकरइलेक्ट्रोनिक मीडिया ( जो अधिकांशत: साम्राज्यवादियों की आवाज है) तक की जनता की नजरों मेंविश्वसनीयता में कमी देखी जा रही है आज जनता अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने वाले समाचार पत्रों एवं चैनलों को तरस रही है जनता के इसी एहसास के करीब पहुँच कर उसके अन्दर फिर से मीडिया के लिए विश्वास पैदा करने के उद्देश्यसे एक प्रयास "" लोक वेब मीडिया" के तौर पर किया गया हैइस समाचार सेवा में अन्तराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रादेशिक स्थानीय समाचार उसके भीतर के समाचारों पर बेबाक टिप्पणीयां, इसकी विशेषताओं में शामिलरहेंगीवर्तमान समय का मीडिया, साम्राज्यवादी, सामन्तवादी, धार्मिक कट्टरपंथ एवं विभिन्नराजनीतिक विचारों के आधार पर विभाजित दिखता हैनिष्पक्ष, निर्भीक एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण के करीबयदि हम पहुँच सके तो इसे हम अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि समझेंगेआशा है की हमारा यह छोटा सा प्रयासभले ही नक्कार खाने में तूती की आवाज सामान हो, परन्तु मील का पत्थर अवश्य साबित होगा
-मो॰ तारिक खान

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