अपनी केचुल बदलती भाजपा

Posted by तारिक खान

लोकसभा चुनाव में चारो खाने कांग्रेस से चित्त होने के पश्चात भाजपा ने अपनी पुरानी केचुल यानी अडवाणी को उतार फेंका है, अब वह पार्टी के लिए कोच की भूमिका निभाएंगे और लोकसभा में अपनी पुरानी प्रतिद्वंदी सोनिया गाँधी से दो-दो हाथ करने सुषमा स्वराज मैदान में उतर रही हैं । साथ ही अडवाणी के चहेते राजनाथ सिंह भी बड़े बे- आबरू होकर अध्यक्ष की कुर्सी से उतारे जा चुके हैं । इस पद पर संघ ने अपनी राईट च्वाइज़ को सुशोभित किया है जिनका बचपन व जवानी दोनों ही संघ के आँगन में बीता है । दरअसल संघ ने खूब सोच समझ कर टू टायर व्यवस्था इस बार की है । पार्टी संघ संचालक चलाये और सदन में सुषमा स्वराज कांग्रेस से नाराज दलों को अपनी लच्छेदार बातों से उसी प्रकार रिझा कर लायें जैसे कि पार्टी के अवकाश प्राप्त लीडर अटल बिहारी बाजपेई उदारवादी एवं धर्म निरपेक्ष मुखौटा चढ़ा कर अन्य दलों को साथ मिला कर किया करते थे...

हम होगें कामयाब एक दिन

Posted by मुहम्मद शुऐब एडवोकेट

16 नवम्बर 2009 की बात है। मैं अपने कमरे में पहुंचा, देखा सहारा न्यूज पर रात के 9ः38 बजे दिखाया जा रहा था कि 6 शेरों का एक झुंड भैंस के बच्चे पर टूट पड़ा, पास में नदी थी, जो उस नदी में जा गिरा। नदी में मगर, जिसके बारे में मुहावरा है-नदी में रहकर मगर बैर, वही मगर था जो अपना शिकार देख आगे बढ़ा और जबड़े में दबोच लिया। एक तरफ से शेर भैंस के उस बच्चे को पकड़कर खींच रहे थे, दूसरी तरफ जल का राजा मगर अपने शिकार को अपनी तरफ खींच रहा था। आखिर में हार मगर के हाथ लगा और शिकार झुंड के हाथ यानि शेर नहीं शेरों के हाथ ...

संसद में महंगाई पर चर्चा का रहस्य

Posted by सुमन

संसद के अन्दर सांसदों ने महंगाई पर जोर-शोर से चर्चा की उनकी चिंता जनता के प्रति नहीं थी अपितु अपनी सुविधाओं को महंगाई की चर्चा के बहाने बढ़ाना चाहते थे । महंगाई पर चर्चा की और अपनी सुविधाओं में बढ़ोत्तरी की । मंत्री 'वेतन एवं सुविधाएं ( संशोधन ) विधेयक 2009' पास कर लिया। इस विधेयक के अनुसार मंत्री व उनके निकट सम्बन्धी वर्ष भर में 48 मुफ्त हवाई यात्राएं करने का प्राविधान है । एक यात्रा में कितने लोग शामिल हो सकते हैं उसका कोई उल्लेख नहीं किया गया है । यह विधेयक बिना किसी चर्चा के कुछ ही मिनटों में पारित हो गया. ...

कोपेनहेगन वार्ता का दुःखद अंत

Posted by मीनाक्षी अरोरा

अंततः जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन वार्ता का दुःखद अंत हो चुका है। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन के बेला सेंन्टर में चले 12 दिन की लंबी बातचीत दुनिया के आशाओं पर बेनतीजा ही रही। कोपेनहेगन सम्मेलन में बातचीत के लिए जुटे 192 देशों के नेताओं के तौर-तरीकों से यह कतई नहीं लगा कि वे पृथ्वी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। दुनियाँ के कई बड़े नेताओं ने बेशर्मी के साथ घोषणा की कि ‘यह प्रक्रिया की शुरुआत है, न की अंत’। 192 देशों के नेता किसी सामुहिक नतीजे पर नहीं पहुँच सके, झूठी सदिच्छाओं के गुब्बारे के गुब्बार तो बनाए गए, पर किसी ठोस कदम की बात कहीं नहीं आई। कोपेनहेगन सम्मेलन मात्र एक गर्मागर्म बहस बनकर खत्म हो चुकी है. ...

कुत्ते की जाति - मालिक की जाति होती है ?

Posted by पुष्पेन्द्र कुमार सिंह

भारतीय समाज में कुत्तों की भी जाति होने लगी है। कुत्ते की वही जाति होती है जो उसके मालिक की जाति होती है। अभी हाल में मध्य प्रदेश के मुरैना जनपद में सुमावली थाना क्षेत्र के मुत्ता ठाकुर के कुत्ते को गाँव के दलित चन्दन जाटव व उसकी पत्नी सुनीता जाटव ने अपने घर की रोटी खिला दी थी। जिससे ठाकुर जाति के कुत्ते को दलित की रोटी खाने से उसकी जाति को ठेस पहुंची। जिस पर मुत्ता ठाकुर ने दोनों लोगों पर 15 हजार रुपये का जुर्माना का दंड दे दिया। जिसे अदा न कर पाने के कारण दलित दंपत्ति गाँव छोड़ कर भाग गया। सिटी मजिस्टेट ने हरिजन कल्याण थाना से उक्त मामले की जांच कराई, मामला सत्य पाया गया। पुलिस अभी तक आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पायी है। भारतीय समाज में जाति के नाम पर आज भी अत्याचार हो रहे हैं। जातिगत अत्याचारों के कारण एक बहुत बड़ी आबादी अपने को प्रताड़ित महसूस करती है जाति व्यवस्था भारतीय समाज को आगे बढ़ने से रोकती है हम सैकड़ों वर्षों के पूर्व जातिगत अहम् को लेकर फंसे हुए हैं। उन्नति के लिए हमको इस सोच से बाहर निकलना होगा।

रविवार, 19 जून 2016

गुजरात में कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा ने सपा-एनसीपी प्रत्याशियों को पैसे देकर किया खड़ा!


गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने क्या कांग्रेस को हराने के लिए वोटकटवा की भूमिका में सपा और एनसीपी जैसे छोटे दलों के उम्मीदवारों को पैसे देकर खड़े किए। एस्सार फोन टैपिंग की बातचीत को सही मानें तो ऐसा हकीकत में हुआ।

खुलासा,पार्ट-5: गुजरात में कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा ने सपा-एनसीपी प्रत्याशियों को पैसे देकर किया खड़ा!
नवनीत मिश्र
Email  navneetreporter007@gmail.com

नई दिल्लीः गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने क्या कांग्रेस को हराने के लिए सपा और एनसीपी जैसे छोटे दलों  से गठजोड़ कर उनके उम्मीदवारों को पैसे देकर खड़े किए। सुप्रीम कोर्ट के वकील सुरेन उप्पल को एस्सार से हासिल फोन टैपिंग सीडी की बातचीत को सुनकर यह सनसनीखेज खुलासा होता है। सीडी इसलिए अभी सार्वजनिक नहीं हो रही क्योंकि सीडी में संबंधित शख्सियतों की बातचीत लैब जांच के बाद कानूनी पुष्टि हो सकती है। इस बाबत वकील उप्पल ने दो महीने पहले ही पीएमओ को शिकायत कर फोन टैपिंग की सीबीआई जांच की मांग की है।

अंबानी ने अमर से कहा, 25 लाख प्रति कंडीडेट लो
फोन टैपिंग से जुडी़ एक सीडी में सपा नेता अमर सिंह और अनिल अंबानी के बीच राजनीतिक डीलिंग से जुड़ी बातचीत हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के वकील सुरेन उप्पल की सीडी के हवाले से वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह ने इंडिया संवाद के एक्जीक्यूटिव एडिटर दीपक शर्मा से टेलीफोन की बातचीत का विश्लेषण किया। सिंह ने कहा कि बातचीत से पता चलता है कि गुजरात के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सपा और एनसीपी से डील हुई। जिससे दोनों पार्टियों ने चुनाव में हर सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे। ताकि कांग्रेस का कुछ वोट कटने से पार्टी को फायदा हो। अंबानी अमर सिंह से कह रहे हैं कि  एनसीपी जैसी छोटी पार्टी ने हर कंडीडेट दस लाख लिए, आपकी पार्टी तो बड़ी है कम से कम 25 लाख मांगने चाहिए। 
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रविवार, 12 जून 2016

आन्दोलन से झण्डे बनते है न कि झण्डो से आन्दोलन

आन्दोलन से झण्डे बनते है न कि झण्डो से आन्दोलन।

      यह विचार भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने लोक संघर्ष पत्रिका के प्रधान सम्पादक डा0 रामगोपाल वर्मा की याद में श्रृद्धांजलि सभा में अपने उद्बोधन के दौरान व्यक्त किए।

      उन्होंने ने कहा कि आज देश में जन मुद्दों को लेकर आन्दोलन नहीं हो रहे है बल्कि जन मुद्दों से भटकाने के लिए आन्दोलन किये जा रहे है। यह साम्राज्यवादी सोच की समझी बूझी रणनीति है वह चाहते है कि देश में विचार शून्य माहौल उत्पन्न कर दिया जाय ताकि उनके उत्पाद बिक सके।

      श्री राकेश ने कहा कि डा0 राम गोपाल वर्मा उस पीढ़ी के साम्यावादी विचारधारा के व्यक्ति थे जो अपने विचारों के बल पर समाज में फैली विसंगतियों एवं सामाजिक दुराव को दूर करने के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे। उनको सच्ची श्रृद्धांजलि हम उनके विचारों को क्रियान्यवित करके ही दे सकते है ताकि सामाज व देश का उद्धार हो सके।

      श्रृद्धांजलि सभा में अपने विचार रखते हुए साम्यवादी विचारों की ताल्लुक रखने वाले डा0 श्याम बिहारी वर्मा ने कहा कि वर्ष 1991 में मनमोहन सिंह द्वारा जिस प्रकार देश की आर्थिक नीतियों में बदलाव किया गया उससे देश अब तेजी के साथ दो समाजों में बट रहा है। एक शोषित समाज व दूसरा शोषणकर्ता। वर्तमान में मौजूद एनडीए सरकार जिसका नेतृत्व नरेन्द्र मोदी कर रहे है और शान से कह रही है कि देश बदल रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि देश साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे गुलामी की ओर बढ़ रहा है।

      सभा की अध्यक्षता कर रहे लोक संघर्ष पत्रिका के मुख्य सलाहकार एवं सुप्रसिद्ध अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब ने कहा कि हमे परम्परावादी नहीं बनना चाहिए बल्कि विचारों के संघर्ष को तेज करना चाहिए।

      शोक सभा में बृजमोहन वर्मा, डा0 कौसर हुसैन, राजनाथ शर्मा, बृजेश कुमार दीक्षित, हुमायुं नईम खान, मचकुन्द सिंह और राम प्रताप मिश्रा, सै0 इमरान रिजवी, डा0 उमेश वर्मा, मोहम्मद तारिक खान, अतीकुर्रहमान अंसारी, विनय कुमार सिंह, गुरू शरण दास, अजय सिंह, प्रवीण कुमार, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, नीरज वर्मा, मुनेश्वर वर्मा, गिरीश चन्द्र, सत्येन्द्र कुमार आदि ने अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित की।शोक सभा का संचालन रणधीर सिंह सुमन ने किया।
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यूपी में सड़कों पर बने धर्मस्थलों को हटाने के हाई कोर्ट ने दिए आदेश

लखनऊ | इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को सड़कों पर और इनके किनारे बने धार्मिक स्थलों को हटाने के आदेश दिए हैं। राज्य सरकार से यह सुनिश्चित करने को भी कहा है कि राजमार्गों, सड़कों, पैदल पथों और लेन सहित सभी मार्गों पर किसी धार्मिक ढांचे की इजाजत नहीं होगी। इसमें किसी तरह का उल्लंघन प्रशासन और पुलिस अधिकारियों की ओर से कोर्ट की अवमानना माना जाएगा। जस्टिस सुधीर अग्रवाल और राकेश श्रीवास्तव की लखनऊ बेंच ने कहा कि जनवरी, 2011 के बाद सार्वजनिक मार्गों पर बने सभी धार्मिक ढांचों को हटाया जाएगा और संबंधित डीएम की ओर से दो महीने के भीतर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपनी होगी। जो धार्मिक ढांचे इससे पहले बनाए गए हैं, उनको किसी निजी भूखंड पर स्थानांतरित किया जाएगा या फिर छह महीने के भीतर हटाया जाएगा। कोर्ट ने शुक्रवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया।



लखनऊ के मोहल्ला डौडा खेड़ा में सरकारी जमीन पर मंदिर बनाकर कथित तौर पर अतिक्रमण किए जाने के खिलाफ 19 स्थानीय लोगों ने यह याचिका दायर की थी। बेंच ने कहा कि हर नागरिक के पास स्वतंत्र आवाजाही का मौलिक अधिकार है और उल्लंघन करने वाले कुछ लोगों और सरकारी प्रशासन की उदासीनता की वजह से इसके उल्लंघन की इजाजत नहीं दी जा सकती। बेंच ने राज्य सरकार से एक योजना तैयार करने के लिए कहा ताकि धार्मिक गतिविधियों की वजह से सार्वजनिक सड़कें भविष्य में प्रभावित न हों। http://www.bhaskar.com/news/MP-OTH-MAT-latest-dhar-news-024003-348744-NOR.html
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राष्ट्रवाद पर विमर्श और महिलाएं





इन दिनों राष्ट्रवाद, भारत में सार्वजनिक विमर्श छाया हुआ है। हर ऐसे व्यक्ति, राष्ट्रवाद के संबंध में जिसका दृष्टिकोण वर्तमान राजनैतिक सत्ताधारियों से भिन्न है, पर ‘‘देशद्रोही’’ का लेबिल चस्पा कर दिया जाता है। परोक्ष या अपरोक्ष रूप से यह अपेक्षा की जाती है कि हर व्यक्ति देश के प्रति अपने प्रेम और वफादारी को साबित करे। रोहित वेमूला की आत्महत्या के बाद से राष्ट्रवाद में जाति के स्थान पर भी बहस छिड़ गई है। हाषिए पर पड़े अन्य समूहों, जिनमें मुसलमान और ईसाई शामिल हैं, को ‘बाहरी’ बताकर उनका दानवीकरण किया जा रहा है। उन पर जबरदस्ती  धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप लगाया जा रहा है और भारत के प्रति उनकी वफादारी पर संदेह प्रगट किए जा रहे हैं। अभी हाल में कुछ लोगों ने जेएनयू को ‘‘राष्ट्रविरोधियों का अड्डा’’ बताया था।
दलितों, युवाओं व अल्पसंख्यकों के संदर्भ में राष्ट्रवाद पर चर्चा में इन समूहों की सक्रिय भूमिका को स्वीकार किया जाता है-चाहे इस भूमिका को नकारात्मक बताया जाए या सकारात्मक परंतु भारत में राष्ट्रवाद पर विमर्ष में महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। महिलाएं, राष्ट्रवाद पर जनविमर्ष के हाषिए पर ही रहती हैं। राष्ट्रवाद के आख्यानों में उन्हें केवल प्रतीकात्मक स्थान दिया जाता है। महिलाओं की यही स्थिति सार्वजनिक और निजी जीवन में भी है, जहां सत्ता और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी सीमित भागीदारी है।
इस मुद्दे पर आगे बात करने से पहले हमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद की अवधारणाओं को समझना हेागा। मैक्स वेबर ने राष्ट्र को भावनाओं का ऐसा समग्र बताया है, जो राज्य के रूप में समुचित रूप से प्रकट होता है। बेनेडिक्ट एंडरसन के अनुसार, राष्ट्र एक काल्पनिक राजनैतिक समुदाय है-काल्पनिक इसलिए क्योंकि वह मूलतः सीमित है। वह सीमित इसलिए है क्योंकि किसी भी राष्ट्र के सभी सदस्य कभी एक दूसरे को नहीं जान सकते और ना ही एक दूसरे से विचार विनिमय कर सकते हैं परंतु फिर भी वे एक ही सामूहिक विचार से प्रेम करते हैं। राष्ट्र एक काल्पनिक समुदाय इसलिए भी है क्योंकि वह असमानताओं और षोषण पर पर्दा डालता है और एक ऐसे सांझेपन को बढ़ावा देता है, जिसके लिए राष्ट्र के सदस्य अपना खून बहाने के लिए तैयार रहते हैं। गैल्नर ने तो यहां तक कहा है कि ‘‘राष्ट्रवाद, राष्ट्रों में आत्मचेतना का उदय नहीं है; वह वहां भी राष्ट्रों का आविष्कार कर लेता है, जहां वे हैं ही नहीं’’। इन परिभाषाओं से स्पष्ट है कि राष्ट्र एक ऐसा समूह या समुदाय है जो सत्ता पाने की आकांक्षा रखता है।
विचारधारा के स्तर पर, राष्ट्रवाद, पुरूषत्व पर आधारित है और समावेषी नहीं है। राष्ट्रवाद की अवधारणा राष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक सीमाओं पर आधारित है। इस राष्ट्रीय पहचान में सभी समुदायों को बराबर प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। इन पहचानों का निर्माण, अक्सर, सामाजिक प्रतिस्पर्धा से होता है, जिसकी प्रकृति अधिकांष मामलों में हिंसक होती है। षक्तिषाली और विषेषाधिकार प्राप्त समूह, हाषिए पर पड़े समूहों का दमन करते हैं और राष्ट्रीय पहचान को अपनी पहचान के रूप में परिभाषित करते हैं। यह राष्ट्रीय पहचान वही होती है जो इन समूहों की पहचान होती है। इस तरह, राष्ट्रवाद, दमनकारी स्वरूप हासिल कर लेता है। वह ‘दूसरों’ का निर्माण करता है और सामाजिक पदक्रम का ढांचा खड़ा करता है।
राष्ट्रवाद, लैंगिक समानता पर आधारित नहीं है। इतिहास गवाह है कि किसी भी राष्ट्र के संसाधनों और उसकी निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की कभी समान हिस्सेदारी नहीं रही है। या तो उन्हें निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा जाता है या उनकी आवाज़ को समुचित महत्व नहीं मिलता। महिलाओं को अपेक्षाकृत निम्न स्थान दिया जाता है और उनके योगदान को स्वीकार नहीं किया जाता। जहां समाज युद्ध करना और उनमें दूसरों को मारना पुरूषत्व की निषानी मानता है, वहीं महिलाओं को परिवार, समुदाय और राष्ट्र की ‘‘इज्ज़त’’ बताकर, उन्हें एक ऐसे समूह के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसकी रक्षा की जानी चाहिए और जिसकी पवित्रता को बनाए रखा जाना चाहिए। उनकी मूल भूमिका मातृत्व तक सीमित कर दी जाती है।
राष्ट्रवाद और परतंत्र भारत में महिलाएं
भारत के स्वाधीनता संग्राम में महिलाओं की भूमिका कई अर्थों में विरोधाभासी थी। महिलाओं के अधिकारों और स्वाधीनता संग्राम में उनकी भागीदारी में कोई सीधा संबंध नहीं था। जहां गांधीजी जैसे कई नेताओं ने महिलाओं का आह्वान किया कि वे अपने घरों से बाहर निकलकर राष्ट्रीय आंदोलन में षामिल हों ताकि वह जनांदोलन बन सके परंतु इस आंदोलन में उनकी भूमिका का निर्धारण सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक सीमाओं के अंदर ही किया गया। उनसे ‘‘स्त्रीयोचित व्यवहार’’ की अपेक्षा की जाती थी।
भारतीयों ने औपनिवेषिक षासन का कई अलग-अलग तरीकों से विरोध किया। जहां कुछ समूह क्रांतिकारी थे वहीं अन्य अंग्रेज़ों के साथ बातचीत का संवैधानिक रास्ता अपनाना चाहते थे। महिलाएं इन दोनों तरह के संघर्षों का हिस्सा बनीं। कल्पना दत्त जैसी कुछ महिलाएं बम बनाने और अंग्रेज़ों पर हमलों में षामिल थीं। लक्ष्मी स्वामीनाथन, इंडियन नेषनल आर्मी में अधिकारी थीं। सरोजनी नायडू राष्ट्रीय आंदोलन की एक महत्वपूर्ण महिला नेत्री थीं, जिन्होंने वयस्क मताधिकार और स्वतंत्रता दोनों के लिए संघर्ष किया। सावित्रीबाई फुले जैसी महिलाएं भी थीं, जिन्होंने खुलकर औपनिवेषिक पितृसत्तात्मकता पर प्रहार किया। महिलाओं की भागीदारी पर गांधीजी के ज़ोर के कारण बड़ी संख्या में महिलाओं ने स्वदेषी आंदोलन में भाग लिया।
स्वाधीनता आंदोलन के कुछ नेताओं ने ऐसी सामाजिक कुप्रथाओं को समाप्त करने का प्रयास किया, जो महिला विरोधी थीं। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में और सती प्रथा व बाल विवाह के खिलाफ आवाज़ उठाई। उनका यह मानना था कि धर्म व सत्ता के संगठनात्मक ढांचे, महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करते हैं। उनकी सोच यह थी कि अगर महिलाओं की स्थिति में बेहतरी आएगी तो इससे भारत, दुनिया को यह दिखा सकेगा कि वह अपना षासन स्वयं चलाने में सक्षम है। परंतु कुछ अन्य नेताओं की यह मान्यता थी कि महिलाओं के अधिकारों का मुद्दा उठाने से स्वाधीनता संग्राम में बाधा पड़ेगी, वह विभाजित होगा और कमज़ोर पड़ेगा। उनकी मान्यता थी कि राजनैतिक स्वतंत्रता हासिल करने के बाद ही सामाजिक सुधारांे की बात की जानी चाहिए। पुनरूत्थानवादियों का तर्क था कि भारतीय परंपरा में महिलाओं को उच्च स्थान दिया गया है और औपनिवेषिक सत्ता, इस श्रेष्ठ संस्कृति और परंपरा को नष्ट कर रही है। उनका कहना था कि भारत की ‘‘गौरवपूर्ण’’ परंपराओं के साथ न केवल छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए वरन उन्हें पूर्ण रूप से अपनाया जाना चाहिए।
पुनरूत्थानवादियों और सुधारवादियों का द्वंद
पुनरूथात्थानवादियों का कहना था कि यद्यपि तकनीकी और विज्ञान के भौतिक क्षेत्रों में पष्चिम आगे है तथापि पूर्व  उसकी तुलना में आध्यात्मिक दृष्टि से कहीं अधिक समृद्ध है। महिलाएं आध्यात्मिक चेतना की वाहक हैं और इसलिए उनकी भूमिका और कर्तव्यों में कोई परिवर्तन नहीं होना चाहिए। और यह भी की ऐसा होने पर ही देष की पहचान कायम रह सकेगी।
गांधीजी का परिप्रेक्ष्य
गांधीजी की राजनीति, धर्म से गहरे तक जुड़ी हुई थी। नेहरू के विपरीत गांधी यह अच्छी तरह समझते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन में महिलाओं की बड़ी संख्या में भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है और उससे इस आंदोलन को कितनी ताकत मिलेगी। वे यह मानते थे कि राष्ट्रीय आंदोलन को सच्चे अर्थों में जनांदोलन बनाने के लिए उसमें महिलाओं की व्यापक भागीदारी आवष्यक है। उन्होंने महिलाओं का आह्वान किया कि वे स्वदेषी और सत्याग्रह आंदोलनों में खुलकर भाग लें। इस आह्वान का गहरा प्रभाव हुआ। महिलाओं को सार्वजनिक जीवन, जिसमें उनके लिए तब तक कोई जगह नहीं थी, में अचानक महत्वपूर्ण स्थान मिल गया। परंतु यहां यह दिलचस्प है कि गांधीजी ने इस सिलसिले में द्रोपदी, सीता और सावित्री को महिलाओं का आदर्ष बताया। उनका कहना था कि द्रोपदी, सीता और सावित्री में जो गुण थे, वही स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी करने वाली महिलाओं में होने चाहिए। ये सभी नायिकाएं धैर्य, अहिंसा और चुपचाप सब कुछ सहने वाली थीं। इसके विपरीत, झांसी की रानी जैसी महिलाएं, जो मर्दाना दिलेरी की प्रतीक थीं, को गांधीजी भारतीय महिलाओं का आदर्ष नहीं मानते थे। षायद इसका कारण यह था कि वे स्वाधीनता संग्राम को पूर्णतः अहिंसक बनाए रखना चाहते थे।
नेहरू का परिप्रेक्ष्य
भारत के लोगों के जीवन पर धर्म के गहरे प्रभाव और देष की संस्कृति के निर्माण में धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका  नेहरूजी को बहुत रास नहीं आती थी। वे भारतीय समाज में धर्म के महत्व को कम करके आंकते थे। उनकी षिक्षा-दीक्षा इंग्लैंड में हुई थी और वे पष्चिमी षैली के प्रजातंत्र और आधुनिकीकरण के हामी थे। इसके लिए महिलाओं की स्थिति में सुधार लाना आवष्यक था। यही कारण है कि नेहरू ने 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम और 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम संसद में पारित करवाए। इन दोनों ही कानूनों पर देष में बड़ा बवंडर मचा। उनका मानना था कि तकनीकी और आर्थिक प्रगति अपने आप सामाजिक समानता लाएगी। उनकी दृष्टि में लैंगिक मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण नहीं थे। वे कभी भी भारत के राजनैतिक विमर्ष में लिंग और धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर सके और यही कारण है कि भारत में प्रगतिषील कानूनों को लागू करने की प्रक्रिया बहुत धीमी बनी रही। उन्होंने कभी दमन और पितृसत्तात्मकता की जड़ें खोजने का प्रयास नहीं किया।
स्वाधीनता संग्राम के दौरान, भारत की महिलाओं ने पहली बार प्रजातंत्र, समानता और स्वतंत्रता के मूल्यों को जाना-समझा। ज़ाहिर है इससे उनके आत्मविष्वास में वृद्धि हई परंतु इस आंदोलन और इसके नेताओं ने कभी लैंगिक समानता जैसे मुद्दे नहीं उठाए और ना ही पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी। उन्होंने परिवार के भीतर होने वाले दमन पर भी ध्यान नहीं दिया।
राष्ट्रवाद और आज की महिलाएं
लैंगिक आख्यान, आज भी राष्ट्रीय विमर्ष के केंद्र में नहीं है। उसे केंद्र से प्रतिस्थापित किया है उस राष्ट्रवाद ने, जो देष को धर्मनिरपेक्ष बनाकर उसे आधुनिक राष्ट्र का स्वरूप देना चाहता है और धर्म ने, जो भारत का पुनर्निमाण एक पारंपरिक हिंदू राष्ट्र के रूप में करना चाहता है।
जैसा कि हमने ऊपर देखा, यद्यपि नेहरू धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद के पैरोकार थे और एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे जहां विज्ञान और तकनीकी समानता की वाहक बने परंतु वे यह समझ नहीं सके कि केवल प्रगतिषील कानूनों से समानता नहीं आएगी। लैंगिक और सांप्रदायिक दमन की सामाजिक जड़ों को ढूंढना भी आवष्यक होगा। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद ने कभी लैंगिक असमानता और पितृसत्तात्मकता जैसे मुद्दों की ओर ध्यान नहीं दिया। उसने इन्हें राजनैतिक स्वतंत्रता के विस्तृत आख्यान का हिस्सा भर बनाया। ज़ाहिर है कि इससे महिलाओं को सीमित मुक्ति ही हासिल हो सकी। दूसरी ओर, स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिक हिंसा में तेज़ी से वृद्धि हुई और सांप्रदायिक राजनीति की ताकत बढ़ी। प्रतिस्पर्धी अंध राष्ट्रवादों ने महिलाओं को और पीछे धकेल दिया। इसका एक उदाहरण हिंदू राष्ट्रवाद है। हिंदू राष्ट्रवाद का विमर्ष, अल्पसंख्यकों से घृणा करने और दलितों, महिलाओं और आदिवासियों को निचला दर्जा देने पर आधारित हैं। हिंदू राष्ट्र के निर्माण के अपने स्वप्न को पूरा करने के लिए यह राष्ट्रवाद हिंदुओं को लामबंद करना चाहता है। इसके लिए हिंदू राष्ट्रवादी, दलितों, आदिवासियों और यहां तक कि सिक्ख, जैन और बौद्ध जैसे अन्य धर्मों के अनुयायियों को ‘हिंदू’ समुदाय का हिस्सा बनाना चाहते हैं। यह विडंबनापूर्ण है कि आज भी दलित महिलाओं के साथ ऊँची जाति के पुरूष इस आधार पर बलात्कार करते हैं कि उन्हें दलित महिलाओं के षरीर का उपभोग करने का अधिकार है।
मुस्लिम पुरूषों द्वारा हिंदू महिलाओं को अगवा करने और उनके साथ जबरदस्ती करने की अधिकांषतः कपोल कल्पित कथाओं का इस्तेमल हिंदुओं को एक करने के लिए किया जाता है। महिलाओं को बार-बार यह याद दिलाया जाता है कि बढ़ती मुस्लिम आबादी, भारत के लिए खतरा है और इस देष को उसके प्राचीन गौरव से फिर से मंडित किया जाना आवष्यक है। राम को आदर्ष पुरूष और सीता को आदर्ष महिला बताया जाता है। जहां एक ओर सीता को त्याग, पवित्रता और स्त्रीयोचित व्यवहार का आदर्ष बताया जाता है वहीं संघ और विहिप, महिलाओं को हथियार चलाने का प्रषिक्षण देते हैं और साध्वी ऋतंभरा और साध्वी प्राची जैसे नेता हिंदू महिलाओं को दुष्मन (मुसलमान व ईसाई) के प्रति आक्रामक होने के लिए प्रेरित करते हैं। परंतु घर के अंदर महिलाओं का आक्रामक व्यवहार उन्हें रास नहीं आता। हिंदू महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने पिता, भाईयों और पति के हाथों हिंसा को चुपचाप स्वीकार करें। दूसरे षब्दों में, वे लैंगिक पदक्रम को चुनौती न दें।
हिंदू राष्ट्रवाद, सार्वजनिक विमर्ष पर हावी है। जब भाजपा सत्ता में नहीं थी तब भी वह महिलाओं की आज़ादी को सीमित करने वाली अवधारणाओं और विचारों को बढ़ावा देती थी। इसका एक उदाहरण लव जिहाद के विरूद्ध अभियान है, जिसके ज़रिए महिलाओं के अपना पति चुनने के अधिकार को सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है। उनकी ‘रक्षा’ के नाम पर उन्हें पिंजरों में बंद किया जा रहा है। महिलाआंे को समुदाय की पहचान और उसकी इज्ज़त बताकर, उनके षरीर का वस्तु की तरह उपयोग किया जा रहा है। उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे विषेषाधिकार प्राप्त ऊँची जातियों के पुरूषों द्वारा निर्मित पहचान को ही आगे बढ़ाएं। दक्षिण अफ्रीका में ष्वेत महिलाओं के लिए अन्य समुदायों के सदस्यों के साथ षारीरिक संबंध स्थापित करना प्रतिबंधित था। भारत में भी अंतर्जातीय विवाहों को हतोत्साहित किया जाता है।
लैंगिक असमानता, राष्ट्रवाद का अविभाज्य हिस्सा है। यद्यपि औपनिवेषिक षासन से मुक्त होने के लिए विभिन्न देषों में हुए राष्ट्रीय संघर्षों ने लैंगिक समानता के मुद्दे पर विचार की षुरूआत की परंतु बाद में यह मुद्दा कहीं खो सा गया। अलजीरिया में महिलाओं ने स्वाधीनता आंदोलन में क्रांतिकारी भूमिका निभाई परंतु बाद में उन्हें घर की चहारदीवारी के अंदर धकेल दिया गया और उनसे यह अपेक्षा की जाने लगी कि वे पारंपरिक सीमाओं का पालन करें। और इन सीमाओं को राष्ट्रवाद ने कई मामलों में मज़बूती दी।
-नेहा दाभाड़े
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गुरुवार, 9 जून 2016

पांच मुक्तक---अनिल बौझड

किन्हीं पूर्व कर्मो के फल से है साम्यवादी नाम मिला
चाह बनी मन मंगल की थी लेकिन जंगल धाम मिला
दंग रह गये नक्सलियों का खून गिराने वाले जब
लाल लहू का कतरा कतरा करता लाल सलाम मिला १
पूंछा गया परमप्रिय तो फिर किसी ने आकर राम लिखा
लिखा किसी ने सिक्ख इसाई किसी ने था इस्लाम लिखा
लिखा किसी ने काम चाम तो किसी किसी ने दाम लिखा
माता पिता पुत्र पत्नी तो धरा किसी ने धाम लिखा
सबने लिखा परमप्रिय अपना सुमधुर ललित ललाम लिखा
मेरा जब नम्बर आया तो मैंने लाल सलाम लिखा 2


ये सामंती सोंचो वाले न एक चपत सह पाएंगे
पर्वत जैसे दिखने वाले पत्तों जैसे बह जायेंगे
तब तलक क्रांति के सिवा अनिल
भाषा दूसरी नहीं होगी
रोटी जब तलक तिजोरी से
बाइज्जत बरी नहीं होगी

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बुधवार, 8 जून 2016

दो गाड़ियों की कहानी साध्वी की मोटरसाइकिल और रूबीना की कार

क्या एक ही देश में दो अलग-अलग न्याय प्रणालियां हो सकती हैं? यह प्रश्न मेरे मन में उन आतंकी हमलों, जिनमें आरोपी हिंदू थे, से संबंधित मामलों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) के पलटी खा जाने से उपजा। एनआईए ने 13 मई, 2016 को अदालत में एक नया आरोपपत्र दाखिल कर प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया और कर्नल पुरोहित व अन्यों पर लगे गंभीर आरोप हटा लिए। एनआईए का कहना है कि इन मामलों में हेमंत करकरे द्वारा की गई जांच गलत थी और महाराष्ट्र एटीएस ने ही कर्नल पुरोहित को फंसाने के लिए उनके घर में आरडीएक्स रखवाया था। स्पष्टतः, एनआईए यह कहना चाहती है कि यह सब पूर्व यूपीए सरकार की शह पर किया गया था।
इस मामले के तथ्यों पर एक नज़र डाल लेना ज़रूरी है। पिछले दशक के उत्तरार्द्ध में देश के अलग-अलग हिस्सों, विशेषकर महाराष्ट्र में एक के बाद एक कई आतंकी घटनाएं हुईं। इनकी ओर देश का ध्यान सबसे पहले तब आकर्षित हुआ जब मई 2006 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में आरएसएस के एक कार्यकर्ता राजकोंडवार के घर में बम बनाने के दौरान दो बजरंग दल कार्यकर्ता मारे गए। घर के ऊपर भगवा झंडा फहरा रहा था और उसके सामने बजरंग दल का बोर्ड लगा हुआ था। घटनास्थल पर नकली मूछें, दाढ़ी और पज़ामा-कुर्ता भी मिला। इसके बाद परभनी, जालना, ठाणे, पनवेल इत्यादि में कई बम धमाके हुए। इनकी जांच पुलिस द्वारा यह मानते हुए की गई कि इनके लिए मुसलमान ही ज़िम्मेदार हैं। हर धमाके के बाद कुछ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया जाता था और वर्षों बाद, अदालतें, उन्हें सबूत के अभाव में रिहा कर देती थीं। जाहिर है कि इस प्रक्रिया में उनका जीवन बर्बाद हो जाता था।
मालेगांव धमाके, जिनमें पहली बार साध्वी की भूमिका सामने आई, सन 2008 में हुए थे। इन धमाकों में नमाज़ पढ़कर लौट रहे अनेक मुसलमान मारे गए थे और कई घायल हुए थे। इसके बाद, हमेशा की तरह, कुछ मुसलमान युवकों को हिरासत में ले लिया गया। महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे ने जब इस घटना की बारीकी से जांच की तो यह सामने आया कि धमाकों के लिए इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल पूर्व एबीव्हीपी कार्यकर्ता साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी। आगे की जांच में इन धमाकों में स्वामी दयानंद पांडे, सेवानिवृत्त मेजर उपाध्याय, रामजी कालसांगरा और स्वामी असीमानंद की संलिप्तता भी प्रकट हुई। ये सभी अतिवादी हिंदू दक्षिणपंथी थे। पुलिस को ढेर सारे सबूत भी हाथ लगे। एक सबूत था स्वामी असीमानंद का इकबालिया बयान, जो जेल में मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में दर्ज किया गया था और कानूनी दृष्टि से पूरी तरह वैध था।
अपने इकबालिया बयान में स्वामी ने बड़े खुलासे किए। उन्होंने कहा कि 2002 में संकटमोचन मंदिर में हुए धमाके के बाद उन्होंने यह तय किया कि बम का जवाब बम से दिया जाएगा। वे उस समय गुजरात के डांग जिले में विहिप के लिए काम कर रहे थे। असीमानंद ने विस्तार से पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया। इसके बाद कई अन्य लोगों को इस मामले में आरोपी बनाया गया।
जब करकरे इस मामले की जांच कर रहे थे और इसमें हिंदुओं के शामिल होने की बात सामने आ रही थी तब बाल ठाकरे ने ‘‘सामना’’ में लिखा था कि ‘‘हम करकरे के मुंह पर थूकते हैं’’। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें ‘‘देशद्रोही’’ बताया था। आडवाणी ने भी उन्हें फटकारा था। हिंदुत्ववादी राजनैतिक संगठनों के इस कटु हमले से व्यथित करकरे ख्यात पुलिस अधिकारी जूलियो रिबेरो से मिले और उनसे अपनी पीड़ा बांटी। रिबेरो अपनी निष्पक्षता और ईमानदारी के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने करकरे की सूक्ष्म जांच की सराहना की। करकरे ने रिबेरो से जानना चाहा कि राजनेताओं द्वारा उनका जो अपमान किया जा रहा है, उसका मुकाबला वे कैसे करें। रिबेरो ने उन्हें सलाह दी कि वे ईमानदारी से अपना काम जारी रखें और उन पर लगाए जा रहे आरोपां को नज़रअंदाज करें।
इसी बीच, मुंबई पर आतंकी हमला हुआ। सन 2008 के 26 नवंबर को हथियारों से लैस दस आतंकवादी मुंबई में घुस आए। उनके विरूद्ध पुलिस कार्यवाही के दौरान करकरे मारे गए। उनकी मौत की परिस्थितियां भी अत्यंत संदेहास्पद थीं। अल्पसंख्यक मामलों के तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले ने तब कहा था कि करकरे की हत्या के पीछे आतंकवाद के अलावा और कुछ भी है। नरेंद्र मोदी, जिन्होंने करकरे को देशद्रोही बताया था, तत्काल मुंबई पहुंचे और उनकी पत्नी को एक करोड़ रूपए का चैक भेंट करने की पेशकश की। करकरे की पत्नी ने इस राशि को स्वीकार करने से इंकार कर दिया।
करकरे की मौत के बाद प्रकरण की जांच जारी रही। आरोपपत्र तैयार कर लिया गया और सभी आरोपियों पर आतंकी हमले करने के आरोप में मामले की सुनवाई शुरू हो गई। इस बीच केंद्र में नई सरकार सत्ता में आ गई और इसके साथ ही, एनआईए का रूख भी पलट गया। अब एनआईए हरचंद इस कोशिश में जुटी हुई है कि साध्वी की रिहाई हो जाए। एनआईए के रूख में परिवर्तन का एक प्रमाण था लोक अभियोजक रोहिणी सालियान का यह बयान कि उन्हें यह निर्देश दिया गया है कि वे इस प्रकरण में नरम रूख अपनाएं। चूंकि उन्होंने ऐसा करने से इंकार कर दिया इसलिए उन्हें हटा दिया गया।
हम सबको याद है कि सन 1992-93 में मुंबई में हुए सांप्रदायिक दंगों में 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे। इसके बाद हुए बम धमाकों में 200 लोगों की जानें गईं थीं। जहां तक दंगों का सवाल है, उनके आरोपियों में से बहुत कम को सज़ा मिली है। एक को भी मौत की सज़ा या आजीवन कारावास नहीं मिला। बम धमाकों के मामले में कई लोगों को मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है और कई को आजीवन कारावास की। आजीवन कारावास की सज़ा भुगत रहे लोगों में रूबीना मेमन शामिल हैं। उनका अपराध यह है कि वे उस कार की मालकिन थीं जिसका इस्तेमाल विस्फोटकों को ढोने के लिए किया गया था। ज्ञातव्य है कि रूबीना मेनन उस कार को चला नहीं रही थीं।
साध्वी प्रज्ञा सिंह मालेगांव धमाकों में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल की मालकिन थीं। वे जल्दी ही जेल से रिहा हो जाएंगी। रूबीना कार की मालकिन थीं। उनका जीवन जेल में कटेगा। मुंबई दंगों में कही बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे परंतु किसी को भी सख्त सज़ा नहीं मिली। बम धमाकों के मामले में दर्जनों लोगों को सख्त सज़ाए सुनाई गईं।
आखिर हमारा प्रजातंत्र किस ओर जा रहा है। ऐसा लगता है कि हमारे देश में दो समानांतर न्याय व्यवस्थाएं चल रही हैं। टीवी पर होने वाली कटु बहसों में लोग साध्वी का बचाव करेंगे और करकरे को गलत जांच करने का दोषी बताएंगे। मालेगांव में लोग बहुत नाराज़ हैं और एनआईए के बदले हुए रूख के खिलाफ अदालत में जाने की योजना बना रहे हैं। दो राजनैतिक दल करकरे के सम्मान की रक्षा के लिए आगे आने को तत्पर हैं और वे इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि उनके द्वारा इकट्ठे किए गए सुबूतों का ईमानदारी से परीक्षण किया जाए।
हमें आशा है कि दोषियों को सज़ा मिलेगी और निर्दोषों की रक्षा की जाएगी। परंतु वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा होना असंभव सा लग रहा है 
 -राम पुनियानी
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रविवार, 5 जून 2016

आरक्षण - सामाजिक स्तिथि और पसमांदा समाज

" पहले थे हम नीम जोलाहे 
बाद में हो गए दरजी
उलट-पलट के सैयद हो गए 
ये अल्लाह की मर्जी ."

या मिल्लते इस्लामिया का अभिशाप.  यूँ कहें जुलाहा, हलालखोर, लाल बेगी, भटियारा, गोकरन, बक्खो, मीरशिकार, चिक, रंगरेज, दरजी, नट, कुंजड़ा व कबाड़िया आदि बहुत सारे शब्द हमारी सामाजिक स्तिथि को प्रकट करते हैं. भारत में 80 % पसमांदा समाज के लोग हैं जो जातियों के नाम पर पिछड़ी व दलित जातियों के रूप में जानी जाती हैं. ऊपर कहे गए शब्दों को रोज जाति के नाम पर गाली के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. वहीँ, आर्थिक स्तिथि भी अत्यधिक ख़राब है. आर्थिक स्तिथि इतनी ख़राब है कि एक वक्त का चूल्हा घर में जलने की नौबत नहीं आती है लेकिन जब सरकार जाति के आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने की बात करती है तो मुसलमानों की उच्च जातियों के नेतागण जिनको इस्लाम में बराबरी का दर्जा लिखा-पढ़ी में तो नजर में आता है लेकिन वास्तविक धरातल पर मुसलमानों में जाति एक सच्चाई है और उच्च जातियों के लोग ऊपर लिखे गए शब्दों को गाली के रूप में इस्तेमाल करते हुए अक्सर देखे जाते हैं. आरक्षण जाति के आधार पर उच्च जाति के नेतागण नहीं देने देते हैं और तब सारे मुसलमानों की आर्थिक व सामाजिक स्तिथि को एक मानकर सभी मुसलमानों को आरक्षण देने की बात कहकर मुख्य मुद्दे से सरकार को और सभी लोगों को हटाने के काम करते हैं.जब डॉ भीम राव अम्बेडकर ने मुसलमानों को आरक्षण जाति के आधार पर देने की बात कही तो जिले के एकमात्र केन्द्रीय नेता ने अकेले जमकर विरोध किया था और जातिगत आरक्षण नहीं होने दिया था. 36 पिछड़ी जातियों के कुछ मुसलमानों को आरक्षण का लाभ मिला तो आज उस समाज में डॉक्टर, इंजिनियर व प्रशासनिक अधिकारी हुए. 
  आज पसमांदा समाज की उत्तर प्रदेश सरकार से मुख्य मांग है कि दलित व पिछड़े मुसलमानों को सामाजिक आर्थिक आधार पर 12 % आरक्षण केरल राज्य की भांति दिया जाए. अगर केरल में संविधान के आधार पर 12 % आरक्षण दिया जा सकता है तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं . 

- मोहम्मद वसीम राईन 

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शनिवार, 4 जून 2016

लोक संघर्ष पत्रिका के प्रधान सम्पादक डा0 रामगोपाल वर्मा की अन्त्येष्टि

बाराबंकी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता, लोक संघर्ष पत्रिका के प्रधान सम्पादक तथा जनपद के प्रथम दन्त चिकित्सक डा0 रामगोपाल वर्मा का आज प्रातः निधन हो गया।
    यह जानकारी देते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सहसचिव रणधीर सिंह   सुमन ने बताया कि उनकी  अन्त्येष्टि कमरिया बाग स्थित शमशान घाट पर की गयी। मुखाग्नि उनके बड़े लड़के प्रवीण कुमार ने दी।
अन्त्येष्टि में प्रमुख लोगों में डा0 जसवन्त सिंह, डा0 अशोक वर्मा, श्याम बिहारी, बृजमोहन वर्मा, बसपा नेता सुरेन्द्र सिंह, रामनरेश, मुचकुन्द सिंह, हनुमान प्रसाद, सोनेलाल वर्मा, पुष्पेन्द्र सिंह, योगेन्द्र सिंह, डा0 उमेश वर्मा, गिरीश चन्द्र, रामप्रताप मिश्रा, शिवराम, दलसिंगार सहित सैकड़ो लोग शामिल थे। 




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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता व लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रधान संपादक डॉ राम गोपाल वर्मा का आज निधन हो गया है.

डॉ राम गोपाल वर्मा लोकसंघर्ष पत्रिका के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए गोंडा में साथ में अदम गोंडवी


डॉ राम गोपाल वर्मा हिंदी संसथान लखनऊ में अदम गोंडवी साहब को स्मृति चिन्ह भेंट करते हुए

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मंगलवार, 24 मई 2016

अंबेडकर और राष्ट्रवाद

जिन राजनैतिक दलों ने डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के समानता, सामाजिक न्याय, स्वतत्रंता और बंधुत्व के एजेण्डे को सुनियोजित ढंग से कमज़ोर किया, वे ही दल राजनैतिक लाभ के लिए बाबासाहब का 125वां जन्मदिवस धूमधाम से मना रहे हैं। दरअसल, वे बाबासाहब की विरासत पर कब्ज़ा करना चाहते हैं और अंबेडकर को अपने राजनैतिक मंतव्यों के समर्थक के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। तथ्य यह है कि अंबेडकर के विचार, इन पार्टियों की नीतियों, कार्यक्रमों और विचारधारा के एकदम उलट थे। हिंदू राष्ट्रवादी कभी भी अपनी विद्वता के लिए नहीं जाने जाते थे परंतु उनकी समझ इतनी कम होगी, इसका बहुतों को अंदाज़ा नहीं था। या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि यह भलीभांति जानते हुए भी कि बाबासाहब उनके एजेण्डे के घोर विरोधी थे, वे उनके नाम का इस्तेमाल हिंदू राष्ट्रवाद को देष पर थोपने के लिए करना चाहते हैं।
बाबासाहब को ‘राष्ट्रवादी’ या ‘देषभक्त’ बताना, तथ्यों के साथ खिलवाड़ होगा। बाबासाहब एक उदारवादी प्रजातांत्रिक थे जो सामाजिक न्याय के साथ स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के हामी थे। अपनी पुस्तक ‘‘पाकिस्तान ऑर द पार्टिषन ऑफ इंडिया’’ में बाबासाहब ने देष के विभाजन से जुड़े मुद्दों का राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य से नहीं बल्कि तार्किक और वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया है। इस पुस्तक में बाबासाहब ने मुसलमानों की पाकिस्तान की मांग और हिंदुओं के उसके विरोध का निष्पक्ष विष्लेषण किया है। पुस्तक के 1946 में प्रकाषित संस्करण में बाबासाहब ने उसमें खंड 5 जोड़ा और इस विषय पर अपने विचारों को इस नए खंड के अध्याय 13 और 14 में प्रस्तुत किया। उन्होंने कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, पूर्वी आयरलैंड और स्विट्जरलैंड में धार्मिक, नस्लीय और भाषायी टकरावों का विष्लेषण किया और यह बताया कि ये देष किस तरह उपयुक्त प्रणालियां और षासन का ढांचा विकसित कर इन टकरावों का प्रबंधन कर रहे हैं। उनका निष्कर्ष यह है कि अल्पसंख्यकों को  एक अलग देष की मांग करने की बजाए देष के संवैधानिक ढांचे में अपने हितों की रक्षा के लिए समुचित प्रावधान किए जाने की मांग करनी चाहिए। यहां यह ध्यान देने योग्य है कि बाबासाहब ‘‘अल्पसंख्यकों के हितों’’ की बात करते हैं, ‘राष्ट्र’’ के हितों की नहीं।
बंबई में 6 मई, 1945 को ऑल इंडिया षिड्यूल्ड कास्टस फेडरेषन के अधिवेषन को संबोधित करते हुए
बाबासाहब ने आत्मनिर्णय के सिद्धांत का समर्थन करते हुए कहा कि ‘‘मैं पाकिस्तान के खिलाफ नहीं हूं। मैं यह मानता हूं कि पाकिस्तान की मांग, आत्मनिर्णय के सिद्धांत पर आधारित है और इस सिद्धांत पर प्रष्नचिन्ह लगाने के लिए अब बहुत देरी हो चुकी है। मैं उन्हें इस सिद्धांत का लाभ देने के लिए तैयार हूं...’’। बाबासाहब का मानना था कि मुसलमान, पाकिस्तान की मांग की बजाए उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लेंगे क्योंकि उससे उन्हें बेहतर सुरक्षा उपलब्ध हो सकेगी और अपनी इसी सोच के चलते वे देष के विभाजन के विरोधी थे।  इसके विपरीत, कोई राष्ट्रवादी देष के विभाजन के प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर देता और आत्मनिर्णय के सिद्धांत की बात करना, उसके लिए ‘‘राष्ट्रविरोधी’’ और गुनाह होता। आज भी ‘आत्मनिर्णय’ षब्द का उच्चारण मात्र करने वाले व्यक्ति पर हिंदू राष्ट्रवादियों की भीड़ हल्ला बोलने के लिए हरदम तैयार रहती है।
संक्षेप में, बाबासाहब का प्रस्ताव यह था कि विधायिका और कार्यपालिका में अल्पसंख्यकों का पर्याप्त
प्रतिनिधित्व सुनिष्चित करने के लिए उपयुक्त प्रावधान किए जाएं। वे लिखते हैं, ‘‘बहुसंख्यकों का षासन सिद्धांतः अस्वीकार्य और व्यवहार में अनुचित होगा। बहुसंख्यक समुदाय को प्रतिनिधित्व में आपेक्षिक बहुमत तो दिया जा सकता है परंतु वह कभी पूर्ण बहुमत का दावा नहीं कर सकता।’’ बाबासाहब यह नहीं चाहते थे कि विधायिका में बहुसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व इतना अधिक हो कि वह छोटे अल्पसंख्यक समुदायों की मदद से अपना षासन स्थापित कर ले। बाबासाहब के अनुसार, भारत में विधायिका में बहुमत का अर्थ, सांप्रदायिक बहुमत होगा। यह स्थिति इंग्लैंड से एकदम अलग है जहां के सभी नागरिक मुख्यतः एक ही धर्म का पालन करते हैं और एक ही भाषा बोलते हैं। जहां तक भारत का सवाल है, यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात तो दूर रही, किसी ऐसी सकारात्मक कार्यवाही की बात, जिससे यह सुनिष्चित हो सके कि अल्पसंख्यक विकास की दौड़ में पीछे न छूटें और उनके साथ भेदभाव न हो, करने मात्र से हिंदू राष्ट्रवादियों की भृकटियां तन जाती हैं और वे ऐसे किसी भी प्रयास को ‘‘अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण‘‘ बताते हैं। अगर भारत के संविधान में विधायिका में आनुपातिक प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मताधिकार की व्यवस्था नहीं है तो इसका कारण यह नहीं है कि बाबासाहब सिद्धांतः इसके खिलाफ थे बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि संविधानसभा की अल्पसंख्यक व मूल अधिकार परामर्षदात्री समिति के अध्यक्ष सरदार पटेल ने अल्पसंख्यकों को सफलतापूर्वक पृथक मताधिकार की मांग न करने के लिए राज़ी कर लिया था और यह एक सही कदम था। विभाजन के बाद भारत में जो अल्पसंख्यक बच गए उन्हें ऐसा लगा कि उन्हें बहुसंख्यक समुदाय का सद्भाव अर्जित करना चाहिए {कांस्ट्यिएंट असेम्बली डिबेट्स, खंड पांच (14.08.1947 से 30.08.1947), 2003, पृष्ठ 198-200}।
राष्ट्रवाद और हिंदू राज
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत का दावा है कि बाबासाहब, संघ की विचारधारा में यकीन करते थे और उन्होंने संघ के कार्यकर्ताओं को सामाजिक एकता और अखंडता का प्रतीक बताया था। भागवत ने यह दावा भी किया कि अंबेडकर, आरएसएस के भगवा ध्वज को राष्ट्रध्वज बनाना चाहते थे। इन दावों में कोई सच्चाई नहीं है। बाबासाहब हिंदू धर्म के कटु विरोधी थे क्योंकि यह धर्म अछूत प्रथा और जाति-आधारित पदानुक्रम को स्वीकृति देता है। यही कारण है कि उन्होंने अपने उन तीन लाख समर्थकों, जिनने उनके साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था, को यह षपथ दिलवाई थी कि वे ब्रह्मा, विष्णु, महेष, राम और कृष्ण में कोई आस्था नहीं रखेंगे और हिंदू धर्म का पूर्णतः परित्याग करेंगे।
बाबासाहब ने न केवल जिन्ना के मुस्लिम राष्ट्रवाद की कड़ी निंदा की वरन उन्होंने यह भी लिखा कि पूरा विष्व राष्ट्रवाद की बुराईयों से परेषान है और किसी अंतर्राष्ट्रीय संगठन की षरण में जाना चाहता है (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 352-353)। बाबासाहब के अनुसार, भारतीय केवल एक लोग हैं, राष्ट्र नहीं और वे यह भी मानते थे कि अगर भारतीय राष्ट्र नहीं हैं और राष्ट्र नहीं बनेंगे तो इसमें षर्म की कोई बात नहीं है (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 353)। दूसरी ओर, आरएसएस का यह मानना है कि हिंदू राष्ट्र अत्यंत प्राचीन है, जिसका उदय दो हजार साल या उससे भी पहले हुआ था। हिंदू राज या हिंदू राष्ट्र भला एक राष्ट्र कैसे हो सकता है? बाबासाहब के अनुसार, हिंदू समाज गैर-प्रजातांत्रिक है और उसके इस गैर-प्रजातांत्रिक चरित्र के कारण, करोड़ों षूद्र, गैर-ब्राह्मण और अछूत घोर कष्ट भोग रहे हैं (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 356)।
जहां संघ हिंदू राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है वहीं बाबासाहब की यह मान्यता थी कि हिंदू राष्ट्र, देष के लिए सबसे बड़ी आपदा होगा क्योंकि वह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए बड़ा खतरा होगा और इसे किसी भी स्थिति में रोका जाना चाहिए (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 358)। जहां तक सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थिति का संबंध है, बाबासाहब का यह मानना था कि इस संदर्भ में हिंदू समाज के निचले तबकों और मुसलमानों में कोई खास फर्क नहीं है और इन सबको एक होकर अपने उन मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करना चाहिए, जिनसे ऊँची जातियों ने उन्हें सदियों तक वंचित रखा (डॉ. अंबेडकर, 1990, पृष्ठ 359)।
बाबासाहब के प्रति दिखावटी प्रेम
सत्ताधारी दल जहां एक ओर हिंदू राष्ट्र के गैर-प्रजातांत्रिक एजेंडे को आक्रामक ढंग से लागू करने के हर संभव प्रयास कर रहा है वहीं वह बाबासाहब पर कब्ज़ा ज़माने के लिए भी आतुर है। बाबासाहब के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्षन करने के लिए वह उनके भव्य स्मारक बना रहा है और यह दावा कर रहा है कि उसने कांग्रेस की तुलना में बाबासाहब के कहीं अधिक स्मारक बनाए हैं। बाबासाहब के भव्य स्मारकों से दलित राजनेताओं का एक तबका, जो महत्वाकांक्षी नवदलित श्रेष्ठि वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, प्रसन्न हो सकता है और इससे दमित, वंचित और भेदभाव के षिकार आम दलितों की आंखें चौंधिया सकती हैं परंतु ये भव्य स्मारक, दलितों की मूल समस्याओं को हल नहीं कर सकते। ईट-पत्थर के स्मारक बाबासाहब के विचारों का प्रसार नहीं करेंगे और ना ही वे दलितों को समानता, सामाजिक न्याय और गरिमा के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देंगे। बाबासाहब की मूर्तियां और उनके षानदार स्मारक, दरअसल, दलितों की अंतरात्मा की आवाज़ को कमज़ोर करेंगे और उन्हें अपने महानायकों से वंचित करेंगे।
सत्ताधारी दल एक ओर बाबासाहब के भव्य स्मारक बना रहा है तो दूसरी ओर स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और सामाजिक न्याय के उन सिद्धांतों को कमज़ोर करने के प्रयास में जुटा हुआ है, जो भारत के उस संविधान में निहित हैं जिसे बाबासाहब ने घोर परिश्रम से तैयार किया था और संविधानसभा से पारित करवाया था। जो लोग बाबासाहब के भव्य स्मारक बना रहे हैं वे ही अदालतों के प्रांगणों में पुलिस की मौजूदगी में उन लोगों पर, जो उनके विचारों से सहमत नहीं हैं, हिंसक हमले कर रहे हैं। और ऐसे लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही भी नहीं हो रही है। स्वतंत्रता के सिद्धांत का घोर उल्लंघन करते हुए वे कुछ चुनिंदा नारों को उन लोगों के मुंह में ठूंस रहे हैं जो इन नारों को नहीं लगाना चाहते। वे राष्ट्रवाद के नाम पर नए पदानुक्रम बना रहे हैं और देष को इसके लिए मजबूर कर रहे हैं कि वह नव-राष्ट्रवादियों के विषेषाधिकारों को स्वीकार करे। ये नव-राष्ट्रवादी स्वाधीनता संग्राम के दौरान औपनिवेषिक सत्ता के साथ थे। वे चाहते हैं कि उनसे असहमत लोगों को समान नागरिक अधिकारां से वंचित कर दिया जाए।
दरअसल, वे नव-अछूतों का एक नया वर्ग बनाना चाहते हैं। ये नव-अछूत हैं देष के अल्पसंख्यक, महिलाएं, किसान, श्रमिक, कुछ ओबीसी समुदाय और वे दलित और आदिवासी, जिन्हें ये राष्ट्रवादी अपने झंडे तले ले आए हैं। कानून के राज को चुनौती देते हुए ये राष्ट्रवादी हिंसा कर रहे हैं और नफरत फैलाने वाले भाषण दे रहे हैं। इनकी हिंसा के षिकार हैं नव-अछूत।
कांग्रेस के षासन के दौरान, उस पार्टी ने भी बाबासाहब को केवल औपचारिक रूप से सम्मान दिया था। कांग्रेस के राज में भी दलित उतने ही दमित थे जितने आज हैं। उनके साथ उतना ही भेदभाव किया जाता था जितना आज किया जाता है और वे आज भी अपने रोजाना की जिंदगी में उतनी ही हिंसा का सामना कर रहे हैं जितनी उस समय किया करते थे। उस समय भी दलितों की पीने की पानी के स्त्रोतों और षासकीय सुविधाओं तक पहुंच नहीं थी। आंध्रप्रदेष के गुंटूर जिले के सुंदूर गांव और बेलची में हुए दलित हत्याकांड और भागलपुर में कैदियों को अंधा करने की घटनाएं इसकी गवाह हैं। कांग्रेस ने भी दलितों के साथ भेदभाव करते हुए कुछ दलित नेताओं के सामने सरकारी कल्याण योजनाओं के टुकड़े फेंक कर उन्हें अपने साथ मिला लिया था।
प्रजातंत्र में आस्था रखने वाले हम सभी भारतीय नागरिकों को हमारी संस्कृति के प्रजातंत्रिकरण के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना होगा और बाबासाहब की समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाना होगा। इसी राह पर चलकर भारत में सचमुच अच्छे दिन आएंगे।
-इरफान इंजीनियर
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रविवार, 22 मई 2016

मुझे मेमसाहब, बहू समेत सबसे पूछताछ की इजाजत दीजिए, मामला खोल दूंगा


         


 

: जांच अधिकारियों ने मुख्य सचिव और डीजीपी तक से साफ कह दिया था कि यह चोरी नहीं है : दो दिन में दारोगाओं ने मामला फर्जी बताया है, पर डेढ़ महीने तक अड़े रहे डीजीपी : दारोगाओं को शुरू से ही शक था कि यह चोरी नहीं, घरेलू गोरखधंधा है : देख लो, बड़े बाबुओं की करतूतें- 36 :

--कुमार सौवीर
लखनऊ : मुख्यसचिव आलोक रंजन के घर हुई तथाकथित चोरी तो अब खुद आलोक रंजन के ही गले की फांस बन गयी है। इस मामले में दो युवकों को बेइम्तिहां और जघन्य प्रताड़ना देने के बाद संकेत मिल रहे हैं कि दरअसल यह चोरी का मामला था ही नहीं। जांच अधिकारियों की मानें तो यह घरेलू गबड़धंधा का मामला था, जिसका उद्देश्य एक-दूसरे पर बला डालना ही था।
आपको याद होगा कि आलोक रंजन के घर बेशकीमती हीरों का एक नेकलेस-सेट की चोरी के कथित मामले में पुलिस ने दो युवकों को जिले के विभिन्न थानों पर अमानवीय प्रताड़ना दी थीं। यह दोनों लोग सरकारी कर्मचारी थे जिनमें से एक राष्ट्रीय निगम नाफेड का क्लर्क था, जबकि दूसरा राज्य बीज निगम का चपरासी था। बताते हैं कि इन युवकों को मुख्यसचिव और डीजीपी के दबाव के चलते पुलिस ने गैरकानूनी तरीके से पुलिस हिरासत में रखा और इस बीच उनकी जमकर पिटाई भी की गयी। इस पूरे दौरान हुई जबर्दस्त प्रताड़ना से त्रस्त होकर एक कर्मचारी ने आत्महत्या करने तक की कोशिश की।
हालांकि इस नेकलेस की कीमत को लेकर तीस लाख रूपयों से लेकर डेढ़ करोड़ तक की चर्चाएं चल रही हैं, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इसकी असल कीमत क्या थी। ऐसी हालत में उसकी कीमत को लेकर कोई ठोस निर्णय पुलिस अब तक नहीं पहुंच सकी है, लेकिन चूंकि जिस तरह से इस मामले में मुख्यसचिव और डीजीपी ने अपनी कमर कस रखी थी, उससे तो साफ पता चल रहा है कि इस हीरों वाला नेकलेस बेशकीमती ही था। लेकिन इस मामले में एक नया मोड़ सामने आया है। पता चला है कि मुख्यसचिव के घर कोई चोरी-फोरी हुई ही नहीं थी। जिला पुलिस के एक अधिकारी ने एक बातचीत में साफ कुबूल किया कि यह चोरी का मामला ही नहीं था। इस अधिकारी का कहना है कि इस मामले में दोनों की पिटाई और जबर्दस्त पूछताछ के दो दिन बाद ही जांच पुलिस अधिकारियों को साफ पता चल गया था कि यह घरेलू झंझट का मामला था।
इतना ही नहीं, इस अधिकारी ने अपना नाम न खुलासा करने की शर्त पर कुबूला कि उसे मुख्या सचिव की मेमसाहब, उनकी दोनों बहू समेत घर के सभी सदस्यों से पूछताछ की इजाजत दे दीजिए, तो मैं यह मामला चुटकियों में खोल दूंगा। यह बात केवल हवा में ही नहीं की गयी थी, जांच अधिकारियों ने इस मामले में मुख्यसचिव और डीजीपी तक से साफ कह दिया था कि यह चोरी का मामला नहीं है। इन अफसरों ने मामले फर्जी बताया था, पर डेढ़ महीने तक अड़े रहे मुख्यसचिव और डीजीपी अपनी ही बात पर अड़े रहे। बल्कि उन अधिकारियों से कह दिया था कि इस तरह की सिर-पैर की बातें मत करो, वरना तुम्हें घर से दूर पोस्ट करवा दूंगा। इन अधिकारियों को शुरू से ही शक था कि यह चोरी नहीं, घरेलू गोरखधंधा है, जिसके तार मेमसाहब, दोनों बहू, घरेलू दीगर कर्मचारियों आदि पर हैं।
लेकिन मामला जस का तस ही सड़ता ही रहा।

- कुमार सौवीर

- कुमार सौवीर

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शनिवार, 21 मई 2016

किसान विरोधी हैं केंद्र व प्रदेश की सरकारें

सिकरारा (जौनपुर): उत्तर प्रदेश किसान सभा द्वारा गाजीपुर से शुरू हुई 40 दिवसीय किसान जन जागरण यात्रा रविवार को जिले में पहुंची तो जगह-जगह लोगों ने जोरदार स्वागत किया।
गुदरीगंज में आयोजित किसान सभा में गाजीपुर के पूर्व सांसद व किसान नेता विश्वनाथ शास्त्री ने कहा कि केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली सरकार और प्रदेश की सपा दोनों सरकारें किसान विरोधी हैं। पिछले वर्ष बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि का मुआवजा आधे से अधिक किसानों को नहीं मिला। फसल तबाह होने से दो दर्जन से अधिक किसानों ने दम तोड़ दिया। हजारों कर्ज तले दबे हैं, लेकिन समस्त प्रभावित किसानों को सरकार अब तक मुआवजा नहीं दे पाई है।
किसान सभा की प्रदेश उपाध्यक्ष अर्चना उपाध्याय ने कहा कि नहरों में टेल तक पानी नहीं पहुंच पाता। इस साल दैवीय आपदा के कारण किसानों की फसल बीमा व फसल मुआवजा तो केंद्र और राज्य सरकार द्वारा घोषित धनराशि का लाभ प्रदेश के 70 फीसद किसानों को प्राप्त नहीं हो सका है। गाजीपुर के पूर्व विधायक राजेंद्र यादव व जयराम ¨सह ने कहा कि सूखे और मौसम की मार झेल रहे पूरे देश के किसानों का हाल किसी से छिपा नहीं है।
किसान सभा के आजमगढ़ के जिलाध्यक्ष रामाज्ञा चौधरी ने कहा कि किसान और किसानों की बात करने वाली मोदी सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है। अभी तक 70 फीसद किसानों को उत्तर प्रदेश में कोई मुआवजा नहीं मिला। किसान आत्महत्या करने पर विवश हो रहा है। संचालन कर रहे उदल यादव ने कहा कि जो भी सरकार केंद्र या राज्य में बनती है वह किसान हितैषी बताती हैं अपने आपको को और होता उसका उल्टा है। अध्यक्षता किसान राजाराम यादव व आभार सुभाष गौतम ने ज्ञापित किया।
----दैनिक जागरण
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बुजुर्ग किसानों को दी जाए पेंशन

बुजुर्ग किसानों को दी जाए पेंशन
उरई, जागरण संवाददाता : गाजीपुर से 11 अप्रैल को निकाली गई किसान जन जागरण यात्रा सोमवार को नगर में पहुंची। इसका कार्यकर्ताओं द्वारा मजदूर भवन के पास स्वागत किया गया।
यात्रा की अगुवाई कर रहे पूर्व विधायक और किसान सभा के प्रदेश महामंत्री राजेंद्र यादव ने कहा कि यह यात्रा किसानों के हित की मांग को लेकर निकाली जा रही है। उन्होंने कहा कि किसानों की हालत इस समय अत्यंत दयनीय है। फिर भी सरकारें उनके हित के लिए कदम नहीं उठा रही हैं। 60 वर्ष से अधिक उम्र के सभी किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों को 6 हजार रुपये मासिक पेंशन प्रदेश व केंद्र सरकार को मिलकर देना चाहिए। किसानों को अभी तक रबी और खरीफ फसल का मुआवजा नहीं मिल पाया है। वितरण में घोटाला हो रहा है। स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू नहीं किया जा रहा है जिससे किसानों के सामने संकट है। प्रदेश संरक्षक जयराम ¨सह ने बताया कि यह यात्रा 20 मई को विभिन्न जनपदों का भ्रमण करते हुए 20 मई को लखनऊ होगी और विधानसभा भवन के सामने किसान पंचायत कर किसानों की मांगों को पूरा करने की मांग की जाएगी। इस मौके पर सुधीर अवस्थी, प्रभुदयाल पाल, गीता चौधरी, संजय पाठक, विनय पाठक, देवेश चौरसिया और मजबूत यादव समेत कई लोग मौजूद रहे।
--दैनिक जागरण
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कोई नहीं सुन रहा किसानों की आवाज

कोई नहीं सुन रहा किसानों की आवाज
सुलतानपुर : गाजीपुर से बीस दिन पूर्व निकली किसान जनजागरण यात्रा शुक्रवार को जिला मुख्यालय पहुंची। इस अवसर पर आयोजित सभा में दिग्गज नेताओं ने आरोप मढ़ा कि देश और प्रदेश में किसानों की सुनने वाला कोई नहीं है। वो जाए तो कहां जाए? उसके साथ उपेक्षापूर्ण बर्ताव किया जा रहा है।
11 अप्रैल को गाजीपुर से पूर्व विधायक राजेंद्र यादव, इम्तियाज बेग, पूर्व सांसद विश्वनाथ शास्त्री आदि प्रमुख जनप्रतिनिधियों व किसान नेताओं की अगुवाई में किसान जनजागरण यात्रा निकाली गई। जो विभिन्न जिलों से गुजरते हुए शुक्रवार को जिला मुख्यालय के तिकोनिया पार्क पहुंची। उत्तर प्रदेश किसान सभा की स्थानीय इकाई के तत्वावधान में जिले के किसानों ने जनजागरण यात्रा की अगवानी की। फिर सभा की शुरूआत हुई। जिलाध्यक्ष रामअजोर की अध्यक्षता में आयोजित सभा में पूर्व सांसद विश्वनाथ शास्त्री ने कहाकि सरकार की नीतियां किसान विरोधी हैं। विगत पंद्रह सालों में आठ लाख से अधिक किसानों ने आत्महत्या कर ली है। देश-विदेश की सारी भूमि सड़कों एवं आवासों के लिए कब्जा कर ली जा रही हैं। किसान नेता हृदयराम वर्मा व पूर्व विधायक जयराम सिंह ने आह्वान किया कि दलगत व जातिगत भावनाओं से ऊपर उठकर सभी नेताओं व किसान समितियों को एकजुट होना चाहिए। जिले की बिगड़ती कानून व्यवस्था का भी मुद्दा जोरशोर से उठाया गया। अर्चना पांडेय व शारदा पांडेय ने कहाकि बल्दीराय के महुली गांव में बम व गोलियां चलीं। लेकिन पुलिस निष्क्रिय रही। उन्होने बल्दीराय थाने पर अनुचित क्रियाकलाप का आरोप मढ़ा। चेतावनी दी कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं होती तो किसान एसपी दफ्तर घेरेंगे। विजय राजभर व जौनपुर से आए कृष्ण नारायण तिवारी ने मांग की कि राष्ट्रीय किसान आयोग की संस्तुतियों को केंद्र व राज्य सरकारें तत्काल लागू करें। किसानों के सहकारी व सरकारी कर्ज माफ किए जाए। कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य दिया जाए। इस मौके पर बड़ी तादाद में किसान मौजूद रहे।
-दैनिक  जागरण
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भारत के विकास का नारा चंद कारपोरेट घरानों के लिए: अतुल अंजान


For some corporate houses of India's development slogan: Atul Anjan


भाकपा के राष्ट्रीय सचिव एवं अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय महामंत्री अतुल कुमार अंजान ने कहा कि सरकारों की किसान विरोधी नीतियों के कारण खेती, किसानी, गांव, देश बर्बाद हो रहे हैं। कर्ज के बोझ के चलते पांच लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। वादे के बावजूद डा. स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू नहीं हो रही है। भारत के विकास का नारा चंद कारपोरेट घरानों के लिए है। देश की 65 से 70 प्रतिशत आबादी के लिए नहीं है।
वह सरजू पांडेय पार्क में आयोजित सभा में बोल रहे थे। बता दें कि किसानों की 20 सूत्रीय मांगों को लेकर उत्तर प्रदेश किसान सभा की तरफ से दो प्रदेशस्तरीय जनजागरण यात्रा एक सरजू पांडेय पार्क एवं दूसरी मथुरा से सोमवार को शुरू हुई। इस अवसर पर सरजू पांडेय पार्क में हुई सभा में अंजान ने कहा कि इन लोगों के विकास के बिना तरक्की का नारा पूरी तौर पर बेईमानी है। पूंजीवादी विकास के रास्ते ने मानवता को तार-तार कर दिया है।

मोदी सरकार ने जो वादा किया उसे पूरा तो नहीं कर रही है, उल्टे जनता का ध्यान हटाने के लिए हैदराबाद, जेएनयू आदि विश्वविद्यालयों की स्वायत्ता पर धावा बोल रही है। कहा कि इनके विकास के दायरे में सिर्फ और सिर्फ देशी-विदेशी पूंजीपति हैं, किसान कहीं नहीं है। सबका साथ, सबके विकास की थोथी बातें बंद करनी होगी। ऐसे हालात में खेती, किसान, गांव, देश बचाने के लिए जाति-धर्म, दल से ऊपर उठकर किसान समुदाय को संगठित होकर 20 मई को लखनऊ विधानसभा के सामने एकत्र होना होगा।

इस अवसर पर प्रदेश महामंत्री पूर्व विधायक राजेन्द्र यादव, पूर्व सांसद विश्वनाथ शास्त्री, कृपाशंकर सिंह, अखिलेश राय, सूर्यनाथ यादव, जयराम सिंह, जनार्दन राम, ब्रजभूषण दुबे, प्रो. केएन सिंह आदि ने विचार व्यक्त किया।
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विनय कुमार सिंह

विनय कुमार सिंह
अध्यक्ष आल इंडिया किसान सभा बाराबंकी

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देश के बदलते सामाजिक परिवेश में जहाँ समाज का तक़रीबन हर वर्गव्यवसायीकरण एवं स्वार्थ हित के आवरण में लिपट चुका है , मीडिया भीइस से बच नहीं पाया किसी जमाने में देश हित लोकहित के लिएसमर्पित समाज का यह प्रमुख अंग जिसे चौथे खम्भे की उपमा दी जाती है, अब उस स्तिथि में जा पहुंचा है, कि यह सब हित उसे तब याद आते हैं जबउसके हितों पर कोई आंच राही होती है ऐसे में प्रिंट मीडिया से लेकरइलेक्ट्रोनिक मीडिया ( जो अधिकांशत: साम्राज्यवादियों की आवाज है) तक की जनता की नजरों मेंविश्वसनीयता में कमी देखी जा रही है आज जनता अपने विचारों की अभिव्यक्ति करने वाले समाचार पत्रों एवं चैनलों को तरस रही है जनता के इसी एहसास के करीब पहुँच कर उसके अन्दर फिर से मीडिया के लिए विश्वास पैदा करने के उद्देश्यसे एक प्रयास "" लोक वेब मीडिया" के तौर पर किया गया हैइस समाचार सेवा में अन्तराष्ट्रीय, राष्ट्रीय, प्रादेशिक स्थानीय समाचार उसके भीतर के समाचारों पर बेबाक टिप्पणीयां, इसकी विशेषताओं में शामिलरहेंगीवर्तमान समय का मीडिया, साम्राज्यवादी, सामन्तवादी, धार्मिक कट्टरपंथ एवं विभिन्नराजनीतिक विचारों के आधार पर विभाजित दिखता हैनिष्पक्ष, निर्भीक एवं यथार्थवादी दृष्टिकोण के करीबयदि हम पहुँच सके तो इसे हम अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि समझेंगेआशा है की हमारा यह छोटा सा प्रयासभले ही नक्कार खाने में तूती की आवाज सामान हो, परन्तु मील का पत्थर अवश्य साबित होगा
-मो॰ तारिक खान

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