शनिवार, 8 मई 2010

आतंकवाद

दुनिया में वाद की कमी नहीं है - क्षेत्रवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद। इस तरह के बहुत सारे निकृष्ट वाद हैं; लेकिन कुछ उत्तम वाद भी हैं या यूं कहिए कि विचारात्मक वाद हैं जैसे समाजवाद, साम्यवाद, गांधीवाद, पूंजीवाद और फिर इन्हीं वाद के बीच में उत्पन्न हुआ और पनपा आतंकवाद। अपने किसी वाद को दूसरों पर थोपने या मनवाने के लिए जिस हठधर्मी और बल का प्रयोग किया जाता है यही तो है आतंकवाद। आतंक क्या है, अपने सामने वाले को डराना, भय या दहशत में डालना। शब्दकोषों में आतंक की जो परिभाषा दी गई है वह है भय और दहशत। जो हर युग में रही है, अपने-अपने रूप में।

आज मैं अपने देश में फैले आतंकवाद पर विचार करने बैठा हूं। अंग्रेजों ने भारत पर कब्जा किया, उसे गुलाम बनाया और भारत का सब कुछ लूटकर अपने देश पहुंचाया और जब अंग्रेजों के इस लूट का विरोध हुआ तो विरोध करने वालों को ब्रिटिश साम्राज्य ने आतंकवादी और उनके द्वारा किये जा रहे कार्य को आतंक की संज्ञा दिया। हमारे देश की लड़ाई ने साम्राज्यवाद को समाप्त किया लेकिन समाप्त हुए साम्राज्य ने देश को खण्डित आजादी दिया। उसके लिए हम दोषी किसी को भी माने लेकिन दोष तो ब्रिटिश साम्राज्यवाद का जिसने हमारे नेतृत्व को सम्प्रदाय के नाम पर बांट कर देश का खण्डित किया और खण्डित आजादी पाकर भी हम खुश रहे और उस खुशी में उस साम्राज्य को गुणगान आज भी हम करते नहीं थकत,े वह जो हमारा अधिनायक ठहरा।

अगस्त 1947 में हमने आजादी पाई लेकिन मिली हुई आजादी हमको नहीं भायी और हम भारतीयों के एक गिरोह ने जो देश की आजादी के सिपाहियों का विरोध कर अंग्रेजों की दलाली करता था सिर उठाया और 30 जनवरी, 1948 को देश में पहली आतंकवादी घटना घटित हुई। आजादी के बाद से ही वह गिरोह देश में आतंक का माहौल बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहा, देश को खण्डित करने का दोषी कोई भी रहा हो लेकिन उस गिरोह ने इस देश के शान्तिप्रिय मुसलमानों को देश के बंटवारे का दोषी होने का प्रचार करके उन्हें आतंकित करने का कार्य किया। आतंक का माहौल इस हद तक पैदा किया कि मुसलमान भी अपने को बंटवारे का दोषी मानकर उस गिरोह के दुष्प्रचार को रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। यही दुष्प्रचार जो और आरम्भ किया गया कि मुसलमान चाहे जितना योग्य हो उसे इस देश में नौकरी पाने का अधिकार नहीं रह गया और इस दुष्प्रचार को भी स्वीकार करके मुसलमानों ने अपने को पीछे कर लिया। नतीजा हुआ कि मुसलमान शिक्षा में, नौकरियों में, उद्योग में और खेती में पीछे होता गया और इस हद तक पीछे हुआ कि तमाम आयोगों की रिपोर्ट उसे दलितों से भी पीछे मानती है।

देश का विकास चाहने वाले लोगों की समझ में यह बात आयी और नतीजे में मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने भी मुसलमानों की पढ़ाई पर जोर देना शुरू किया और उन्हें धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ वैज्ञानिक, तकनीकी, चिकित्सीय तथा प्रशासनिक शिक्षा की ओर अग्रसर किया। कुण्ठित बुद्धि खुली और देश की मुख्य धारा में जुड़कर मुसलमानों ने भी देश की सेवा का व्रत लिया और देश को विकसित करने के लिए बढ़कर आगे आये लेकिन देश की आजादी के विरूद्ध साजिश रचने वाले गिरोह ने उसे स्वीकार नहीं किया और हर शासन के खिलाफ मुसलमानों के तुष्टिकरण की नीति का दुष्प्रचार जोरो शोर से किया और मुसलमानों के तुष्टिकरण के दुष्प्रचार को हर आयोग की रिपोर्ट ने झुठलाया है।

यह मानना होगा कि कांग्रेस विरोधियों से कहीं न कहीं भूल हुई कि उन्होंने देश की आजादी विरोधी गिरोह को अपना साथी बनाया, जिसका भरपूर लाभ उस गिरोह ने उठाया। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी जिसमें कई प्रमुख मंत्रालय उस गिरोह के मुखिया लोगों के पास रहा, उन सीधे-साधे लोगों ने देश विरोधी गिरोह की साज़िश नहीं समझा और उस समय उस गिरोह के मुखिया लोगों ने शासन के हर तंत्र में अपने लोगों को फिट किया, जिसकी भनक देर में ही सही तत्कालीन समाजवादी नेता राजनरायण को लगी और उन्होंने दोहरी सदस्यता का प्रश्न उठाकर गिरोह को शासन तंत्र से अलग करने का प्रयास किया लेकिन गिरोह की साज़िश कामयाब हुई और सरकार टूट गई। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और भाईचारा पर कुठाराघात हुआ और फिर एक समय आया जब साम्प्रदायिक भावना भड़काकर देश की आजादी का विरोधी गिरोह शासन में आया। उत्तर प्रदेश में उस गिरोह का शासन स्थापित हुआ और केन्द्र के शासन पर भी उसका वर्चस्व कायम हुआ। जिसका नतीजा 6 दिसम्बर, 1992 की देश की सबसे बड़ी आतंकवाद घटना, उस घटना से पहले और बाद में गिरोह की सोच ने हजारों देशवासियों की जान ली, देश की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाया और देश में आतंक का माहौल पैदा हुआ और बढ़ता रहा।

मुसलमानों ने हिम्मत नहीं हारी, देश के संविधान के अनुसार धार्मिक शिक्षा प्राप्त कर अपने चरित्र का निर्माण और आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर देश के विकास में आगे बढ़े, जिसे यह गिरोह सहन नहीं कर सका और केन्द्र तथा राज्य में एक साथ शासन में आने के बाद देश के मुसलमानों के साथ षड़यन्त्र रचने में लगा रहा। धार्मिक शिक्षा देने वाली संस्थाओं चाहे वह नदवद उल उलमा लखनऊ हो या दारूल उलूम देवबंद हर एक के खिलाफ यह गिरोह आतंकवादी शिक्षा देने और आतंकवादी तैयार करने का दुष्प्रचार करने लगा, मदरसों पर छापे डलवाये, साज़िश के तहत कोई छोटी-मोटी घटना कारित कर केन्द्र में तत्कालीन गृहमंत्री और उत्तर प्रदेश में तत्कालीन नगर विकासमंत्री मीडिया पर चिल्लाना शुरू करते थे कि अमुक घटना में लश्करे तोयबा और सिमी (स्टूडेन्ट स्लामिक मूवमेन्ट आॅफ इण्डिया) का हाथ है और नतीजतन 27 सितम्बर, 2001 को सिमी पर पाबन्दी लगा दी गई, जिसका खुलासा ट्रिब्यूनल के फैसले से होता है। ट्रिब्यूनल के उस फैसले पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा दी और नये सिरे से सरकार ने सिमी पर पाबन्दी लगाई और सरकार के इसी फैसले से तंग आकर शाहिद बद्र फलाही ने नई पाबन्दी के खिलाफ ट्रिब्यूनल में जाने का इरादा तर्क कर दिया। एक आतंकवादी हो तो गिनाया जाए, गुजरात को मुसलमानों के सामूहिक वध का वर्कशाप बनाकर वहां पर गिरोह के मुखिया ने आतंक का माहौल पैदा किया जो धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया और यह गिरोह जो ब्रिटिश साम्राज्य का समर्थक रहा था अमरीकी साम्राज्यवाद का समर्थक बन बैठा और अपने देश में अमरीका का वर्चस्व कायम करने में कोर कसर नहीं रखा। खूफिया तंत्र में अमरीा, इसराइल और ब्रिटेन का साझा फौजी प्रशिक्षण में अमरीका का हाथ, देश के अर्थतंत्र में अमरीका और इसराइल का हस्तक्षेप बढ़ा है।

26/11 की जांच का नतीजा बताता है कि मुम्बई हमले में डेविड कोलमैन हेडली का पूरा हाथ रहा है जो खुला हुआ सी0आई0ए0 और एफ0बी0आई का एजेन्ट होने के साथ-साथ सी0आई0ए0 और आई0एस0आई0 की बीच की कड़ी है लेकिन हमारी सरकार बेबस और मजबूर उससे पूछताछ भी नहीं कर सकती। अमेरिका जब चाहेगा पाकिस्तानी आतंकी को पाकिस्तान भारत के हवाले करेगा और उसके खुद के लिए इससे अधिक कहना क्या? मालेगांव ब्लास्ट में अभिनव भारत और सनातन संस्था ऐसे संगठनों से सम्बन्धित लोगों का नाम आया है साथ ही संघ परिवार के एक प्रमुख का नाम आया है, आई0एस0आई0 के साथ उनके अच्छे प्रगाढ़ रिश्ते का। संघ परिवार की छत के नीचे पलने वाले अनेक संगठन हैं और इन्हीं संगठनों का नाम आया है। गोआ और मक्का मस्जिद हैदराबाद के ब्लास्ट में। हमारी जांच एजेन्सियां पहले से ही तय कर लेती हैं कि हर ब्लास्ट में मुसलमानों का शामिल होना और तफ्तीश का रूख हर दिशा में न करके सिर्फ एक दिशा में मोड़ दिया करती हैं जिसके कारण सही नतीजा सामने नहीं आता है।

पहले आतंकवादी पैदा करने में मदरसों का नाम आया और उसे सच साबित करने के लिए हमारी जांच एजेन्सियों ने उन मदरसों से पढ़कर निकलने वाले या फिर उनमें पढ़ने वाले नौजवान को निशान बनाया और जब देखा कि मुसलमान नौजवान आधुनिक शिक्षा में भी रूचि रखता है और आगे बढ़ने के लिए शिक्ष ग्रहण कर रहा है तो ऐसे नौजवानों को मुल्जिम बनाया, साथ ही 2006 से 2008 तक वह समय रहा है जब पूरे देश के मुसलमानों को विदेशी आतंकवादी संगठनों से भी जोड़ने का प्रयास किया गया जिसके नतीजे में बंगाल और कश्मीर के कम पढ़े-लिखे नौजवानों को भी अभियुक्त बनाया गया लेकिन उन सब की बेगुनाही के सबूत चिल्ला-चिल्लाकर बोल रहे हैं और कह रहे है कि सारे के सारे नौजवान बेगुनाह हैं। 23 जून, 2007 को लखनऊ में पकड़े गये जलालुद्दीन और नौशाद के तथाकथित बयान पर उ0प्र0 एस0टी0एफ0 द्वारा अली अकबर हुसैन और शेख मुख्तार की गिरफ्तारी हो या 26 जून, 2007 को अलीपुर प0बंगाल के ज्यूडीशियल मजिस्टेªट की अदालत से अजीजुर्रहमान को कस्टडी में लिया जाना, जो 22 जून, 2007 से 26 जून, 2007 तक मजिस्ट्रेट के आदेश से एस0ओ0जी0/सी0आई0डी0 प0 बंगाल की कस्टडी में था। 12 दिसम्बर, 2007 और 16 दिस्मबर, 2007 को क्रमशः गिफ्तार किये गये मो0 तारिक कासमी और मो0 खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी 22 दिसम्बर, 2007 को दिखाई गई है। राजस्थान से गिरफ्तार किये गये नौशाद नगीना जिला बिजनौर से गिरफ्तार किये गये, याकूब और उत्तरांखण्ड के हरिद्वार से गिरफ्तार किये गये नासिर की गिरफ्तार लखनऊ से दिखाई गई। फर्जी कार्यवाही फर्जी होती है और वह फर्जी साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है। हर मुकदमे और हर मुल्जिम को गिना पाना यहां सम्भव नहीं है और न ही यहां उसकी आवश्यकता है, यह तो कुछ उदाहरण उद्धृत किये गये हैं। आफताब आलम अंसारी बेगुनाह साबित हुआ, शेख मुबारक की बेगुनाही ने उन्हे जेल की सलाखों से बाहर किया, मक्का मस्जिद हैदराबाद के मामले में बनाये गये अभियुक्त छोड़े गये और सच्चाई धीरे-धीरे सामने आ रही है यानी कि जो गिरोह गुलाम भारत में देश के खिलाफ साज़िश में लगा हुआ था आज भी उसकी साजिशें रूकी नहीं हैं और पहले वह ब्रिटिश साम्राज्य की दलाली करता था आज अमरीकी साम्राज्य की दलाली में लगा है। देश पर फिर से साम्राज्य स्थापित न हो और देश की सम्प्रभुता बरकरार रहे इसलिए हमें असली आतंकवादी को पहचान करके आतंकवाद से बचाने के लिए अपने को चैकस रखना होगा और आतंकवादी गिरोह बेगुनाहों को आतंकवादी कहकर खुद आतंकवाद फैला रहा है, समझना होगा यही है असली आतंकवाद।

मुहम्मद शुऐब एडवोकेट
blog comments powered by Disqus

लोक वेब मीडिया टीम

मुख्य सलाहकार - मुहम्मद शुऐब
मोबाइल
-09415012666
संपादक -तारिक खान
मोबाइल
-09455804309
प्रबंध संपादक -रणधीर सिंह सुमन
मोबाइल
-09450195427
उपसंपादक - पुष्पेन्द्र कुमार सिंह
मोबाइल
-09838803754

subscribe

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

Loksangharsh Patrika

Loksangharsh Patrika

 

Template by NdyTeeN