सोमवार, 16 अगस्त 2010

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर परलोक सिधारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मथुरा प्रसाद पंच तत्व में विलीन

बाराबंकी।जनपद के वयोवृद्ध स्वंतत्रता संग्राम सेनानी मथुरा प्रसाद का
पार्थिव शरीर स्वतंत्रता दिवस के दिन पंच तत्व में विलीन हो गया।उनका
निधन स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर संजय गांधी मेडिकल इंस्टीटयूट
लखनऊ में एक लम्बी बीमारी के पश्चात हो गया था।वह 88 वर्ष के थे।उन्होने
अपने पीछे एक पुत्री व एक पुत्र जो कि प्रादेशिक पुलिस सर्विसेज में है
और एस0पी0गा्रमीण लखनऊ के पद पर तैनात है, के अलावा नाती पोतो से भरा
परिवार छोड़ा है।
बांदा जनपद में एक सम्मानित कायस्थ घराने में जन्में मथुरा प्रसाद के
पिता माता प्रसाद श्रीवास्तव अपने जमाने के बड़े वकील थे और बेटे को भी
वकील बनाने का सपना देख रहे थे।इसीलिए उन्होने मथुरा प्रसाद को इलाहाबाद
विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा हेतु भेजा।मथुरा प्रसाद ने स्नातक कला व
विधि स्नातक की डिग्री प्राप्त की।परन्तु इलाहाबाद में उस समय पंडित
नेहरु व पुरुषोत्तम दास टंडन तथा अन्य राजनेताआंे के द्वारा जलायी जा रही
स्वतंत्रता संग्राम की मशाल की तपिश से वह भी प्रभावित हुए बिना नही रह
सके।परिणाम स्वरुप पढाई को आगे और न बढा कर वह भी स्वतंत्रता संग्राम के
समर में नौजवानी में कूद पड़े।उसके पश्चात जेल जाने व निकलने का सिलसिला
जो प्रारम्भ हुआ तो आजादी के बाद तक चलता रहा।भारत छोडो आन्दोलन वर्ष
1942 में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लाल पदम धर सिंह की शहादत के पश्चात
उनकी अर्थी के जुलूस में उन्हे गिरफ्तार कर 3 माह तक कैद रखा गया।फिर जेल
से बाहर निकल कर उन्होने अपनी बात जनता तक पहुॅचाने के लिए प्रेस का
सहारा लिया और स्वदेशी लीग नामक एक सांध्य हिन्दी दैनिक उन्होने अपने
सम्पादन में निकाला,जिसे वह साइकिल चला कर व पैदल स्वयं वितरित करते
थे।उन्हे अंगेजी हुकूमत ने कई बार जिला बदर भी किया।
स्वतंत्रता ंभारत में भी उनकी जेल यात्रा का सफर जारी रहा वर्ष 1962में
भारत चीन के आक्रमण के पश्चात माक्र्सवादी पार्टी के कार्यकर्ताओ की जब
धरपकड़ शुरु हुई तो उन्हे भी जेल जाना पडा।फिर अंतिम बार आपात काल के
दौरान फिर उन्हे जेल जाना पडा।अपने पूरे जीवन काल में वह सामाजिक रुप से
सक्रिय रहे और इंडियन रेड क्रास सोसाइटी के लाइफ सदस्य रहे तथा जनपद में
इंडियन रेड क्रास सोसाइटी को सक्रिय करने में उनकी प्रमुख भूमिका रही।वह
सोसाइटी फार प्रिवेशन आफ क्रूएल्टी टू एनिमल के भी जनपद में अध्यक्ष रहे।
उनकी पत्नी राजकीय बालिका इण्टर कालेज में प्रवक्ता के पद पर
स्थानान्तरित होकर आई तो वह भी यहाॅ आकर 60 के दशक के मध्य में बस
गए।उनकी रुचि साहित्य में भी काफी थी और उर्द,
फारसी,अंग्रेजी,हिन्दी,फ्रेन्च,तथा रुसी भाषाओं पर उन्हे सम्पूर्ण
नियंत्रण था।
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