सोमवार, 21 नवंबर 2011

तिलिस्म-ए-होशरुबा, उर्फ़ पूंजी की अनकही कहानी

[यह लेख हाल में प्रभात खबर के दीपावली विशेषांक में छप चूका है और मेरी हालिया किताब डिजायर नेम्ड डेवेलपमेंट के कुछ अंशों पर आधारित है.]

एक ज़माना था जब इंसान जिंदा रहने के लिए पैदावार किया करता था. बहुत पुरानी बात नहीं है – यही कोई सौ डेढ़ सौ बरस पहले का किस्सा है. आज जब हम जिंदा रहने के लिए नहीं बल्कि ‘जीडीपी’ या ‘सेंसेक्स’ जैसे कुछ अदृश्य देवताओं का पेट भरने के लिए पैदावार करते हैं, तब यह बात हमारी याद्दाश्त से तकरीबन गायब हो चुकी मालूम होती है की ये देवता दरअसल बहुत नए हैं. ‘जीडीपी’ की उम्र बमुश्किल अस्सी साल होगी, और ‘सेंसेक्स’ तो हमारे यहाँ १९७९ में ही वजूद में आया है. याद रखने काबिल बात है की इन दोनों का लोगों के वास्तविक जीवन से कोई रिश्ता नहीं है और यह बिलकुल मुमकिन है कि लोगों के जीवन-स्तर में लगातार गिरावट के साथ साथ आंकड़ों में हमें दोनों में अच्छी खासी बढोतरी दिखाई दे. मसलन, यह संभव है कि आप जंग के वक़्त लगातार जीडीपी में इज़ाफा देखें जब वास्तव में लोगों कि ज़िंदगियाँ बद से बदतर होती जा रही हों.

मगर बात सिर्फ इतनी ही होती तो भी गनीमत होती. किस्सा आगे यह भी है कि आज ‘अर्थव्यवस्थाएं’ सिर्फ उपभोग का सामान ही पैदा नहीं करतीं बल्कि लगातार, हर रोज, हर लम्हा, ‘उपभोक्ता’ भी पैदा करती हैं. उपभोक्ता वह नहीं है जो अर्थव्यवस्थाओं द्वारा पैदा की जाने वाली वस्तुओं का भोग करता है. उपभोक्ता वह नहीं जो अपने ज़रूरत के लिए भोग करता है; न ही वह अपनी जिंदगी को थोड़ा बेहतर बनाने कि फ़िक्र में लगा होता है. बल्कि वह वो शै है जिसके जीवन का ध्येय ही भोग करना है. ‘उपभोक्ता’ दरअसल एक खास किस्म का जीव है जो हाल ही में, गालिबन बीसवीं सदी के मध्य के आसपास, वजूद में आया है और जिसका काम ही है अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए भोग करना. अगर वह ज़रा सी देर के लिए भी भोग करना बंद कर दे तो अर्थव्यवस्थाओं के सामने संकट खड़ा हो सकता है.

मगर उपभोक्ता बनना कोई सीधा और कुदरती मामला नहीं है. हम लोग सब कुदरती तौर पर उपभोक्ता नहीं होते. इस बनाने के पीछे खासी मशक्कत छिपी होति है. आजकल के समाजों में एक पूरा तामझाम, पूरा का पूरा तंत्र है जो लगातार व्यक्ति को उपभोक्ता बनाने में लगा रहता है. फंतासी कि इस दुनिया में व्यक्ति अनजाने ही झोंक दिया जाता है. इस मायालोक में ले जाने वाला एक यान है जिसका नाम है ‘क़र्ज़’ या क्रेडिट, जो पलक झपकते ही आपको उस मुहाने पर ले जा खड़ा कर सकता है जहां अजीबो-गरीब प्राणीयों से उसका साबिका होता है. यह है आज के ज़माने का तिलिस्म-ए-होशरुबा – आधुनिक समाजों का पूंजीवादी उपभोग का यूटोपिया.

दास्तानए-अमीर हम्ज़ा के किस्सों में ‘होशरुबा’ (यानि होश उड़ा देने वाला) नाम के एक तिलिस्मी मुल्क का ज़िक्र आता है जिसका वर्णन एक ऐसे मायालोक के रूप में किया गया है जहां अनगिनत छलावे घात लगाए रहते हैं और जहां चकाचौंध कर देने वाले नजारों के बीच ताक़तवर जादूगरनियाँ और पैशाचिक दानव हर तरफ अपना जाल बिछाए रहते हैं.

हमारे आज के इस यूटोपिया में ऐसा ही कुछ माहौल देखने को मिल सकता है. जगामाते हुए रंगारंग इश्तेहारों कि रौशनी में लीला करते ये प्राणी, यकायक आपको उस मुहाने से उठा कर दूर देश में ले जाने चले आते हैं जहाँ आपका क्रेडिटरुपी यान आपको उतार उतार कर गया है.

आज, इक्कीसवीं सदी में जिसे हम ‘विकास’ कहते हैं, वह दरअसल उस उपभोक्ता के निर्माण कि कहानी है जिसका होना अर्थव्यवस्था के जिंदा रहने भर के लिए ज़रूरी है. और अगर अर्थव्यवस्था को दस फीसद की सालाना रफ़्तार से बढ़ना है तो फिर तो कहने ही क्या. फिर अंदाजा लगाइए कि किस रफ़्तार से और किस पैमाने पर उपभोक्ता पैदा करना पड़ सकता है. अगर आप को यह बात सुन कर हैरत हो रही है तो बस एक बार बीसवीं सदी के इतिहास पर नज़र डालिए. १९२९-३० के ‘ग्रेट डिप्रेशन’ से लेकर – बल्कि उससे भी पहले से – मांग (डिमांड) के गिरने का डर, जिसे अर्थशास्त्री ‘मंदी’ कहते हैं, पूँजीवाद को लगातार सालता रहता है. लिहाजा हर माल बेचने वाला आपको तमाम तरीकों से लुभाने के अलावा, आप के लिए क़र्ज़ का भी इंतज़ाम कर देता है. बीसवीं सदी के आखिर और इक्कीसवीं के शुरुआती दौर के ‘लेट कैपिटलइज्म’ में यह डर खासी शिद्दत से महसूस किया जाता है. लिहाजा एक ऐसी हालत बना दी जाती है कि आप सोचना समझना बंद कर के सब उस दस फीसद बढ़त कि खोज में निकल पड़ें, जिसके बिना, बताया जाता है, मानव समाज कि अब कोई गति नहीं है.

पिछली सदी के आखिरी दशक में सोवियत संघ समेत समाजवादी दुनिया के पतन के बाद तो इस संकटग्रस्त पूँजीवाद के लिए जैसे ‘बिल्ली के भाग से छींका फूटा’. अचानक उसके हाथ एक जन्नत लग गयी. समाजवाद और साम्यवाद के हताश योद्धा भी उसके सामने नतमस्तक हो गए और दुनिया भर में पूँजीवाद के निर्माण के काम में जुट गए. और इस नयी ताकात से लैस होकर सरमाये के एक नए विजयाभियान की शुरुआत हो गयी.

हमारे मुल्क में भी सरमाये का तांडवनृत्य शुरू हो गया. बीस लंबे साल यह नाच बेरोकटोक चलता रहा. पार्टियों और राज्य सरकारों में होड़ लग गयी. अंधाधुध जंगलात कटने लगे; चरों तरफ अवैध खनन के लिए रास्ते खोल दिए गए; मजदूरों की तनख्वाहों और यूनियन अधिकारों पर एकतरफा हमला शुरू हो गया और हर राजनीतिक नेता हाथ में माला लिए पूँजी की महिमा के बखान में और उसका नाम जपने में लग गया.

अब नयी रफ़्तार से दस फीसद की खोज में सारा देश निकल पड़ा. ज़ाहिर है की इस नए यूटोपिया की राह में जो भी आता है वह देशद्रोही ही हो सकता है. एक नया मध्यवर्ग उभर कर सामने आया जिसके मुंह खून का स्वाद लग चुका था. ऐसे में एक नयी नैतिकता का जन्म होता है जिसके तहत ‘अर्थव्यवस्था’ के खम्बे ‘मज़बूत’ करना और अपनी जेबें भरना ‘अस्ल में दोनों एक हैं’. नया मंत्र यही था. आप जितना पैसा बनायेंगे, देश उतना ही समृद्ध होगा. तो फिर अपनी जेबें भरना तो ज़रूरी हो ही जाता है, यह भी ज़रूरी हो जाता है कि उन तमाम लोगों को, जो जंगलों में या बेशकीमती खनिज पदार्थों की ज़मीन पर रहते हैं, सिरे से बेदखल कर के उस सामूहिक सम्पदा को अपने हाथों में कर लिया जाये.

ऐसा करने के दो फायदे है. सामूहिक संपत्ति तो अपने हाथ आ ही जाती है, साथ ही बेदखल आबादी भी शहरी श्रम बाजारों में खपने के लिए आज़ाद हो जाती है. यहीं से शुरू होता है एक और किस्सा. ज़मीन अधिग्रहण के साथ साथ जिसे मार्क्स ने ‘आदिम संचयन’ कहा था.

पिछले सालों में हमारे यहाँ यह प्रक्रिया काफी ज़ोरों से चली है. ज़बरन बेदखली और लूट. देखने में ऐसा लगता है जैसे अब दुनिया भर में सरमाये का परचम कुछ इस तरह लहर रहा है की उसके इस विजयाभियान के आगे कुछ भी टिक नहीं सकता.

मज़े की बात यह है की यही वह दौर है जब पूँजी अपने सबसे संकटग्रस्त रूप में दिखाई पड़ती है. मगर यह संकट मार्क्स या उनके अनुयायियों द्वारा बताये गए संकट से बिलकुल अलग है. ऐसा नहीं है कि इस संकट के चलते पूँजीवाद बस अब चरमरा के गिरने को है. लेकिन, एक मायने में यह संकट इससे भी ज्यादा घातक है. और यहीं छिपी है उसकी एक अनकही दास्तान. यह एक ऐसी सच्चाई जिसे पूँजी और उसके सिद्धान्तकारों के सिवा कोई नहीं जानता.

दरअसल बात यह है कि सचाई ऊपर से चाहे जैसे भी दिखाई दे, हकीकत यह है कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों में पूँजीवाद अपनी जड़ें जमाने में पूरी तरह नाकाम रहा है. मार्क्सवादी हमेशा मानते रहे कि दुनिया भर में पूँजीवाद की पूरी तरह जीत अवश्यंभावी है – तभी जाकर समाजवाद की बुनियाद खड़ी हो सकती है मगर अगर खुद मार्क्सवादियों के बीच हुई बहसों पर नज़र डालें तो पाएंगे की उनमें शुरू से आखिर तक एक अलग ही चिंता दिखाई देती है. मिसाल के तौर पर, १९६०-७० के आसपास विश्व-स्तर पर चली बहस में जो असली चिंता थी वह यही थी की दुनिया के अधिकांश हिस्सों में पूँजीवाद का विकास रुद्ध क्यों है? लातिन अमेरिका के बुद्धिजीवियों ने जिसे ‘डिपेंडेंट डेवेलोपमेंट’ या आश्रित विकास कहा और जिसे आंद्रे गुंदर फ्रांक ने यह कह कर सूत्रबद्ध किया कि ‘अंडरडेवेलोपमेंट’ महज़ विकास का अभाव नहीं है बल्कि पश्चिमी देशों में हो रहे विकास का सीधा नतीजा है, वह इसी बात की तरफ इशारा करता है. उस पूरी बहस में मुद्दा यही था कि जैसा उम्मीद की जाती थी उसके विपरीत दुनिया के अधिकांश हिस्सों में पूंजीवादी विकास हुआ ही नहीं. इसकी व्याख्या करने के लिए कई नए पद ईजाद हुए, मसलन, ‘रिटार्डेड डेवेलोपमेंट’, ‘अर्रेस्टेड डेवेलोपमेंट’, आदि. यह विचार भी रखा गया कि साम्राज्यवाद के आविर्भाव के साथ पूँजीवाद के चरित्र में कुछ ऐसे बदलाव आ गए हैं कि अब वह प्राक-पूंजीवादी संरचनाओं समझौता कर के ही चलता है. लिहाज़ा पुरानी आर्थिक संरचनाओं को वह खत्म नहीं कर पाता.

बहरहाल, १९९० का दशक आते-आते हम देखते हैं कि यह मान्यता धरी कि धरी रह गयी और नव-उदारवादी पूँजीवाद अब नए जोश के साथ कृषि समेत तमाम प्राक-पूंजीवादी संरचनाओं को बिलकुल पुराने अंदाज़ में उखाड़ फ़ेंक रहा है. दरअसल मसला पूँजीवाद के चरित्र में बदलाव का नहीं था. यह बात आज और ज्यादा साफ़ तौर पर समझी जा सकती है कि १९९० के बाद से जो नए तेवर हमें देखने को मिले उनके पीछे एक तरफ समाजवाद के पतन के बाद का बदला हुआ ताक़त का संतुलन था तो दूसरी तरफ नयी सूचना/ तकनीकी क्रांति थी. दोनों ने मिल कर उसे जसी नयी उम्र बख्श दी. मगर क़र्ज़ के बूते पर जी रही व्यवस्था के लिए ज्यादा दिन चलने वाली स्थिति नहीं थी. अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देशों कि मौजूदा हालत भी कुछ इस तरफ इशारा करती है मगर यहाँ हमारा सरोकार अलग है.

जो चीज़ आज एकदम साफ़ साफ़ दिखाई देने लगी है वह यह कि दुनिया के पैमाने पर पूँजीवाद की नाकामी के पीछे एक और ही कहानी है. यह कहानी है ‘उपभोक्ता’ और ‘पूंजीवादी इंसान’ बनाने में उसकी नाकामयाबी की कहानी. यहाँ इस बात की विस्तार से चर्चा की गुंजाईश नहीं है मगर कुल मिलाकर यह कहा जा सकता हैं कि पूँजीवाद कि सफलता इस बात पर मुनहसर है कि लोग अपने आप को मूलतः आर्थिक प्राणी के रूप में देखने लगें. ज़रूरी है कि वे हर वक्त अपने नफ़ा-नुकसान के हिसाब रखें और एक पूँजीवादी मानसिकता तैयार हो. पूंजीवाद एक ऐसा आत्म-केंद्रित इंसान गढ़ना चाहता है जो अपने नफे-नुकसान को सबसे पहले, तमाम इंसानी रिश्तों के ऊपर तरजीह दे. व्यक्तिगत बुर्जुआ संपत्ति इसकी बुनियाद है.

दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के ज़्यादातर जगहों में अधिकांश लोग अब भी उन मूल्यों को नकार कर ही जीते हैं, क्योंकि बुनियादी तौर पर जिंदगी अकेले नहीं जी जा सकती है और आपसदारी उसकी सबसे पहली शर्त है.

इस बात को एक मिसाल देकर बेहतर समझा जा सकता है. एक ज़माने में समझा जाता था कि तीसरी दुनिया के शहरों में फैला ‘अनौपचारिक क्षेत्र’, प्राक-पूंजीवादी जीवन शैलियों का ही अवशेष है जिसे देर सबेर औपचारिक पूंजीवादी क्षेत्र में समा जाना है. ऐसा इस लिए भी कि इस क्षेत्र में पैदावार न तो मुनाफा देता है और न ही उस में काम कर रहे मजदूरों को पर्याप्त वेतन.

हाल के सालों में हुए अध्ययनों से यह साफ़ ज़ाहिर होता है कि घटने के बजाय यह क्षेत्र लगातार बढ़ रहा है. एक तरफ इसका बढ़ना खुद पूँजी के उस संकट का नतीजा है जिसके फलस्वरूप उसे पुराने अंदाज़ के भीमकाय कारखानों कि जगह ‘आउटसोर्सिंग’ और ‘सब कोंट्राक्टिंग’ आदि का सहारा लेना पड़ता है. मगर दूसरी तरफ इसके इजाफे के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि यहाँ उत्पादन का तर्क अक्सर सिर्फ मुनाफाखोरी नहीं होता बल्कि ज़रूरतों कि पूर्ती के लिए इस क्षेत्र में पैदावार का आयोजन होता है. अंदाजा लगाया गया है कि भारत, मिस्र, इंडोनीशिया, पेरू आदि देशों में इस क्षेत्र में इतनी दौलत पैदा होती है जितनी इन देशों के शेयर बाजारों में उपलब्ध नहीं है. मगर जो बात २००८ के बाद कि आर्थिक मंदी के बाद खुल कर सामने आयी वह यह कि भारत जैसे देश आम तौर पर उसके असर से बच निकले. इसके एक बहुत बड़ी वजह यह थी कि ये स्थानीय ‘अर्थव्यवस्थाएं’ ग्लोबल अर्थव्यवस्था या तंत्र के तर्क से बहुत हद तक आजाद हैं. ये आज भी अपने अलग ही अंदाज़ में चलती हैं. इनकी एक और खास बात इस तजुरबे से सामने आती है: इन कारोबारों में उत्पादन फक़त मुनाफे के लिए नहीं होता और संकट के दूत में भी इन्हें मजदूरों को बरोजगार करने के ज़रूरत नहीं पेश आती. इनके बरअक्स जो औद्योगिक कारखाने ग्लोबल पूंजीवादी बाज़ार के साथ जुड़ गए हैं उनका हश्र काफी बुरा हुआ और वहाँ आर्थिंक मंदी के कारण बेरोज़गारी बेतहाशा बढ़ी.

इस तजुरबे से एक तो यह पता चलता है कि आज भी दुनिया के बहुत बड़े हिस्से ऐसे हैं जहाँ लोग पूंजीवादी बाजार के बहार जीते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि व्यक्तिगत कारोबार के आधार पर पैदावार अपने आप में पूँजीवाद नहीं होता. एक मायने में पिछले समय में हिंदुस्तान भर में पूँजी के लिए सरकारी ज़मीन हड़पने को लेकर जो ज़बरदस्त आन्दोलन चले हैं, वह भी यही दिखाते हैं कि पूँजी कि सत्ता अभी सब जगह कायम नहीं हुई है और उसके खिलाफ संघर्ष जारी हैं.

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