रविवार, 17 जनवरी 2010

सपा गढ़ पर हाथी का कब्ज़ा -1

बाराबंकी। किसी जामने में सपा का गढ़ माने जानी वाली स्वर्गीय राम सेवक यादव की कर्म भूमि बाराबंकी में अब सपा का पतन करीब करीब होता नजर आ रहा है और बहुजन समाज पार्टी में उस पर अपना अधिपत्य बना लिया है।
उत्तर प्रदेश के निकट स्थित इस जनपद में जब समाजवादी तहरीक परवान चढ़ी जब पूरे प्रदेश में कांग्रेस व देश में कांग्रेस का वर्चस्व था। कारण यह था कि यहाँ पिछड़े वर्ग के हिन्दू व मुस्लिम समुदाय की जनसँख्या अधिक थी। जमीदारी के जमाने में हाशिये पर पड़े रहे पिछड़ों ने पहले स्वतंत्रता व बाद में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम के लागू होने के पश्चात अपने स्वतन्त्र सामाजिक व राजनीतिक वजूद की तरफ कदम बढ़ाने शुरू किये और तहसील हैदरगढ़ से एक सादाहरण परिवार का नवजवान जो सदैव कुरता धोती धारण करता था और सादे जीवन में विश्वास करता था पिछड़े वर्ग की उम्मीदों का सहारा बन्ने लगा और दुसरे आम लोकसभा चुनाव में पिछड़ों का नेतृत्व करना प्रारम्भ किया और फिर लगातार तीन लोकसभा चुनावों में वह सफलता की सीढियां चढ़ता गया और डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा जनपद में परवान चढ़ती राही परिणाम स्वरूप अन्नंत राम जायसवाल, मास्टर असरफी लाल यादव, बेनी प्रसाद वर्मा, रामसागर रावत, छोटे लाल यादव जैसे नेट समाजवादी कोख से जन्म लेते रहे इसके अतिरिक्त जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय रफ़ी अहमद किदवई के परिवार के इकराम उर रहमान किदवई व पंडित राजनाथ शर्मा का भी समाजवादी विचारधारा को जिले में परवान चढाने में काफी योगदान रहा।
बेनी प्रसाद वर्मा जो जिले के एक कद्दावर नेट के तौर पर उभरे। उनकी पकड़ जहाँ एक और अपनी कुर्मी बिरादरी पर मजबूत होती गयी टू वहीँ पिछड़ी जाती के मुसलमानों में भी वह लोकप्रिय हो गए। उनको उस मुकाम तक पहुंचाने में जनता पार्टी में रहे इकराम उर रहमान किदवई का बहुमूल्य योगदान रहा जिन्होंने मोहसिना किदवई का राजनीतिक वर्चस्व तोड़कर बेनी को खड़ा किया।
बेनी प्रसाद वर्मा के साथ साथ फरीद महफूज़ किदवई, गयासुद्दीन किदवई, सर्वर अली खान, छोटे लाल यादव, मस्टर अशर्फी लाल यादव, हरदेव रावत, रामसागर रावत, राधे श्याम वर्मा, स्वर्गीय इश्तियाक खान व राम पाल वर्मा को मिलकर एक मजबूत टीम समाजवादियों की तैयार हो गयी और कांग्रेस का सफाया हो गया।
फिर बाबरी मस्जिद का ताला खुलने के बाद 30 अप्रैल 1986 में पीरबटावन ईदगाह में हुए गोली कांड जिसमें पी.ए.सी की फिरिंग में 15 लोग शहीद हो गए थे मुसलमानों ने कांग्रेस को सदैव के लिए छोड़ कर मुलायम की और अपने कदम बाधा दिए। इस तरह एम.वाई.के यानी मुस्लिम यादव व कुर्मी गठजोड़ के बल पर यह जनपद 90 के दशक में एक मजबूत किला बन गया। जिस समाये राजीव गाँधी की हत्या के पश्चात 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लहर ने पूरे देश को अपने आगोश में ले लिया या उस समय भी यहाँ समाजवादी नेता रामसागर रावत ने गैर कांग्रेसी झंडा जनता पार्टी से चुनाव लड़ कर गाड़ा था। सपा के इस गढ़ में सेंद मारी कर गेरुवा झंडा मात्र 13 माह के लिए गाड़ा परन्तु केंद्र में अटल बिहारी की सरकार गिर जाने के पश्चात हुए 1999 के चुनाव में पुन: सपा का अधिपत्य राम सागर रावत ने चुनाव जीत कर स्थापित कर दिया ।

मोहम्मद तारिक खान
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