रविवार, 24 जनवरी 2010

पुराने दोस्तों में पड़ती खटास

संघ परिवार आजकल अमेरिका से नाराज चल रहा है और देश के बिगड़ते हालात चाहे वह आर्थिक हों या आंतरिक सुरक्षा उसके लिए अमेरिका व उसके इशारे पर काम कर रही मनमोहन सरकार को दोषी बतलाया है।
बिलकुल ठीक बात है। इसमें कोई शक नहीं कि जब से भारत ने अमेरिका की दोस्ती का दामन थामा है उसके रास्तों में कांटे ही कांटे बिछ गए हैं। आज स्तिथि यह है कि देश का लघु उद्योग तबाह हो चुका है।
हथकरघा व अन्य कुटीर उद्योग बर्बाद हो चुके हैं अब कृषि उद्योग तबाही की ओर अग्रसर है गरीब आदमी की पहुँच से सादा भोजन दाल रोटी भी दूर होती जा रही है । अंबानी बंधू मित्तल ग्रुप , टाटा प्रेम जी ग्रुप , सहारा व अन्य बड़े उद्योगपति उन्नति कर रहे हैं। करोड़पतियों की सूची में इजाफा हो रहा है एक रात में दो करोड़ खर्च कर के फ़िल्मी तारिकाओं के ठुमके बड़े शहरों में देखे जा रहे हैं। एक करोड़ की गाड़ियाँ अब दिल्ली, मुंबई की सड़कों पर दौड़ रही हैं। 50 करोड़ लोगों के हाथों में मोबाइल हैं ।
परन्तु दूसरी ओर करोडो लोग रोज भूखे सोने को मजबूर हैं ठंडी रातों में और लू के दिनों में मौत का निवाला बनने को बेबस हैं। पूरे देश को सट्टे बाजी पर लगा दिया गया है। बैंको में निवेश को हतोत्साहित कर शेयर बाजार में पैसा लगाने के लिए सरकार उत्साहित कर रही है। यहाँ तक कि खाद्य सामग्री को, जो आवश्यक वास्तु अधिनियम के तहत जमाखोरी से अलग रखी गयी थी, वायदा कारोबार में डाल कर दलालों व बिचौलियों के हवाले कर दिया गया है।
परन्तु संघ प्रमुख जरा यह बताएं कि वर्ष 1991 में नरसिम्हाराव सरकार के समय आर्थिक मंत्री रहे मनमोहन सिंह के द्वारा प्रतिपादित उदारीकरण की आर्थिक नीति को क्या तीन बार की भाजपा सरकार जिसका नेतृत्व अटल बिहारी बाजपेई कर रहे थे क्या बदलने का प्रयास किया गया ? या अभी भी गुजरात में चल रही नरेंद्र मोदी की सरकार की आर्थिक नीतियाँ क्या उदारीकरण की नीति या पूंजीवादी नीतियों के विरुद्ध हैं।
बात यह नहीं है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका ने संघ परिवार व उसकी सियासी जमात भाजपा के ऊपर कांग्रेस को तरजीह देनी शुरू कर दी है। जब देश की सबसे पुरानी व शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी कांग्रेस उसके करीब आ गयी हो तो वह दुसरे दर्जे की टीम को क्यों घास डालने वाला अमेरिका को पार्टी विशेष या व्यक्ति विशेष से दिलचस्पी तो है नहीं । उसे तो अपने राजनीतिक व आर्थिक हित ही सर्वोपरि रखने हैं। अब सोनिया गाँधी व मनमोहन संघ की कांग्रेस पूरी ईमानदारी व वफादारी के साथ अमेरिकी हितों के लिए काम कर रही है और देश के अधिकांश प्रान्तों में उसका बहुमत है तो अमेरिका को क्या पड़ी कि वह उसके स्थान पर संघ की संर्कीण विचारधारा व प्राचीनतम संस्कृति में दिलचस्पी ले। इंदिरा गाँधी व राजीव गाँधी अमेरिका की राह का अंतिम काँटा थे वह उसने निकाल फेंके अब सोने की चिड़िया वाला देश व उस देश की सबसे बड़ी पार्टी उसकी मुट्ठी में है तो वह खाकी नेकर वालों को क्यों लिफ्ट दे यह तो वक्त-वक्त की बात है।

मोहम्मद तारिक खान
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