बुधवार, 27 जनवरी 2010

बोया पेड़ बबूल का..........

इस हफ्ते देश का ध्यान दो समाचारों ने अपनी ओर खींचा एक महाराष्ट्र में जबरिया मराठी भाषा को गैर मराठियों पर थोपना और दूसरा गुजरात हाई कोर्ट का एक याचिका के विरुद्ध निर्णय में यह कहना कि हिंदी को भले ही देश के बेशतर लोगो ने राष्ट्र भाषा मान लिया हो परन्तु देश में ऐसा कोई कानून या निजाम हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के पक्ष में नहीं है।
दोनों भले ही समाचारों से उत्तरी भारतीय व अन्य हिंदी बोलने वाले भारतीयों की बहुत दिलआजारी हुई। हिंदी मीडिया पर बहुत चीख पुकार हुई परन्तु क्या यह बात
कभी इन नाराज लोगो ने सोचीं कि जो कांटे उन्होंने नफरत व हिंसा के बोये थे आज वही कांटे उन्हें चुभ रहे हैं।
देश के स्वतन्त्र होने के पश्चात जब काफी रक्त पात धार्मिक द्वेष के चलते हो गया परिणामत: देश के विभाजन पर वह जा कर थमा तो देश की सुख शांति व विकास की राह पर उसे आगे चलने के लिए सबने यह स्वीकार कि देश धर्म निरपेक्ष पंथ निरपेक्ष की राह पर चलेगा। किसी भाषा, किसी धर्म या व्यक्ति के साथ भेद भाव नहीं किया जायेगा। सबके सामान अधिकार व सबको उन्नति के बराबर के अवसर दिए जायेंगे।
अंतत: 26 जनवरी 1950 को इन्ही भावों को समाहित कर के डॉक्टर भीमराव आंबेडकर द्वारा संविधान की रचना कर दी गयी और भारत वर्ष अनेकता में एकता के उद्देश्य के साथ लोकतंत्र की डगर पर चल पड़ा।
परन्तु थोड़े ही समय बाद जब अनुसरण की परीक्षा हुई तो उसमें भारत असफल नजर आने लगा। विभाजन के समय के घाव हमारी सोंच पर हावी होते गए या देश के दुश्मंनो ने कुरेद-कुरेद कर सदैव उन्हें हरा रखा। नतीजा यह रहा कि जिस प्रकार का दंश विभाजन से पूर्व दलित व कबीलाई क्षेत्र के आदिवासी अपने हमवतनों के व्यवहार से झेल रहे थे, उसी हालत से दो चार आजाद भारत के मुस्लिम समुदाय के लोग होने लगे। मुसलमानों के लिए सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद कर दिए गए चपरासी तक की जगह उन्हें नहीं दी गयी जो मुसलमान पहले आई.सी.एस, आई.पी.एस, फ़ौज व पुलिस के ऊंचे पदों पर तैनात थे वह एक दम से निखट्टू करार दे दिए गए। शिक्षा के दरवाजे भी उनके ऊपर बंद कर दिए गए। जिस कौम ने मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसा बुद्धिजीवी और सर सैय्यद जैसा शिक्षा शास्त्री दिया हो जिस कौम की कोख से शहीदे आजम अशफाक उल्ला, मोलवी बाकर और महमूद उल हसन व खान अब्दुल गफ्फार जैसे सुरमा निकले हैं और जिस कौम ने अल्लामा इकबाल जैसा साहित्यकार पैदा किया हो वह कौम अचानक इतनी अपंग हो गयी कि उसके गर्भ से केवल बारबर, इक्का तांगा हाकने वाले, मोची, प्लंबर, राजमिस्त्री, साइकिल व मोटरकार मिस्त्री, कबाड़ी व खोंचा वाले निकलने लगे या फिर जेब कतरे, गुंडे मवाली, स्मगलर या भाई लोग निकलने लगे। पढाई में इक्का दुक्का को छोड़ मस्जिद में अजान देने वाले नमाज पढने वाले या मदरसों के मुल्ला निकलने लगे।
यही हाल उर्दू भाषा के साथ किया गया उसके ऊपर मुसलमानों की जुबान का लेबेल चस्पा कर पाकिस्तानी भाषा समझ कर उससे घराना करने की दीक्षा देश वासियों को दी गयी। उर्दू भाषा का प्रयोग या तो फ़िल्मी गानों में या मुशायरों के मंच पर ही सिमट कर रह गया। प्राईमरी स्कूलों में उर्दू को नजरअंदाज कर उस संस्कृत भाषा को बढ़ावा दिया गया जो केवल दक्षिण भारत के थोड़े से हिस्से में बोली समझी जाती है। सरकारी काम काज जो आजादी से पूर्व उर्दू में या अंग्रेजी में होता था उसमें अंग्रेजी तो अपने स्थान पर कायम रही उर्दू के स्थान पर हिंदी को जगह दे दी गयी। आज तो उत्तर प्रदेश जहाँ उसे दूसरी सरकारी भाषा का दर्जा प्राप्त है के लगभग 80 हजार प्राईमरी स्कूलों में उर्दू भाषा को एक दम हाशिये पर डाल दिया गया है उर्दू शिक्षक तो हैं परन्तु वह दुसरे विषय पढ़ा रहे हैं यहाँ तक कि उर्दू के अंक भी विद्यार्थी के परीक्षाफल में अब नहीं जोड़े जाते एच्छिक विषय लिख कर नंबर परीक्षा फल के एक कोने में लिख दिए जाते हैं । यही हाल सरकारी कार्यालयों व अदालतों का है जहाँ उर्दू अनुवादक तो तैनात है परन्तु उनसे काम उर्दू छोड़ कर हिंदी व अंग्रेजी भाषा का लिया जा रहा है।
अब अगर महाराष्ट्र, असाम, दक्षिण भारत और बंगाल या उत्तर पूर्व में हिंदी या उत्तरी भारतीयों के साथ घृणा या पक्षपात पूर्ण रवैये का प्रदर्शन किया जा रहा है तो हमें अखर रहा है। जब देश में घराना , क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता व अलगावाद की बयार जानबूझ कर चलायी जाएगी तो उससे बनने वाली आंधी में उनका भी घर उजड़ जाएगा जो देश भक्ति के नाम पर इस तरह देश दुश्मनी की राणनीति बनाते हैं। इससे हमें कम से कम अब सबक लेना चाहिए।

मोहम्मद तारिक खान
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