सोमवार, 18 जनवरी 2010

सपा के गढ़ पर हाथी का कब्ज़ा - अंतिम भाग

परन्तु समाजवादियों के मजबूत किले में दरार पड़ने की शुरुवात होती है बेनी के कुर्मी प्रेम की और अधिक झुकाव और सपा में मौजूद मुस्लिम लीडरों के तिरस्कार से। देखते ही देखते उनके रिश्ते पहले खराब हुए फरीद महफूज़ किदवई से फिर सरवर अली खान भी उनका साथ छोड़ कर चले गए। इसी दरमियान सपा पर अमर सिंह की पकड़ बेनी से अधिक होने लगी और बेनी के गढ़ में अमर सिंह ने एक छात्र नेता अरविन्द सिंह गोप को तैयार करना शुरू कर दिया । दूसरी ओर चार बार के सांसद राम सागर रावत से उनके रिश्तों में भी दरार डालनी शुरू की कांग्रेस छोड़ कर सपा में आये कमला रावत ने जो सपा से सिधौर विधानसभा से चुनाव जीतने के बाद लम्बे राजनीतिक बनवास से मुक्त हुए।
उधर वर्ष 2002 में छोटे लाल का टिकट काट कर भाजपा से उनका आशीर्वाद प्राप्त कर नवाबगंज विधानसभा चुनाव लड़ रहे संग्राम सिंह वर्मा की जीत का मार्ग अपने कुर्मी प्रेम के कारण प्रशस्त करने वाले बेनी प्रसाद वर्मा को करार झटका तब लगा जब हाईकमान ने उनके द्वारा दिए गए टिकट को काट कर छोटेलाल के बागी तेवरों के मद्देनजर हथियार डाल कर छोटेलाल यादव को अपना प्रत्याशी बनाया । पूरे चुनाव में छोटेलाल का खुल कर विरोध बेनी प्रसाद वर्मा की ओर से किया गया फिर भी कोटे के मुकाबले में 27 वोटों से छोटेलाल ने जीत दर्ज कर पहली बार बेनी प्रसाद को पटखनी दी। उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में परिणाम के विलम्ब से आने पर पूरा यादव समुदाय सडकों पर उतरा आया और यादव कुर्मियों के बीच पुरानी रंजिश सड़कों पर उतर आई और गैंगवार की नौबत आ गयी। बेनी प्रसाद वर्मा से कमला रावत को सिद्धौर विधानसभा से विजयी बनवाने से खिन्न रामसागर छोटेलाल के पाले में खड़े नजर आये।
इसका बदला बेनी प्रसाद ने 2004 लोकसभा चुनाव में रामसागर को हरा कर लिया जब पार्टी छोड़ कर बसपा से चुनाव लड़ रहे कमला रावत की ओर रातों रात कुर्मी वोट स्विंग करा कर उन्होंने बसपा के नीले झंडे की पहली बार जिले में स्थापित किया। यदि यूं कहा जाए टू बेजा न होगा कि बेनी प्रसाद ने ही जिले में सपा को सर्वाधिक कमजोर अपने स्वार्थ व बिरादरी प्रेम के चलते किया। पहले छोटेलाल, उससे पहले इश्तियाक खान फिर फरीद महफूज़, फिर सर्वर अली कहन और उसके बाद रामसागर रावत व गयासुद्दीन किदवई यह सभी बेनी प्रसाद की कूटनीतिक चालों के सताए हुए हैं।
फरीद महफूज़ किदवई व गयासुद्दीन किदवई ने तो बसपा का दामन थम लिया परन्तु यहाँ भी फरीद का पीछा उन्होंने नहीं छोड़ा और पार्टी से उनका टिकट कटवा कर उनके रिश्ते मायावती से ऐसे ख़राब किये कि उन्हें पार्टी से बागी होकर चुनाव लड़ना पड़ा बाद में मायावती पार्टी ने पार्टी हित में फरीद महफूज़ को फिर पार्टी में शामिल कर के पार्टी की ओर मुस्लिम मतों को लुभाना शुरू किया जिसका नतीजा यह हुआ कि सपा से मुस्लिम मतों की दूरी बढ़ना और बसपा की ओर उनका झुकाव बढ़ना प्रारम्भ हुआ और दलित मुस्लिम वाद में ब्राहमण समीकरण के चलते 2006 के विधानसभा चुनाव में जनपद की आठ सीटों में से पांच पर नीला झंडा फहरा गया और सपा सिमट कर तीन सीटों पर आ गयी । उसके बाद जिला पंचायत, जिला कोआपरेटिव बैंक, नगर परिषद् नवाबगंज और अब विधान परिषद् सीट सभी पर बसपा का वर्चस्व कम हो गया और सपा का मुकम्मल पतन।

मोहम्मद तारिक खान

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