शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

विधि व्यवस्था में अधिवक्ता की भूमिका खत्म कर दो

भारतीय विधि व्यवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को न्याय पाने का अधिकार है और अपने मन पसंद अधिवक्ता से अपने वाद में अपना पक्ष प्रस्तुत करने का भी अधिकार। आए दिन अधिवक्ताओं के ऊपर हमले नियोजित तरीके से हो रहे हैं और उनसे कहा जा रहा है अमुक मुकदमा करो और अमुक मुकदमा न करो। देश भर में आतंकवाद से सम्बंधित मुकदमों का विचारण हो रहा है भारतीय विधि व्यवस्था में उन वादों का विचारण तभी संभव है जब उनकी तरफ से कोई अधिवक्ता उनका पक्ष
प्रस्तुत करे अन्यथा अधिवक्ता न मिलने की दशा में वाद का विचारण संभव नहीं है तब एक ही रास्ता होता है कि न्यायलय उस अभियुक्त की इच्छा अनुरूप अधिवक्ता नियुक्त करे और उसका भी खर्चा न्याय विभाग उठता है। विधि के सिधांत के अनुसार फौजदारी वादों में अधिवक्ता की भूमिका न्यायलय की मदद करने के लिए अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत गवाहों से जिरह (cross examination ) करना होता है जिरह में न्यायलय के सामने गवाह से तमाम सारे वाद से सम्बंधित सवाल अधिवक्ता पूंछता है जिनके उत्तर के आधार पर यह साबित होता है कि गवाह झूंठ बोल रहा है या सच। फौजदारी कानून में अभियोजन पक्ष के गवाह जो मौके पर नहीं होते हैं और वाद में उनको फर्जी तरीके से गवाह बनाया जाता है जो घटना के समय नहीं होते हैं और झूंठ बोल रहे होते हैं जिस कारण वाद में अभियुक्त सजा पाने से बच जाता है मुख्य बात यह है कि अब पुलिस नियोजित तरीके से लोगों की भावनाओ को भड़का कर बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं के ऊपर हमले करा रही है । विशेष मामलों में बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं की सुरक्षा की नैतिक व विधिक जिम्मेदारी राज्य की है जिसमें राज्य इन जिम्मेदारियों में असफल हो रहे हैं जिसका नतीजा संदिग्ध आतंकी फहीम अंसारी के अधिवक्ता शाहिद आजमी की मुंबई में उनके ऑफिस में गोली मार के हत्या है इसके पूर्व मुंबई लखनऊ फैजाबाद समेत काफी जगहों पर अधिवक्ताओं के ऊपर जान लेवा हमले हो चुके हैं राज्य द्वारा आज की तिथि में उनकी सुरक्षा का कोई उपाय नहीं किया गया है यदि राज्य अधिवक्ताओं को सुरक्षा नहीं दे सकता है तो अच्छा होगा की विधि व्यवस्था मेंअधिवक्ताओं की भूमिका ही समाप्त कर दे ।

सुमन
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