गुरुवार, 10 जून 2010

पोस्टमार्टम गृह मे लाशो के ऊपर अवैध तिजारत का गोरख धन्धा जारी

बाराबंकी। अस्वाभाविक मृत्यु होने पर पुलिस विभाग द्वारा शव का पोस्टमार्टम विधिक रुप से स्वास्थ्य विभाग की सहायता से शल्य विच्छेदन गृह मे कराया जाता है, ताकि अस्वाभाविक मृत्यु होने का कारण जाना जा सके, परन्तु मरने वाले के परिवार का दोहन पुलिस विभाग से प्रारम्भ होकर पोस्टमार्टम गृह तक जारी रहता है। वह कहते है न कि किसी का घर जले और कोई तापे

पोस्टमार्टम के लिए सर्वप्रथम पुलिस विभाग शव का पंचनामा करता है, और यही से पुलिस मोहकमा सौदे बाजी प्रारम्भ कर देता है। शव में मृत्यु पूर्व चोटे, जिन्हे एन्टी मार्टम इंजरीज़ कहते है, को नोट करते समय पुलिस अपने हाथ दिखाती है। यदि शव की शिनाख्त नही हो पाई तो पुलिस तुरन्त उसे अर्धविक्षिप्त करार देते हुए उसकी अस्वाभाविक मौत को आत्महत्या बताने मे पंचो की राय अथवा पंचनामे का सहारा लेती है। अब तो पुलिस मृतक की अस्वाभाविक मृत्यु का पोस्टमार्टम कराने से पूर्व पंचनामा भरते समय कभी-कभी अपने शब्द पंचो की राय मे डालकर हृदय रोग, मानसिक रोग व अन्य अनेको बीमारियंा बताने लगी है और यह सब काम वह दो कारणों से करती है, या तो धनोपार्जन के लिए या अपनी जान छुड़ाने के लिए।

यह तो थी पुलिस की कारस्तानी की दास्तान जो वह लाशो के साथ करती है, अब आइये जरा पोस्टमार्टम गृह का जायजा लिया जाये। शव लेकर जब पुलिस परिजनो के साथ पोस्टमार्टम गृह पर पहुंचती है तो सर्वप्रथम वहां उसका सम्पर्क स्वीपर से होता है, जो पुलिस अस्पताल मे तैनात रहता है। स्वीपर आहत परिजनों पर अपनी डिक्टेटर शिप चलाता है और उससे पोस्टमार्टम मे प्रयुक्त होने वाले डिस्पोजबल दास्ताने, -सजय़ाई मीटर पन्नी व 5 मीटर मारकीन का कपड़ा मगांने का आदेश देता है। अपने प्रिय को खो देने का दर्द अपने दिल मे लिए परेशान, नि-सजय़ाल बेचारा परिजन अपने को स्वीपर के हुक्म के हवाले कर देता है। वह पूछता है भैय्या यह सामान कहां मिली, स्वीपर पोस्टमार्टम गृह के सामने स्थित सुलभ शौचालय के एक कमरे के बाहर बैठे एक व्यक्ति की ओर इशारा करता है कि वहां चले जाओ। परिजन बेचारा करता क्या न मरता मजबूर होकर वह उस व्यक्ति के पास पहुंचता है और वह व्यक्ति उस परिजन के हाथ मे पहले से बंधा हुआ पाॅली बैग थमा देता है, दाम पूछने पर वह -सजय़ाई सौ से पांच सौ रु0 की कीमत वसूलता है।

जबकि बाजार मे 5 मीटर मारकीन की कीमत मात्र 70 से 80 रु0 -सजय़ाई मीटर पन्नी की कीमत 30 रु0 और डिस्पोजबल दास्तानो की कीमत 20 रु0 बताई जाती है। इस प्रकार दोगुने से चार गुना पैसा अवैध कमाई के रुप मे परेशान हाल लोगो से नोचा जाता है। इस खेल मे स्वीपर बराबर का शरीक होता है। यदि लाश कई दिन पुरानी होकर सडी हालत मे होकर आती हैं तो शराब के पाउच के नाम पर अलग से स्वीपर छन्नू ले लेता है, जबकि छन्नू को कभी शराब पीते नही देखा गया है। कहानी यही खत्म नही होती डिस्पोजबल दास्ताने जो हर लाश के परिजन से स्वीपर द्वारा मंगाये जाते है उनमे से केवल एक दास्ताने से पूरा काम कर लेता है बाकि पुनः सुलभ शौचालय मे बैठे कफन सामग्री बेचरहे गुप्ता जी को वापस देकर अपने पैसे सीधे कर लेता है। ऐसा नही कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा डिस्पोजबल दास्ताने मोहैय्या नही कराए जाते। स्वास्थ्य विभाग द्वारा दिए जाने वाले दास्ताने भी इसी भ्रष्टाचार के काॅकस के हवाले हो जाते है।

पोस्टमार्टम गृह मे यह धन्धा कई वर्षाे से बेधड़क जारी है और पुलिस की आंखो के सामने लाशो के ऊपर तिजारत करने वाले -िसजय़टाई के साथ आम जन को लूट रहे है, परन्तु कोई बोलने वाला नही, क्योंकि कोयले की दलाली मे खुद भी सियाह होते है।

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