मंगलवार, 8 जून 2010

प्राधिकारी परिवर्तन के बावजूद धड़ल्ले से हो रही मिलावटी खाद्य पदार्थो की बिक्री,

बाराबंकी(मो0तारिक खा) खाद्य पदार्थो में मिलावट ,नकली व अधोमानक दवाओ के विकय पर अंकुश लगााने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार द्वारा उठाये गयंे कदम निष्प्रभावी नजर आ रहे है।हांॅ इतना अवश्य हुआ कि अवैध कारोबारियों से प्राप्त होने वाली रकम जो पहले जनपद के स्वास्थ्य विभाग के मुखिया द्वारा घसीटी जाती थी,उससे ब-सजय़कर व्यापारियों का अब शोषण जिला प्रशासन के द्वारा किया जा रहा है।

उच्च न्यायालय इलाहाबाद में दायर एक जनहित याचिका ब्रहमा जी बनाम उ0प्र0सरकार में अदालत की फटकार सुनने के पश्चात प्रदेश सरकार ने खाद्य पदार्थों के अपमिश्रण एवं नकली दवाओं के कारोबार पर रोक लगाने के लिए खाद्य एवं औषधि प्राधिकरण का गठन किया और प्रदेश की हर जनपद में प्रशासन एक टास्क फोर्स बनाने की प्रक्रिया का प्रारम्भ किया।जनपद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी जो कि स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी (एल0एच0ए0)का चार्ज भी रखते थे यह चार्ज दो डिप्टी कलेक्टरो को दे दिया गया।खाद्य अपमिश्रण अधिनियम 1955 की निगरानी हेतु डिप्टी कलेक्टर विजय शंकर चैधरी की तैनाती जिलाधिकारी ने की है। इसी प्रकार औषधि विभाग की देखरेख हेतु डिप्टी कलेक्टर छोटे लाल मिश्रा की तैनाती की गयी है।

अपेक्षा यह थी कि पावर के स्थानान्तरण का लाभ जनता को मिलेगा और मिलावटी खाद्य पदार्थ जो धड़ल्ले से खाद्य निरीक्षको की साॅठ गाॅठ से बिकते रहे है,उन पर अंकुश लगेगा।इसी प्रकार नकली दवाओं के कारोबार की भी रोकथाम होगी,परन्तु अभी तक जो स्थिति उभर कर सामने आयी है वह यह है कि वैसे ही मिलावटी खाद्य पदार्थ ख्ुाले कटे फल जनपद में बिक रहे है और अधोमानक दवाओ का कारोबार अवैध रूप से फलफूल रहा है। साथ ही दोनो ही विभागों के निरीक्षको में भी और निरंकुशता आ गयी है क्योकि पहले उनके पास मजिस्ट्रेटी पावर नही थी, अब यह पावर प्राप्त हेा जाने से लेनदेन का रेट ब-सजय़ गया है।सूत्र बताते है कि खाद्य लाइसेन्स बनने व नवीनीकरण के लिए जहाॅ पहले दुकानदार से तीन सौ रूपये लिए जाते थे वह ब-सजय़कर अब पाॅच सौ तक पहुच गये है। जब कि उ0प्र0 खाद्य अपमिश्रण निवारण नियामावली 1976 के अंतर्गत जारी होने वाले की फीस दो रूपये फेरी लगाकर खाद्य पदार्थ बेचने वाले के लिए, चार रूपये फुटकर दुकानदार के लिए और आठ रूपये खाद्य पदार्थो के निर्माता व थोक व्यापारी के लिए नियत है।

खाद्य निरीक्षको द्वारा यह अवैध कमायी का धन्धा वर्षो से चला आ रहा है और दिन प्रतिदिन इसमें इजाफा ही हो रहा है।कारण यह कि अधिकांशतः दुकानदार नही चाहते कि नियमावली के अनुसार वह कारोबार करे, क्योकि मिलावटी खाद्य पदार्थ प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कम दामो पर बिक जाते है और जो दुकानदार शुद्ध वस्तुए बेचना चाहता है वह प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाता है, यदि खाद्य निरीक्षक इमानदारी से अपनी ड्यूटी करे और अपमिश्रित खाद्य पदार्थ के विक्रय पर रोक लग जाये तो सभी दुकानदार कमोवेश एक ही दामो पर विक्री करेंगें और सभी को उचित मुनाफा भी मिलेगा। साथ ही आमजन मानस का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहेगा।

दूसरा बड़ा कारण जो मिलावटी खाद्य पदार्थो की बिक्री का हंै वह यह कि अधिकांश दुकानदार अशिक्षित है और अशिक्षत होने के कारण नौकरी न मिलने पर परचून अथवा बिसातखाने की दुकान चलाते है।उन्हे इस बात की मालूूमात ही नही कि खाद्य पदार्थो के लाइसेन्स की नियमावली में क्या शर्ते निर्धारित है।खाद्य निरीक्षको को भी इस बात में दिलचस्पी कम है कि दुकानदार लाइसेन्स की शर्तों का पालन करे, उनकी सारी दिलचस्पी दुकानदारों से अवैध वसूली में अधिक रहती है।शासन का रूख भी इस मामले में साफ नही हंै। यदि शासन अपमिश्रित खाद्य पदार्थो की खरीद फरोख्त में जरा भी संजीदा होता तो वह प्रचार के माध्यम से आम जन को इतना शिक्षित कर देता कि उपभोक्ता अपने अधिकारो स्वयं सचेत हो जाता।

जहाॅ तक लाइसेन्स की शर्तो का प्रश्न है तो उसमें सबसे पहली शर्त यह है कि लाइसेन्स विक्रेता अपने प्रतिष्ठान को स्वच्छता सम्बन्धी दोषो से मुक्त रखेगा। दूसरी शर्त यह है कि कोई भी लाइसेन्सधारी किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपने प्रतिष्ठान मंे सेवायोजित नही करेगा जो संक्रमिक सांसर्गिक या घृणित रोग से पीड़ित हो। तीसरी शर्त खाद्य पदार्थो के निर्माता या थोक व्यवसायी के लिए है कि अपने द्वारा बेची गयी वस्तुओ का परिणाम अथवा अपने द्वारा उत्पादित या कारोबार के लिए एक स्थान से भेजी परिणाम का गन्तव्य सहित तमाम इन्दिराज एक रजिस्टर (4) में सुरक्षित रख्ेागा और लाइसेन्सधारी या उसके द्वारा तदर्थ सम्यक रूप से प्राधिकृत कोई अधिकारी जिससे एंेसी अपेक्षा की जाय इस रजिस्टर का निरीक्षण कराने में किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति नही करेगा।चैथी शर्त दुकानदार को इस बात का पाबन्द करती है कि वह अपनी दुकान में बेची जाने वाली प्रकार का नोटिस बोर्ड ऐसे स्थान पर प्रमुख रूप से दर्शायेगा कि ग्राहको स्पष्ट रूप से दिखायी दे। नियमावली की पाचवीं शर्त फेरी वालो को इस बात के लिए पाबन्द करती है कि वह धातु का बना बिल्ला लगायेगा जिनमें स्पष्ट रूप से लाइसेन्स सं0 तथा पदार्थ का नाम ,उसका प्रकार जिसके लिए लाइसेन्स जारी हुआ हो, लिखा हों।छठी शर्त लाइसेन्सधारी को इस बात के लिए पाबन्द करती कि वह केवल शुद्ध पदार्थ बेचेगा जिसमें दूसरे पदार्थ का अपमिश्रण नही होगा। किन्तु प्रतिबन्ध यह है कि लाइसेन्सधारी बेच सकता है यदि प्रिवेन्शन आफ फूड एडल्ट्रेशन एक्ट 1955 ,द्वारा बेचा जाना नियमावली के अनुसार उन पर लेबिल लगे हो। सभी लाइसेन्सधारियो के लाइसेन्स की अवधि एक वर्ष की रखी गयी है और आर्थिक कलैण्डर वर्ष 31 मार्च को समाप्त होती है। लाइसेन्सधारी के लिए आवश्यक नियम यह बनाया गया है कि वह लाइसेन्स की अवधि समाप्त होने से तीन दिन पूर्व आवेदन के लिए सक्षम अधिकारी को देगा।आठवीं शर्त दुकानदार को इस बात को पाबन्द करती है कि वह अपनी दुकान में ग्राहको के सूचनार्थ हेतु निर्मित खाद्य वस्तुओ में तेल ,घी और चर्बी आदि का उल्लेख नोटिस बोर्ड द्वारा करेगा। घी से तैयार की जाने वाली मिठाईया या स्वादिष्ट वस्तुओ का कारोबार करने वाले दुकारदार या होअल मालिको को लाइसेन्स की यह धारा निर्देशित करती है कि वह हाईड्रोजिनेटेड चर्बी या खाद्य तेल का अपमिश्रण अपने प्रतिष्ठान में नही करेगा। लाइसेन्स नियमावली की नौवीं शर्त के अनुसार तले या पकाये गये खाद्य पदार्थो को -सजय़कने या ग्राहको को परोसने के लिए लाइसेन्सधारी द्वारा कोई भी छपा कागज अथवा रद्दी कागज या समाचार पत्र का प्रयोग नही करेगा। लाइसेन्स नियमावली में अंतिम शर्त

प्रिवेन्शन आफ फूड एडल्ट्रेशन एक्ट 1955 के नियम 50 के उपखण्ड 1 के अंतर्गत आने वाले खाद्य पदार्थ जो मानव उपभोग के लिए अभिप्रेत न हो उसी भू-गृहादि न तो बेचे जायंेगे न ही संग्रहीत किए जायेंगे और न बेचे जायेंगे जिसमें लाइसेन्स के अधीन ऐसे भोज्य संग्रहित किये जाते हो या बेचे जाते हो।



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