शनिवार, 27 नवंबर 2010

समाजवादियों की कब्र खोदते दो पुराने समाजवादी

बाराबंकी(मो0तारिक खान)। 26/11 के दिन मुम्बई मंे हुए आतंकी हमले की दूसरी बरसी से दो दिन पूर्व समाजवादियों के गढ में ठाकुर अमर सिंह ने हमला बोलकर यहाॅ के राजनीतिक समीकरणो में खलबली मचा दी है।
 किसी जमाने मे समाज वादी पार्टी की आॅख का तारा रहे अमर सिंह आजकल रान ए दरगाह चल रहे है। उनकी स्थिति इस समय उसी प्रकार है जैसे काफी उड़ान भरने के पश्चात तेज हवाओं के बेरहम झोको से कोई पतंग अपनी डोर से टूट गयी हो। अब इस पतंग को कौन डोर पकड़कर सहारा देता है इसी के इन्तजार में फिलहाल यह पतंग हिचकोले खा रही है।  पहले यह अफवाह उड़ी कि अमर सिंह अपने पुराने घर कांग्रेस में जाने वाले है और अमर सिह के सोनिया गांधी व उनके युवराज राहुल गांधी के लिए नरम गोशे वाले बयानात ने इन अफवाहो को और पर लगा दिए परन्तु सोनिया गांधी को शायद अमर प्रेम रास नही आया सो उधर से ठाकुर साहब को कोई लिफट नही मिली।
 फिर अमर सिंह के बारे मे यह उड़ा कि वह बसपा सुप्रीमो मायावती को लुभाने में लगे है और एक मुॅह में हजार बाते माया को सुनाने वाले अमर सिंह फिल्मी गानो के मुखड़े अब माया की शान में गाने लगे है। थोड़े दिन के बाद यह भी ताजिए ठण्डे हो गए और माया का नया मनैजर बनने की अमर सिंह के अरमान दिल के दिल में ही रह गए। बताते है कि माया के प्रभाव शाली मनैजरो ने उनका पत्ता साफ कर दिया।
 भाजपा में अमर सिंह की दाल गलने का कोई प्रश्न ही नही उठता क्योंकि मुलायम सिंह की उल्फत के दौर में भाजपा को बुरा भला कहने की उन्होने कोई कसर उठा नही रखी थी। यह बात और है कि उनकी कार्य  प्रणाली भाजपा को सूट करती है। क्योंकि मुलायम सिंह के उ0प्र0 में मजबूती से जमे  कदमो को उखाड़ने तथा डा0रा0म0लोहिया व जय प्रकाश नारायण के समाज वाद का कबाड़ा करने मे अमर सिंह ने भाजपा की ही मदद की । यह अमर सिंह ही थे जिन्होेने बेनी प्रसाद वर्मा, ज्ञानेश्वर मिश्रा, मोहन सिंह, शफीकुर्रहमान बर्क, सलीम शेरवानी, शाहिद अली सिददीकी, व आजम खाॅ जैसे उन दिग्गजो को किनारे लगा दिया जिन्होने पार्टी को स्थापित करने मे अपना खून पसीना लगाया था। अमर सिंह ने मुलायम सिंह के उस समाजवाद पर चटक मटक कारपोरेट समाज वाद की पर्त चढाकर आम आदमी से उसे दूर कर दिया था। जिसके दिल में नेता जी के लिए बहुत सम्मान था। क्यांेकि प्रदेश से कांगे्रस सरकार के रुखसत होने के बाद और राम मन्दिर आंदोलन के तेज होने के पश्चात जब प्रदेश की कानून व्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी तो पहले समाजवादियों ने अकेले और बाद में काशी राम के साथ मिलकर सत्ता सम्भालते हुए समाजवाद की अलख प्रदेश में जलायी थी और आम आदमी के मन में यह विश्वास पैदा करने का प्रयास किया गया था कि अब कोई चमन न उजड़े अब प्रदेश में समाज वाद का राज है।
 परन्तु साम्राज्य वाद की पृष्ठि भूमि से उपजा पौधा जिसके अखुए कांगे्रस में फूटे थे जवान होकर वह मुलायम सिंह के पास अपनी चर्ब जुबानी व धन सम्पदा के बूते ऐसा छाया कि समाजवाद के पुराने बरगदो को आंधी आ गयी और अमर प्रेम के चक्कर मे मुलायम सिंह ऐसे दिवाने हुए कि अपने सारे समाजवादी आदर्श व अपने लंगोट की मजबूती तक को बरकार न रख सके। फिल्मी तारिकाओें व फिल्मी कलाकारो के साथ समाजवादियों की शामें रंगीन होने लगी और विकास परिषद के नाम पर उद्योग पतियों के द्वारा आम जनता के शोषण की चक्कियाॅ जगह जगह पूरे प्रदेश मे स्थापित होने लगी। धरती पुत्र व किसान का बेटा सब कुछ भूल कर अमर प्रेम के नशे मे चूर किसानो की हरी भरी खेती औने पौने में खरीद कर उद्योग पतियों के आगे सौगात स्वरुप डालने में जरा भी नही हिचकिचाया। इन सबका नतीजा वैसा ही हुआ जैसा कि केन्द्र मे अटल बिहारी बाजपेयी की राजग सरकार का हुआ था जब फील गुड के विश्वास के सहारे चुनाव में उतरी भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार औधें मुह गिर पड़ी। मुलायम सिंह की सरकार का भी यही हश्र 2007 के चुनाव में हुआ। आवाज का बादशाह अमिताभ बच्चन टी0वी0से लेकर समाचार पत्रों के लाखो रुपये के विज्ञापनों के द्वारा यू0पी0 में है दम के नारे लगाता रहा परन्तु आम जन मानस ने अपना दम दिखाकर समाजवादियों को अपनी डगर से हटने का सबक सिखा दिया।
  बड़े बेआबरु होने के बाद समाजवादियो के उपर से अमर प्रेम का नशा उतरा और उन्होने अमर सिंह जया बच्चन व जया प्रदा इत्यादि को अपनी चैखट से खदेड़ दिया। अमर सिंह को इतनी जल्दी अपनी इस दुर्गत का अंदाज न था परन्तु वह यह भूल गए थे कि राजनीति के अखाड़े में  आने से पूर्व मुलायम सिह अपने क्षेत्र के माने जाने पहलवान थे। बेचारे अमर सिंह सूर्यवंशी हो या चन्द्रवंशी एक यदुवंशी के धोबी पाटे को झेल न पाए और अखाड़े से बाहर फेंक दिए गए।
 बौखलाए अमर सिंह को इस समय डूबते को तिनके का सहारा चाहिए। सो एक ओर तो उन्हे पूर्वांचल प्रदेश का दर्द का सता रहा है  और दूसरी तरफ उन्हे मुसलमानो का दर्द भी कुछ कम तकलीफ नही दे रहा है। तभी तो वह पीस पार्टी की तरफ कभी पेंगे बढाते है तो कभी उलेमा कान्फ्रेन्स में उन्हे खूबियाॅ नजर आती है। कभी वह अजीत सिंह की तरफ दौड़ते है तो वहीं अब उन्हे बेनी बाबू भी अच्छे लगने लगे है।
 24 नवम्बर को जनपद मुख्यालय स्थित राजकीय इण्टर कालेज के मैदान में  आयोजित पिछड़ा वर्ग स्वाभिमान सम्मेलन की रैली मे उमड़ी हजारो की भीड़ को देखकर गदगद हुए ठाकुर अमर सिंह ने रैली के संयोजक जंग बहादुर वर्मा को अपने द्वारा छेड़ी गयी जंग का जंगी साथी बताते हुए पिछड़ो व समाज के निम्न वर्ग के लोगो व अल्पसंख्यक भाईयो का उसी प्रकार अपने को हितैशी बताया  जिस ्रपकार भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर जानबूझकर खा लिए थे।  अमर सिंह की रैली में उमड़ी भीड़ क्या अकेले जंग बहादुर वर्मा की देन थी ? यह प्रश्न रैली के बाद से जनपद के हर समझदार आदमी के दिल में कचोचे लगा रहा है। जंग बहादुर वर्मा नाम का एक औसत दर्जे का सियासत दाॅ जिसकी जनपद में ख्याति से ज्यादा बदनामियाॅ विभिन्न मामलो मे रही है अचानक ऐसा चमत्कार कैसे कर ले गया कि हजारो का मजमा उसने जमा कर दिया। जिसके लिए अमर सिंह व रैली में पधारे लोक मंच के अन्य पदाधिकारियों ने उसकी भूरि भूरि प्रशंसा की।
 परन्तु अमर सिह की वाणी से बेनी के लिए निकले मधुर शब्दो ने सारी कलई खोल दी। लोगो ने जब इस बात का मंथन किया कि वह अमर सिंह जो सदैव बेनी प्रसाद वर्मा की राजनीतिक कब्र खोदता रहा आज अचानक उनकी शान में कसीदे क्यों पढ रहा है। बात साफ है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त बनने में जरा भी देर नही लगाते। आज दोनो की हालत एक जैसी है। एक थोड़ा पहले निकला तो दूसरा बाद में निकाला गया। दोनो का उददेश्य एक है मुलायम सिंह को प्रदेश मे ठिकाने लगाना मुस्लिम वोटो को एक जगह एकत्र न होने देना। अब देखना यह है कि इस तरह के हालात का शिकार कौन शिकारी करता है ?
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