सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

'चारों ओर था मौत का मंजर, फिर भी महफूज थे हम इंडियन

पूरे लीबिया में फैले असंतोष और धमाकों के बीच कहीं कोई लूटपाट या अभद्रता नहीं हुई, आम लोगों के भरोसे पूरी तरह महफूज थे भारतीय। लीबिया से हाल ही में लौटी डॉ. अंजना तिवारी ने बताएं वहां के हालात।

भोपाल। फरवरी 2011 में इजिप्ट में फैली बदलाव की आग से लीबिया में भी विद्रोह लपटें भड़क गईं। शुरु में जब मैंने अशांति की बातें सुनी तो इन्हें कोरी अफवाह समझा क्योंकि अब तक लीबिया में रहते-रहते मुझे 3 साल से अधिक हो चुके थे और मैंने वहां के लोगों को बेहद सुकून में रहते देखा था। फरवरी के आखिर तक मैंने बेंगाजी की सड़कों पर हजारों लोगों को हाथों में हथियार लिए विरोध के नारे बुलंद करते हुए देखा तो खुद को यह यकीन दिलाना पड़ा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। मार्च की शुरुआत तक तो भूमध्य सागर के किनारे बसा यह खूबसूरत देश पूरी तरह सुलग उठा। बदलाव की चिंगारी को दबाने के कर्नल गद्दाफी के प्रयासों ने इसे और ज्यादा भड़का दिया था और जब मैं वापस भारत लौट रही थी। मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा था इस बेहद खूबसूरत देश ऐसा कहर क्यों बरपा है। इस देश में जहां न खाने की दिक्कत है न रहने की कोई समस्या। जहां के लोग शायद दुनिया के सबसे भोले लोगों में से एक हैं। जहां आप रात में भी हजारों दीनार लेकर अकेले घर आ सकते हैं। जहां के लोग अपने मेहमान को बड़ा ऊंचा दर्जा देते हैं, आखिर उस देश में ऐसा क्यों हो रहा है?


आप के लिए जान पर खेल जाएंगे हम ...


फरवरी के अंतिम सप्ताह में हमने लीबिया छोड़ने की तैयारी शुरु की। स्थानीय परिचित लोगों ने हमे रोकने का हरसंभव प्रयास किया। वो बार-बार यही कहते रहे कि आप लोगों को कोई खतरा नहीं होगा। हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन अपनी जान पर खेलकर भी आपकी हिफाजत करेंगे। वो बार-बार कहते कि आपकी सरकार वापस बुला रही है तो चले जाइये लेकिन हम चाहते हैं कि आप लोग यहीं रहे। 28 फरवरी की शाम को जब हम लीबिया छोड़ रहे थे तो वहां के लोगों की आंखे नम थी। मेरे साथी स्थानीय प्रोफेसरों और शिक्षकों ने लीबिया में जो हुआ उसके लिए माफी मांगी और यह विश्वास जताया कि जल्द ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन बेहद बेमन से अपने दोनों बच्चों के साथ उसी शाम मैं जितना हो सकता था सामान लेकर जहाज पर चढ़ी। जहाज पर हम सभी के पास अपनी कमाई थी, कीमती चीजों थीं लेकिन लूटमार तो दूर, किसी ने पूछा भी नहीं कि आप क्या ले जा रहे हैं। भारत सरकार ने वापसी के लिए अच्छा इंतजाम किया था। हम एक मार्च की सुबह बेंगाजी से इजिप्ट के एलेक्जेंड्रिया के लिए चले। ढाई दिन बाद एलेक्जेंड्रिया पहुंचे। चार मार्च को एयरइंडिया की फ्लाइट की हमें दिल्ली ले आई। मैं वापस हिंदुस्तान पहुंच चुकी थी। मैं उस खूबसूरत देश को जलता छोड़ आई थी जहां मेरे ढेर सारे छात्र भविष्य में चमकने की तैयारी कर रहे थे। लौटते वक्त मुझे उनकी चिंता थी। वहां के भोले-भाले लोगों की चिंता थी। जो शायद दुनियादारी के लिए जरूरी उतना कपट नहीं जानते। आज जब हिंदुस्तान में मैं लीबिया पर पश्चिमी सेनाओं के हमले के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही ख्याल आता है कि वहां के लोग मानवाधिकारों के नाम पर किए जा रहे इन हमलों की अंतर्कथा को उसी शिद्दत से समझ पा रहे होंगे। बस यही दुआ है कि यह खूबसूरत देश बर्बाद न हो। लोगों में वही जिंदादिली बरकरार रहे।


धमाके होते रहे पर कभी नहीं लगा डर...


मैं बेंगाजी के पॉश इलाके में पांचवी मंजिल पर किराए के मकान में रहती थी। मैंने और मेरे दोनों बच्चों ने बेंगाजी की सड़कों पर गुजरते गद्दाफी की सेनाओं के टैंकों को अपनी बालकनी से देखा। हम पूरे दिन विरोध प्रदर्शन देखते रहे। हमने देखा कि गद्दाफी के सैनिक विद्रोहियों को प्यार से मनाने का प्रयास कर रहे थे। शुरू में उन्होंने समझाने की कोशिशें की लेकिन बाद में वो हिंसक हो गए। हमने गोलियों की गूंज सुनी। फिर धमाकों की आवाजें सुनी लेकिन कभी डर नहीं लगा। क्योंकि मेरी मकान मालकिन हमेशा यह विश्वास दिलाती थी कि वो अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमें कुछ नहीं होने देंगी। संघर्ष के दिनों में स्थानीय लोग हमेशा मदद को तैयार थे। जब हवाई हमले हो रहे थे तब मुझसे बार-बार कहा जा रहा था कि मैं बच्चों के साथ नीचे वाले फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊं। यह उनका भरोसा ही था कि गोलियों और धमाके के बीच भी मैं हम खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे।


सिर्फ बदलाव के लिए विद्रोह...

लीबिया में रहते हुए मैंने कभी भी गद्दाफी के विरोध में कुछ नहीं सुना। इसके दो बड़े कारण हैं एक तो यह कि गद्दाफी बेहद शक्तिशाली हैं और उन्होंने कभी अपने खिलाफ किसी आवाज को उठने ही नहीं दिया और दूसरी यह कि वहां के लोगों की कोई भी ऐसी आवश्यकता नहीं है जिसे सरकार पूरा न करती हो। घर, खाना, पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही सरकार देश की आय का एक निश्चित हिस्सा लोगों में बांटती हैं। यहां के लोगों को किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन जब विद्रोह हुआ तो उसके समर्थन में आवाजें उठने लगीं। लीबिया के लोगों ने कभी भी लोकतांत्रिक आजादी को महसूस नहीं किया था। वो खुलकर बोल नहीं सकते थे। गद्दाफी जो फैसला लेते वो सबको स्वीकार करना होता। मैंने बेंगाजी की दीवारों पर बदलाव के नारे लिखे देखे। विद्रोह और उसका समर्थन कर रहे लोगों ने विद्रोह की सिर्फ एक ही बड़ी वजह बताई और वो यह थी कि लोग अब बदलाव चाहते थे। वो सरकारी फैसलों में खुद को शामिल करना चाहते थे। वो गद्दाफी के फैसलों को मानने के बजाए अपनी बात भी रखना चाहते थे। वो अपने हुक्मरानों को चुनने का अधिकार चाहते थे। बदलाव की चाहत ही वहां के लोगों के विद्रोह की बड़ी वजह थी। जो लोग पहले खामोश थे उन्होंने भी विद्रोह की आवाज में सुर मिला लिया था। मेरी मकान मालिक की बेटी जिसे मैंने कभी भी गद्दाफी के खिलाफ बोलते नहीं सुना था वो भी अब विद्रोहियों के समर्थन में बातें कर रही थी।


मॉडर्न मुस्लिम राष्ट्र है लीबिया...


लगभग तीन बरस पहले जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए लीबिया जा रही थी तो मेरे मन में यही डर था कि यह एक रूढ़िवादी मुस्लिम देश होगा, जहां महिलाओं को घरों में कैद रखा जाता होगा। लेकिन जब में वहां पहुंची तो स्थिति को बिल्कुल ही अलग पाया। लीबिया में महिलाएं पुरुषों से समान आजाद हैं। बैंकों, अस्पतालों, क़ॉलेजों में काम करने वाले कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा हैं। शायद ही कोई काम ऐसा होगा जिसमें महिलाएं सेवाएं न देती हों। बस इतना सा फर्क है कि वो जहां भी होती हैं पर्दे का ख्याल रखती हैं। वो बुर्के में बंद नहीं रहती, सिर पर स्कार्फ बांधती हैं। किसी भी अन्य मुस्लिम राष्ट्र की तरह यहां भी महिलाएं पुरुषों से दूरी बनाए रखती हैं। लेकिन वो घर में कैद नहीं रहती। वो देश को चलाने में बराबरी से योगदान देती हैं।


कबीलों में बंटा हैं लीबिया...


लीबिया का समाज कई कबीलों में बंटा है जिसमें सबसे ताकतवर कबीला गद्दाफी का है। 1969 में लीबिया के शासन पर कब्जे के बाद से ही गद्दाफी ने तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अपने कबीलें के लोगों की भर्ती की। गद्दाफी का कबीला ताकतवर होता गया। गद्दाफी के कबीले की बढ़ती ताकत बाकी कबीलों में असंतोष पैदा करने लगी लेकिन गद्दाफी ने देश को इस तरह से शासित किया कि किसी ने भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि गद्दाफी ने देश की सेना को भी कमजोर ही रखा और सुरक्षा की कमान अपने कबीले के लोगों के हाथ में दी। विद्रोह का मुख्य कारण अन्य कबीलों के लोगों में व्याप्त असंतोष ही है।


बेहद खूबसूरत देश है लीबिया...


आमतौर पर लीबिया को रेगिस्तान समझा जाता है। लीबिया का एक बड़ा इलाका रेगिस्तान ही है लेकिन ज्यादातर आबादी शहरों में रहती है। बेंगाजी और त्रिपोली में ही लगभग आधी आबादी रहती है। यहां का मौसम बेहद खुशनुमा है। सर्दियां जनवरी के दूसरे पखवाड़े में शुरु होती हैं और फरवरी का अंत आते-आते चली जाती हैं। गर्मी कभी भी इतनी नहीं पड़ती की पंखा चलाना पड़े। साल के 12 महिने रातों में हल्की सर्दी पड़ती है और आप बिना चादर ओढ़े नहीं सो सकते। लीबिया के शहरों को नए तरीके से बसाया गया है। सबकुछ बेहद व्यवस्थित है। लीबिया में आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अफ्रीका में हैं।


बिलकुल नहीं होते हैं अपराध...

लीबिया के लोगों में एक चीज है जो समान रूप से पाई जाती हैं और वो हैं उनका भोलापन। आप कहीं भी जाइये आपको बेहद सच्चे, सीधे और सरल लोग मिलेंगे। वो कोई दिखावा नहीं करते हैं। पड़ोसी भी पड़ोसियों की बुराई नहीं करते। अपराध की दर वहां जीरो फीसदी से भी कम है। दो सालों में मैंने लूटमार की कोई वारदात नहीं सुनी। मैं अमेरिका, ब्रिटेन, मिस्त्र, जार्डन और दुनिया के अन्य कई मुल्कों में गई हूं लेकिन लीबिया जैसे सरल और भोले लोग मैंने कहीं नहीं देखे।


भारतीयों का करते हैं बेहद सम्मान...

लीबिया में भारत के लोगों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। वहां अन्य मुल्कों के भी लोग हैं लेकिन जितना सम्मान भारत के डॉक्टरों और प्रोफेसरों को मिलता हैं उतना शायद कहीं के लोगों को भी नहीं मिलता। जैसे ही आप वहां के लोगों को बताते हैं कि आप भारत से हैं उनका व्यवहार बेहद सम्माननीय हो जाता है। वो मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इंग्लिश कम ही लोग बोलते हैं लेकिन जो आपको समझते हैं वो हर संभव तरीके से आपकी मदद करते हैं।

(डा। अंजना तिवारी, सर गैरयूनिस यूनिवर्सिटी बेंगाजी (लीबिया) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)
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