सोमवार, 28 दिसंबर 2009

बाबरी मस्जिद के अभिशाप का शिकार तिवारी जी भी बने

बाराबंकी। बाबरी मस्जिद के साथ बदनीयती रखने वालों को एक के बाद एक किसी न किसी रूप में सजा मिल रही है। नारायण दत्त तिवारी भी उनमें से एक हैं। उन्हें भी आखिरकार अपनी उम्र के आखिरी दहलीज पर अपने गुनाहों की सजा मिल गयी और बड़े बे आबरू होकर उन्हें राज्यपाल जैसा गौरवमयी पद छोड़ना पड़ा ।
अल्लाह का घर बाबरी मस्जिद के साथ जो शैतानी खेल खेला गया वह किसी से छिपा नहीं परन्तु बाबरी मस्जिद के नाम पर जिसने भी अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकी
उसे सजा उम्र के किसी हिस्से में जरूर मिली। चाहे वह कल्याण सिंह हो या राजीव गाँधी, चाहे वह उमा भारती हो या लाल कृष्ण अडवाणी चाहे वह नरसिम्हाराव हो या नारायण दत्त तिवारी। चाहे वह वीर बहादुर सिंह हो या अरुण नेहरु।
नारायण दत्त तिवारी ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने मुख्यमंत्री काल में उस समय प्रधान मंत्री रहे राजीव गाँधी की अनुभवहीनता का लाभ उठाते हुए अयोध्या के विवादित स्थल पर राम मंदिर के शिलान्यास की अनुमति विश्व हिन्दू परिषद् को देकर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया जिसका लाभ कांग्रेस को तो मिला नहीं भाजपा का सत्ता मार्ग अवश्य साफ़ हो गया और कल्याण सिंह ने प्रदेश सरकार की सत्ता हासिल कर बाबरी मस्जिद की ईंट से ईंट 6 दिसंबर 1992 को हिला कर उसे ध्वस्त करा दिया ।
उसके बाद से बाबरी मस्जिद का भूत उन राजनेताओं का पीछा कर रहा है जो उसकी बर्बादी के षड्यंत्र में किसी न किसी रूप में शामिल रहे। पहला शिकार वीर बहादुर सिंह बने जिन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने में अहम् भूमिका निभाई थी। फिर नम्बर आया कांग्रेस का जो वीर बहादुर, अरुण नेहरु जैसे नेताओं के बहकाने में आकर धर्मनिरपेक्षता के रास्ते से भटक कर वोटों की खातिर हिन्दू कार्ड खेलने की राह पर चल पडीं। बाद में राजीव गाँधी का भी हश्र यही हुआ और एक आतंकवादी आत्मघाती हमले में उनकी जीवन लीला भी समाप्त हो गयी। साथ ही कांग्रेस की सरकार की भी रुखसती उत्तर प्रदेश व बिहार से हो गयी। नरसिम्हा राव को अपनी ही पार्टी में रुसवा होना पड़ा यही हालत लाल कृष्ण अडवाणी, उमा भारती और कल्याण सिंह की भी हुई। अरुण नेहरु की तो सियासी मौत ही हो गयी ।
अब बारी आई नारायण दत्त तिवारी की जिनकी बुढापे में इज्जत दागदार हुई। वैसे जहाँ तक नारायण दत्त तिवारी के चरित्र का प्रश्न है तो उन पर यह दोष तो जमाने से लगता रहा है और राजनीति में तमाम नेता ऐसे हैं जिनके चरित्र पर उंगलियाँ उठती रही परन्तु जिस प्रकार से रुसवाई नारायण दत्त तिवारी की हुई है यह अभिशाप बाबरी मस्जिद का ही है जो उनके हिस्से में अब आया । वह कहते है कि ऊपर वाले के यहाँ देर है पर अंधेर नहीं।

मो॰ तारिक खान
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