रविवार, 7 नवंबर 2010

दीपावली के अवसर पर मिलावटखोरो व खाद्य विभाग की साॅठगाॅठ से खूब चमका मिलावटी कारोबार,जनता के स्वास्थ्य का बुराहाल

बाराबंकी। मुख्यमंत्री के निर्देश पर पूरे प्रदेश में दिवाली के अवसर पर खाद्य पदार्थो में की जाने वाली मिलावट पर खाद्य एवं औषधि प्राधिकरण विभाग द्वारा छापा मार कार्यवायी करते हुए नकली मावा/खोया, सिंथेटिक दूध, नकली घी इत्यादि बड़े पैमाने पर पकड़ा गया, परन्तु जनपद बाराबंकी में कार्यवायी के नाम पर फर्ज अदायगी करते हुए सैम्पुल भर कर ही काम चला दिया गया। अलबत्ता दिवाली के अवसर पर विभाग के निरीक्षको व अन्य स्टाफ ने अपनी वसूली की रकम में इजाफा कर दिया।
 वैसे तो आम दिनो मे मिलावट खोर अपनी मिलावट का धंधा चलाते रहते है जिसके कारण जनता को स्वास्थ्य सम्बंधी  कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है, परन्तु त्योहारो के अवसर पर माॅग बढ जाने पर मिलावट का धंधा खूब चमकता है। खोये में मिलावट दूध मे मिलावट मिठाई में मिलावट, घी व वनस्पति में मिलावट, सरसों के तेल में मिलावट, गरम मसालो में मिलावट तथा अन्य खाद्य सामग्री में मिलावट करके लोगो के गुर्दे, अमाशय, पित्ताशय, व हृदय के संग खिलवाड़ किया जाता है। मिलावट खोरो को खूब मोटा मुनाफा मिलता है साथ ही इन पर अंकुश लगाने वाले खाद्य विभाग की भी खूब मोटी कमायी होती है।
 शासन द्वारा सदैव इस बात का रोना रोया जाता रहा है कि उसके पास पर्याप्त स्टाफ नही है जिसके वजह से वह व्यापक तौर पर खाद्य पदार्थो की चेकिंग नही हो पाती। ब्रहमाजी बनाम उ0प्र0सरकार के मुकदमे में उच्च न्यायालय इलाहाबाद में उ0प्र0 सरकार द्वारा जब यह ग्राउण्ड ली गयी तो न्यायालय द्वारा सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा गया कि जनमानस के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सरकार की है उसे इस सम्बंध मे स्टाफ की व्यवस्था हर हाल मे करनी चाहिए और मिलावट खोरो के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्यवायी की जानी चाहिए। न्यायालय के निर्देश पर उ0प्र0 सरकार द्वारा खाद्य एवं औषधि प्राधिकरण का गठन कर दिया गया और प्रत्येक जिले के अपर जिलाधिकारी को इसका अध्यक्ष बनाया गया। बाराबंकी में भी विगत एक वर्ष से जिला प्रशासन की देखरेख मे खाद्य एवं औषधि विभाग का कार्य देखा जा रहा है। मुख्य चिकित्साधिकारी से खाद्य विभाग की जिम्मेदारी ले ली गयी है। इसी प्रकार औषधि नियंत्रक के पास से भी जिले में औषधि विक्रेताओ के विरुद्ध स्वतंत्र रुप से कार्यवायी करने का अधिकार छिन गया। अब औषधि निरीक्षक को जिला प्रशासन के निर्देशो पर काम करना पड़ रहा है जो उसे काफी खल रहा है।
 जिला प्रशासन के हाथ में जिस उद्देश्य से बागडोर खाद्य एवं औषधि की दी गयी थी उसका वही हाल है जैसा कि कहावत है कि शराब वही है केवल बोतल बदल गयी है। बल्कि मिलावट खोरो तथा नकली सामग्री बेचने वालो द्वारा दी जाने वाली रकम मे इजाफा हो जाने से मिलावट व नकली सामान का कारोबार और बढ गया है। जनपद मुख्यालय में अपर जिलाधिकारी कार्यालय में स्थित एक कक्ष में खाद्य निरीक्षको तथा औषधि निरीक्षक का बसेरा रहता है जिसके ऊपर एक लिपिक का नियन्त्रण रहता है जो बताते है कि अपरजिलाधिकारी के काफी नजदीक है। किस दुकानदार को ठीक करना है या किस दुकानदार से मिलने वाली वसूली की रकम मे इजाफा करना है यह सब निर्णय इसी लिपिक के माध्यम से होता है।
 नगर के छाया चैराहे स्थित टण्डन बेकरी पर खाद्य विभाग द्वारा जिस प्रकार छापा मार कार्यवाही की गयी और दुकानदार द्वारा जो आरोप विभाग के ऊपर लगाए गए वह समाचार पत्रो में चर्चा का विषय बना रहा। शासन तक इस मामले की गॅूज हुई खाद्य विभाग को शासन से फटकार भी सुननी पड़ी। जिस पर अपनी बेबसी का इजहार भी खाद्य विभाग के अधिकारियों ने करते हुए कहा कि कैसे काम किया जाए। इसी प्रकार पीरबटावन स्थित एक बेकरी मे भी खाद्य विभाग की टीम का निरीक्षण हुआ। बिस्किट व दालमोट के नमूने लिए गए जो बताते है कि लेबोरेटरी से पास भी हो गए। इसी प्रकार एक ब्राण्डेड घी का नमूना भी बेकरी से लिया गया वह भी पास हो गया। परन्तु बेकरी का पीछा खाद्य विभाग ने नही छोड़ा एक मोटी रकम की मांग बेकरी मालिक से की गयी। बेकरी मालिक ने निवेदन किया कि जब वह मिलावट का धंधा नही करता है तो वह पैसे क्यों दे तो उसे जवाब मिला कि यदि पैसे नही दोगे तो नमूने दूसरी लैब मे भेजे जाएंगे फिर तीसरे लैब में भेजे जाएंगे कहीं न कहीं  तो फसोगे। करता क्या न करता विवश होकर बेकरी मालिक भी और दुकानदारो की भांति खबर है कि विभाग से सेट हो गया है। अब आशा है कि वहाॅ मिलावट नही रहेगी।
  यह तो एक दो नमूने है खाद्य विभाग की कारस्तानी के, जिनका उल्लेख किया गया, बाकि भ्रष्टाचार के समुद्र की कोई थाह नही है। शासन या न्यायालय भले ही लगातार इस बात की चिंता करे कि मिलावटी व नकली सामान न बिकने पाए परन्तु इस रोग से आम जनता को मुक्ति मिलना फिलहाल सम्भव नजर नही आती। खाद्य विभाग द्वारा खाद्य सामग्री बेचने वाले दुकानदारो से प्रति वर्ष लाइसेंस के नवीनीकरण के नाम पर उसकी दुकान की हैसियत के हिसाब से 500 रुपये से 5हजार रुपये तक की अवैध वसूली की जाती है और यह धंधा जिला प्रशासन की सम्पूर्ण जानकारी में चलता है। जब कि उ0प्र0 खाद्य अपमिश्रण अधिनियम के नियम अंतर्गत खाद्य विभाग फुटकर विक्रेता की  लाईसेंस फीस मात्र 4 रुपये है जो उसे प्रति वर्ष जमा करनी होती है। नवीनी करण के समय खाद्य निरीक्षक की संस्तुति अनिवार्य होती है। इसी का लाभ उठाते हुए खाद्य निरीक्षक अवैध वसूली करते है और दुकानदार को हरी झण्डी गलत धंधा करने के लिए दिखा देते है। इसी प्रकार खाद्य सामग्री के निर्माण कर्ताओं के लिए लाइसेंस फीस मात्र दस रुपये वार्षिक है यहाॅ भी स्थिति यह है कि खाद्य निरीक्षक अपनी मर्जी के दाम वसूल कर लाइसेंस बनाने के लिए हरी झण्डी देता है। हद तो यह है कि दुकानदारो के हित के लिए काम करने वाले व्यापारी संगठनो द्वारा अभी कुछ माह पहले नगर के धर्मशाला में खाद्य लाइसेंस बनवाने के लिए एक कैम्प लगवाया गया जहाॅ दुकानदारो सेे फार्म भराने के पश्चात खाद्य विभाग के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी द्वारा दुकान दुकान 500 रुपये वसूले गए। व्यापारी संगठन के एक नेता से जब यह पूछा गया कि उनके द्वारा लाइसेंस बनवाने से दुकानदार को क्या लाभ, तो उनका जवाब आया कि घर बैठे सुविधापूर्वक दुकानदार को लाइसेंस मिल रहा है क्या यह उचित नही है। बताते है कि जिला उद्योग बंधु की बैठक में कुछ व्यापारी नेताओ द्वारा लाइसेंस बनवाने के नाम पर इस अवैध वसूली की शिकायत की गयी तो जिलाधिकारी ने कहा कि उनके संज्ञान में यह बात है और वह शीघ्र ही कलेक्ट्रेट में एकल खिड़की व्यवस्था के माध्यम से खाद्य लाइसेंस  निर्गत करने का इरादा रखते है जहाॅ दुकानदार अपना फार्म भरकर देगा और 15 दिन के भीतर उसकी दुकान का निरीक्षण कराने के पश्चात निर्धारित लाइसेंस फीस जमा करके उसका लाइसेंस निर्गत कर दिया जाएगा। परन्तु इस बात को जिलाधिकारी द्वारा कहे 3 माह से ऊपर का समय बीत गया परन्तु यह व्यवस्था लागू नही हुई अब पता नही कि जिलाधिकारी अपनी व्यस्तता के कारण ऐसा न कर सके या किसी मजबूरीवश ?
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