रविवार, 26 फ़रवरी 2012

दुनिया के सबसे बड़े पोस्टर डिजाइनर का नाम : मोहन दास करम चंद गांधी


बड़ी दिलचस्प कहानी है दिल्ली में हमारे एक दोस्त हैं नरेश जुनेजा.उनमे कई कमाल की आदतें हैं .एक दो आप भी सुन लें - वे खाने -खिलाने शौक़ीन हैं ...दोस्त बनाने में माहिर हैं....किस शहर में ,किस जगह पर खाने की क्या चीज अच्छी मिलती है उन्हें जुबानी याद रहता है . जाहिर है उनके पास सांझ की शुरुआत की बेहतरीन सामगी रहेगी . बड़े शहर में जीने के लिए जरूरी जरूरियात की सामग्री से लैस यह शख्स अपने आपको बेहद प्यार करता है .
एक दिन, दोपहर को हमें सूचना मिली कि -भाई साब ! आज ...आ जाओ .. रात के खाने पर . और हम पहुच गए .उनका दीवान- ये - आम ,खास लोंगो से अटा पड़ा था .सब विदेशी लोग ,राज दूत ,आफिसर ,...सब विदेशी लिबास में ...एक अकेला मै खादी में .अचानक एक साहब नमूदार हुए और मुझसे बोले -जुनेजा जी ने कहा है -आप उनके बेड रूम में चले जायं, वहाँ कुछ लोग आपका इन्तजार कर रहे हैं .मै बेड रूम में चला गया .वहाँ सारे देसी लोग .अधिकतर बंबई के फिल्मो से जुड़े लोग .सारे फिल्म बितारक .एक संतोषा नन्द ( फिल्मो के गीत लेखक ) कहती कांग्रेसी ,संघी फिल्म बितरकों से घिरे पड़े हैं .हमें देखते ही उछल पड़े -लो अब बात करो , आ गया है समाज्बादी .... यार! ये सब गांधी को गरिया रहे हैं ... मै अकेला पड़ गया था .मैंने नजर दौड़ाई दो एक परचित दिखाई पड़े -गिप्पी (असल नाम सिद्धार्थ द्विवेदी -पुत्र आचार्य हजारी प्रसाद द्विबेदी.) डॉ कसाना .हमने कहा भाई ! हमें भी तो आप लोगो के लेबिल पर पहुचने दो ..और गिप्पी के साथ मै उस तरफ किनारे चला गया जहां "ऊपर उठने की सामग्री सजाई गयी थी .लाब्तक हम वापस आते ,बहस का मुद्दा पोस्टर डिजाइनिंग की तरफ जाचुका था .किसी ने पूछा इंडिया का सबसे अच्छा पोस्टर डिजाइनर कौन है .कई नाम उभरे ..हमने बीच में ही कूदने कि जहमत ले ली -----
देश का छोड़ो मै दुनिया के सबसे बड़े पोस्टर डिजाइनर का नाम बताता हूँ ,उसका नाम है मोहन दास करम चंद गांधी ...एक सन्नाटा पसर गया .कईयों को लगा कि ये गया काम से ..इसका लेबिल कुछ ज्यादा ही हाई हो गया है .इस परिस्थिति में कई बार यह होता है कि ; चलो इसे मौक़ा दे दो बोल- बाल कर जाय /वही मौक़ा मुझे भी मिला .और मै शुरू हो गया हमारा कांग्रेसी मित्र " मेरे देश कि धरती सोना उगले ,रँग लाल है लाल बहादुर से , का लेखक कसमसाया ,जिस गोलार्ध पर टिका था ,उसे बदला , गिलास उठाया , ललकारा -अब आओ ...और मै शुरू हो गया भाई !
गाँधी के पोस्टर का नाम है चरखा .बड़ी मेहनत से गाँधी ने उसकी डिजाइन की थी .गो चरखा पहले भी था ,लेकिन गांघी ने उसे नया रूप दिया ,उसे आजादी के औजार में तब्दील किया ,उस जमाने में जो भी चरखा चलाता दिख जाता उसे कांग्रेसी मान लिया जाता .अभी आज तलक इतना कारगर पोस्टर कहीं से भी नहीं आपाया .सुनो संघियो ! (हमें माफ करना भाई ,ऊंची उड़ान पर भाषा में थोड़ी रवानी आ ही जाती है , न पतिया रहे हों तो अटल जी के किसी नजदीकी से दरियाफ्त कर लीजिए ) तुमने उनकी ह्त्या करके बड़ा पाप किया है . बहार हॉल बात पोस्टर की हो रही थी ....गिप्पी मई फ्रैंड ! एक और ... इसी बीच एक आवाज आई - साहिब ! इसे दुबारा सुना सकते है क्या ?मै ज़रा देर से आया ....... जी हमें राजेश खन्ना कहते हैं ..../ राजेश खन्ना ? आनंद ...बावर्ची....कटी पतंग ,..एक लंबी रील घूम गयी .राजेश खन्ना के साथ राजीव शुक्ला थे ,राजीव शुक्ला ने धीरे से मेरे बारे में उन्हें बताया .(राजीव के बड़े भाई, दिलीप शुक्ला हमारे दोस्त रहे हैं ) इस तरह राजेश खन्ना से पहली मुलाक़ात हुई और आज तक वह दोस्ती ब् दस्तूर कायम है .राजेश खन्ना हमारे काका भाई हैं ,और मै उनका साहिब
बेटे कबीर ! दोस्ती में पहले दिल जरूर आता है ,लेकिन उसकी बलन्दी दिमाग से ही परवान चढती है.इब्ने इंशा का एक सवाल है -तुम अंगूठा टेक , बे पढ़ा अकबर बन्ना चाहोगे या पढ़-लिख कर नौ रत्न ? सोच कर जवाब देना कोइ जल्दी नहीं है.
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